दलित महिलाओं के 'बीज बैंक'

 गुरुवार, 11 अक्तूबर, 2012 को 10:30 IST तक के समाचार
सीड-बैंक

जन्गाम्मा, हैदराबाद से लगभग 150 किलोमीटर दूर कर्नाटक की सीमा पर स्थित गंगवार गाँव की एक दलित किसान महिला हैं और अपनी ही जैसी हज़ारों दूसरी ग्रामीण महिलाओं की तरह वो भी पढ़ना-लिखना नहीं जानती हैं.

लेकिन वो आज अपने गाँव और राज्य में ही नहीं बल्कि देश के कई दूसरे राज्यों में भी एक जानी-मानी हस्ती बन गई हैं.

वो आंध्रप्रदेश के मेढक जिले में जैव-विविधता संरक्षण आंदोलन का एक प्रमुख नाम हैं. जन्गाम्मा उन महिलाओं में से एक हैं जिन्होंने स्थानीय और पारंपरिक फसलों को हमेशा के लिए ख़त्म होने से बचाने के लिए अनोखा काम किया है.

कम बारिश के कारण सूखे की मार सहने वाले इस जिले के 75 गाँव की 150 से भी ज्यादा महिलाओं की तरह जन्गाम्मा भी 'बीजों का बैंक' चलाती हैं.

लेकिन इन बैंकों में कोई साधारण काम नहीं हो रहा है. यहां ऐसी स्थानीय और पारम्परिक फसलों के बीजों का संरक्षण हो रहा है जो देश की अपनी अनमोल संपत्ति होने के बावजूद अब कई भागों से लगभग लुप्त हो गए हैं.

पानी और फसल

"वैसे तो मेरे बैंक में केवल 60-70 प्रकार की फसलों के ही बीज हैं, लेकिन असल में भारत की अपनी इन फसलों की संख्या 102 है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इनमें से कुछ फसलें खत्म हो गई हैं और कुछ खत्म होने की कगार पर हैं. ये फसलें ऐसी हैं कि चावल और गेहूँ जैसे अनाज की तुलना में इन्हें 10 प्रतिशत पानी भी मिल जाए तो काफी है और उनमें से कई फसलों पर तो कीड़े भी हमला नहीं कर सकते. इसलिए न उनको रासायनिक खाद का जरूरत होती है न कीटनाशकों की. कम खर्च में आप कई फसलें उगा सकते हैं"

जन्गाम्मा

इन 'बीज बैंकों' में उस मोटे अनाज या कुंकनी फसलों के बीज रखे जाते हैं जिनके बारे में वैज्ञानिक और विशेषज्ञ मानते हैं कि जब दुनिया में पानी की कमी होगी और खेती-बाड़ी के लिए पानी नहीं मिलेगा, तब यही मोटे अनाज लोगों को भूखा मरने से बचाएंगे.

जन्गाम्मा और उन जैसी दूसरी महिलाओं के इस काम पर सबकी निगाहें ऐसे समय लगी हैं जब हैदराबाद में संयुक्त राष्ट्र का जैव-विविधता सम्मलेन चल रहा है.

इसमें विश्व के 193 देशों के हजारों अधिकारी, नीति बनाने वाले और दूसरे प्रतिनिधि भाग ले रहे हैं. जिन विषयों पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित है, उनमें कृषि क्षेत्र में जैव-विविधता का संरक्षण भी शामिल है.

मेढक जिले में मोटे अनाज और पारंपरिक फसलों को बचाने के इस अभियान के पीछे असल शक्ति 'डेक्कन डेवेलपमेंट सोसाइटी' या डीडीएस नामक एक गैर-सरकारी संगठन है.

ये संगठन पास्तापुर गाँव में न केवल अपना एक बीज-बैंक चलाता है, बल्कि गाँव-गाँव में ऐसे बैंक स्थापित करने और चलाने में दलित महिलाओं की सहायता भी करता है.

जन्गाम्मा को अपने बीज-बैंक पर बहुत गर्व है. वो इन पुरानी और पारंपारिक फसलों की इतनी गहरी जानकारी रखती है कि कृषि विज्ञान पढ़ने वाले भी चकित रह जाएं.

