मलाला पर हमला: पाकिस्तान में बवाल

 बुधवार, 10 अक्तूबर, 2012 को 19:51 IST तक के समाचार

भारत प्रशासित कश्मीर के शीर्ष अलगाववादी नेता सैयद अली गिलानी ने जहां 14 साल की मलाला युसुफ़ज़ई पर किए गए तालिबान के हमले की कड़ी निंदा की है, वहीं पाकिस्तानी मीडिया में मलाला पर हुए हमले का मामला लगातार तूल पकड़ रहा है.

पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में इन हनलों की निंदा करते हुए तालीबान के खिलाफ़ प्रदर्शन हो रहे हैं.

बीबीसी संवाददाता रियाज़ मसरूर के मुताबिक 84 वर्षीय गिलानी ने बुधवार को अपनी पुस्तक के विमोचन के दौरान कहा, "जो कुछ भी वे इस्लाम के नाम पर करते हैं मैं उसके लिए तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान की निंदा करने में संकोच नहीं करता."

मलाला युसुफ़ज़ई पर हमले को गिलानी ने "अनैतिक, बर्बर और अमानवीय" बताते हुए कहा कि पाकिस्तानी तालिबान निर्दोष लोगों पर हमला करके इस्लाम को बदनाम कर रहा है.

लड़कियों की शिक्षा के लिए अभियान चलाने वाली मलाला यूसुफ़ज़ई को उस समय गोली मारी गई थी जब वो स्कूल से घर वापस लौट रही थी.

मलाला

मलाला यूसुफ़ज़ई को उस समय गोली मारी गई थी जब वो स्कूल से घर वापस लौट रही थी.

मंगलवार को ये घटना स्वात घाटी के मुख्य शहर मिंगोरा में हुई. इस हमले में दो अन्य लड़कियां भी घायल हो गई थीं.

स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना

कश्मीर में भारत विरोधी राजनीतिक दलों के एक गठबंधन के प्रमुख गिलानी ने कहा,"हालांकि हम विदेशी शक्तियों के खिलाफ उनकी लड़ाई के लिए अफगानिस्तान के तालिबान का समर्थन करते है, जो कुछ भी वो इस्लाम के नाम पर करते है हम उसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं."

उन्होंने इस लड़की के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की और लोगों से अपील की कि वे इस्लामी मान्यताओं के लिए हिंसा का समर्थन न करें.

अपनी आत्मकथा के विमोचन के दौरान गिलानी ने कहा, "हर सभ्यता को अपने सिद्घांतों का प्रचार करने का अधिकार है. इस्लाम भी इस अधिकार की रक्षा करता है. इस्लाम में सशस्त्र संघर्ष की अनुमति केवल विदेशी हमलावरों से लड़ने के लिए दी गई है.''

"वुलर किनारे" नाम की इस किताब में उन्होंने अपने राजनीतिक करियर का बयौरा दिया है.

गिलानी ने इस मौके पर चरमपंथ के पीड़ितों को भी आमंत्रित किया था. इनमें गुलाम रसूल खान भी शामिल थे जिनके चार बेटे 22 वर्षीय बेटे हिंसा के दौरान मारे गए थे.

पाक मीडिया की प्रतिक्रिया

पाकिस्तानी मीडिया ने इस खबर पर अलग अलग तरीके से प्रतिक्रिया की है.

कराची का अंग्रेजी दैनिक 'एक्सप्रेस ट्रिब्यून' लिखता है, "यह घटना साबित करती है कि दुश्मन अब भी ज़िंदा है और हमेशा की तरह क्रूर बना हुआ है. ये घटना तालिबान के खिलाफ खड़े होने वालों पर क्रूर और खूनी दमनका सबूत है...निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने के लिए हर समय तैयार चरमपंथियों से वार्ता करने के बावजूद हुई यह दुखद घटना सवाल उठाती है.''

"पाकिस्तान और इस्लाम को बदनाम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस घटना को अनुचित कवरेज दे रहा है. बयान जारी करते समय सरकार और मीडिया को सावधान रहना चाहिए क्योंकि विदेशी तत्व इस ताक में रहते हैं कि पाकिस्तान को कैसे एक चरमपंथी और विफल राष्ट्र साबित किया जा सके."

उर्दू दैनिक 'उम्मत'

कराची से प्रकाशित होने वाले उर्दू दैनिक 'उम्मत' ने कहा, "पाकिस्तान और इस्लाम को बदनाम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस घटना को अनुचित कवरेज दे रहा है. बयान जारी करते समय सरकार और मीडिया को सावधान रहना चाहिए क्योंकि विदेशी तत्व इस ताक में रहते हैं कि यह कैसे साबित किया जा सके कि पाकिस्तान एक उग्रवाद और विफल राष्ट्र है."

टीवी की बात करें तो "दुनिया ऐट 8" कार्यक्रम में मुहम्मद मलिक ने कहा कि इस तरह की घटनाएं पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय आलोचना को उचित ठहराती हैं.

दोस्त और दुश्मन

एक्सप्रेस न्यूज़ पर एक अन्य कार्यक्रम 'कल तक' में जावेद चौधरी ने सरकार के वजीरिस्तान पर नियंत्रण की कमी पर विचार-विमर्श किया.

जियो न्यूज के कार्यक्रम 'आपस की बात' में मीर के साथ सलीम सफ़ी ने कहा कि चरमपंथ ने पाकिस्तान में गहरे मतभेद पैदा किए हैं जबकि कुछ समूहों के साथ वार्ता पर सरकार की नीतियां स्पष्ट नहीं हैं.

सफी ने कहा कि सरकार की उलझी हुई नीतियों की वजह से यह स्पष्ट नहीं है कि पाकिस्तान के दुश्मन और दोस्त कौन हैं.

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