इसराइल तक पहुँची कव्वाली

कव्वाली
Image caption शाई बेन करीब पंद्रह साल पहले भारतीय शास्त्रीय संगीत सीखने आए थे

सदियों से शांति और सद्भाव का सन्देश देती रही कव्वाली ने अब इसराइल में भी अपना मक़ाम बना लिया है. इसराइल के एक युवा संगीतकार शाई बेन पिछले कई सालों से हिब्रू भाषा में कव्वाली को लोकप्रिय बनाने में लगे हुए हैं.

वे कहते हैं कि कव्वाली में इंसानियत का पैगाम है, लिहाजा इसराइल में लोग इसे पसंद करने लगे हैं.

दक्षिण एशिया में दरगाह, इबादतगाह और खानकाहों में मुहब्बत और भाईचारे को स्वर देती रही कव्वाली ने इसराइल में भी अपने तलबगार पैदा कर लिए हैं. भारत से सफ़र तय कर कव्वाली इसराइल पहुंची तो उसका भाव वही था मगर भाषा बदल गई.

कव्वाली ने तेल अवीव और जेरुशलम जैसे शहरों में अपनी रूहानी रोशनी बिखेरी तो उसकी जबान हिब्रू थी. शाई बेन कव्वाली को अपने साथ ले गए तो इसके साथ कव्वाली के वो बोल और भाव भी थे जो सदियों से इंसानियत का पाठ पढ़ते रहे हैं.

शाई बेन कोई पंद्रह साल पहले शाश्त्रीय संगीत सीखने भारत आये तो कहीं महफिले-कव्वाली से रूबरू हुए और फिर इसके दीवाने हो गए.

उन्होंने अजमेर में महान सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के आस्ताने में रूहानियत की रोशनी में कव्वाली को देखा और फिर वो लम्हा आया जब वे खुद अपने मुल्क में हिब्रू में कव्वाली करने लगे.

वे कहते हैं, 'मुझे उम्मीद है कि मेरा संगीत कामयाब होगा, सूफियाना कलाम में मुहब्बत है, इंसानियत है और भाईचारा समाया है. जब लोग सुनते हैं, तो इसके भाव दिलों में उतर जाते हैं.'

शाई बेन ने अपने मुल्क इसराइल में कव्वाली के बहुतेरे कार्यक्रम प्रस्तुत किये हैं. वे कहते हैं, "ये बहुत पवित्र विधा है. ये उर्दू, फारसी और हिंदी में मौजूद है और समाज को राह दिखाती रही है, लेकिन हमारे लिए ये नयी विधा थी. लोग बहुत तल्लीनता से सुनते हैं. मेरे लिए भी ये अच्छाई की मंजिल तक पहुँचने का रास्ता है.''

शाई बेन कहते हैं कि उनके लिए बताना कठिन है कि हम कव्वाली के कितने कार्यक्रम आयोजित कर चुके हैं.

शादी

शाई बेन के लिये भारत एक घर हो गया है क्योंकि उन्होंने भारत में ही एक मुस्लिम परिवार में शादी की है.

भारत के कुछ कव्वाल और राजस्थान में मरुस्थल के लोक कलाकार शाई बेन के साथ कव्वाली में उनका साथ देने इसराइल जाते रहे हैं.

जैसलमेर के छुगे खान पांच साल से शाई बेन के साथ मंच पर अपने वाद्य यंत्र से साथ देते रहे है. उन्हें हिब्रू के बोल याद हो गए हैं और वे कहते हैं कि वहां इसाई, मुस्लिम और यहूदी सभी कवाली को बहुत गहराई से सुनते हैं. लोग इसे सकारात्मक रूप से लेते है.

संगीत में मुहब्बत की लय है. संगीत जब दरिया बन बहता है तो न कोई सरहद उसे रोक पाती है न संगीनें.

राजस्थान के निहाल खान इसी प्रवाह में शाई बेन के साथ इसराइल गए और ढोलक में संगत दी. वे कहते हैं कि इसराइल में जो भी सुनता है, सुकून महसूस करता है.

मध्य पूर्व के उस इलाके ने आसमा में जंगी विमानों का कोलाहल और फौजी बूटों की पदचाप सुनी है. इन फ़नकारो को उम्मीद है कि भारत से गई कव्वाली वहां अमन की आवाज बुलंद करती रहेगी .