जन्गाम्मा ने बीबीसी को बताया, "वैसे तो मेरे बैंक में केवल 60-70 प्रकार की फसलों के ही बीज हैं, लेकिन असल में भारत की अपनी इन फसलों की संख्या 102 है. दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इनमें से कुछ फसलें खत्म हो गई हैं और कुछ खत्म होने की कगार पर हैं. ये फसलें ऐसी हैं कि चावल और गेहूँ जैसे अनाज की तुलना में इन्हें 10 प्रतिशत पानी भी मिल जाए तो काफी है और उनमें से कई फसलों पर तो कीड़े भी हमला नहीं कर सकते. इसलिए न उनको रासायनिक खाद का जरूरत होती है न कीटनाशकों की. कम खर्च में आप कई फसलें उगा सकते हैं.''

खुद जगाम्मा अपने खेत में एक साथ ऐसी दस से बीस फसलें उगाती हैं.

कई बीमारियों की दवा

"इनमें विटामिन, फाइबर, जिंक, लोहा और कई ऐसी दूसरी चीज़ें हैं जो हमें स्वस्थ रख सकती हैं लेकिन ये फसलें इसलिए खत्म हो रही हैं कि बाज़ार में इनकी मांग कम हो गई है. आज लोग ऐसी चीज़ें चाहते हैं जिन्हें वो आसानी से पका सकें और खा सकें, जबकि मोटे अनाज को साफ़ करके खाने के काबिल बनाने में समय लगता है और उन्हें साफ़ करने की मशीनें भी सबके पास नहीं हैं."

सुरेश कुमार

गंगवार गाँव से कोई 25 किलोमीटर दूर पास्तापुर में एक और बीज बैंक चलाने वाली रत्नाम्मा कहती हैं कि उनके बैंक में धान की ऐसी तीन किस्में हैं जिनमें मधुमेह समेत कई रोगों का इलाज है.

वो बताती हैं, "मोटे अनाज और तिलहन के बीजों में कई रोगों का इलाज है. अगर हम उन्हें केवल अपने खाने का हिस्सा बनाएँ तो कई खतरनाक रोगों से बच सकते हैं.''

ऐसी फसलों में ज्वार, बाजरा, रागी, चना, तुअर, मूंग दाल की अनेक किस्में, कई प्रकार के तेल के बीज, कई रंगों की फल्लियाँ और कई ऐसी दूसरी फसलें हैं जिनके नाम भी शायद नई पीढ़ी के लोग नहीं जानते.

जन्गाम्मा कहती है, "ये सारी फसलें हमारे देश की असल संपत्ति हैं, लेकिन सरकार की नीतियों के कारण केवल कुछ ही फसलों को बढ़ावा मिल रहा है और हम उन फसलों को एकदम भूलते जा रहे हैं जो इस देश की आम और गरीब जनता का असल भोजन रहा है.''

डीडीएस के संयुक्त निदेशक सुरेश कुमार का कहना है कि इन फसलों में इतनी पौष्टिकता है कि लोग कई बीमारियों से बच सकते हैं.

वे बताते हैं, ''इनमें विटामिन, फाइबर, जिंक, लोहा और कई ऐसी दूसरी चीज़ें हैं जो हमें स्वस्थ रख सकती हैं लेकिन ये फसलें इसलिए खत्म हो रही हैं कि बाज़ार में इनकी मांग कम हो गई है. आज लोग ऐसी चीज़ें चाहते हैं जिन्हें वो आसानी से पका सकें और खा सकें, जबकि मोटे अनाज को साफ़ करके खाने के काबिल बनाने में समय लगता है और उन्हें साफ़ करने की मशीनें भी सबके पास नहीं हैं.''

एक किलो के बदले दो किलो

"यह बैंक बीज बेचते नहीं हैं बल्कि अगर कोई किसान बैंक से बीज लेता है तो उसे एक किलो बीज के बदले दो किलो बीज लौटाने पड़ते हैं और यही इस बैंक की मालिक के लिए आमदनी का माध्यम है. अगर फसल ज्यादा महंगी है तो डेढ़ गुना ज्यादा बीज लौटाना पड़ता है."

सुरेश कुमार

रत्नाम्मा के बैंक में धान की एक ऐसी किस्म भी है जो पारंपरिक रूप से बच्चे के जन्म के तुरंत बाद मां को भोजन के रूप में दी जाती है ताकि उसे ताक़त मिल सके.

यह भी दिलचस्प बात है कि इन बीजों के संरक्षण के लिए भी देसी तरीके ही इस्तेमाल किये जाते हैं. उन्हें मिट्टी के अलग-अलग बर्तनों में रखा जाता है.

कीड़ों से बचाने के लिए उनमें से कुछ को नीम के पत्तों में रखा जाता है और कुछ को अलग-अलग प्रकार के बीजों को एक-दूसरे के साथ मिलकर रखा जाता है.

मिसाल के तौर पर अगर केवल हरी दाल के बीज अलग रखे जाएं तो उनमें कीड़े लग जाते हैं लेकिन अगर उन्हें कुकुम के बीजों के साथ रखा जाए तो वो कीड़ों से बच जाते हैं.

गंगाम्मा कहती है, "हमें यह जानकारी किसी स्कूल से नहीं मिली बल्कि हमारे पुरखों से मिली है और इसे हम अपने बच्चों को सिखा रहे हैं. मैं पचास वर्ष से यही काम कर रही हूं.''

लेकिन ये बैंक काम कैसे करते हैं. सुरेश कुमार बताते हैं, "यह बैंक बीज बेचते नहीं हैं बल्कि अगर कोई किसान बैंक से बीज लेता है तो उसे एक किलो बीज के बदले दो किलो बीज लौटाने पड़ते हैं और यही इस बैंक की मालिक के लिए आमदनी का माध्यम है. अगर फसल ज्यादा महंगी है तो डेढ़ गुना ज्यादा बीज लौटाना पड़ता है".

अनोखी और अहम मुहिम

बीजों को मिट्टी के अलग-अलग बर्तनों में रखा जाता है

लेकिन सवाल यह है कि अगर यह पारंपरिक फसलें सूखे की हालत में भी मेढक जिले के गरीब किसानों को भूखे मरने या क़र्ज़ के जाल में फंसने से बचा सकती हैं तो फिर ऐसा देश के सूखे से पीड़ित दूसरे इलाकों में क्यों नहीं हो सकता?

डीडीएस इस अभियान को मिललेट नेटवर्क ऑफ़ इंडिया द्वारा दूसरे राज्यों और देशों में भी ले जाने की कोशिश कर रही है. हर वर्ष जनवरी और फरवरी में डीडीएस मेढक में 'मोबाइल बायो-डाइवर्सिटी मेला' आयोजित करती है जिसमें बैलगाड़ियों के कारवां में इन फसलों के बीजों को गाँव-गाँव ले जाया जाता है और किसानों की सभाएं होती है जहां लोगों को इसके बारे में बताया जाता है.

इस अवसर पर देशभर और विदेशों से किसानों और गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों को भी आमंत्रित किया जाता है.

डीडीएस के निदेशक और जैव-विविधता संरक्षण अभियान के पितामह पीवी सतीश कहते हैं कि जैव-विविधता को बचाने के लिए असल काम यही महिलाएं कर रही हैं.

वो कहते हैं, "देश में जो हरित क्रांति आई थी, उसमें चावल और गेहूँ ने पारंपरिक फसलों को ख़त्म कर दिया लेकिन मेढक जिले की इन महिलाओं ने उन्हें जीवित रखा है.

सतीश बताते हैं कि नॉर्वे में एक ऐसी भूमिगत और बहुत बड़ी तिजोरी है जिसमें दुनिया भर से हर तरह की फसलों के बीज और हर तरह के जीन को संरक्षित किया गया है ताकि अगर किसी कारण दुनिया नष्ट भी हो जाए, तब भी मानव को अनाज के बीज मिल जाएँ.

लेकिन मेढक की ये दलित महिलाएं दुनिया की तबाही का इंतज़ार करने के बजाए अपनी इस विरासत और संपत्ति को अभी से संभल कर रखने और जीवित रखने की कोशिश कर रही हैं.

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