वाड्रा की जाँच का आदेश देने वाले अफसर का तबादला

  • 16 अक्तूबर 2012
अशोक खेमका
Image caption अशोक खेमका का अपने 20 साल के कैरियर में यह 41वां तबादला है.

हरियाणा सरकार ने एक विवादास्पद फैसले में उस अधिकारी का तबादला कर दिया है जिसने सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी और डीएलएफ के बीच किए गए ज़मीन के करार की जांच का आदेश दिया था.

तबादले का आदेश आने के बावजूद अपना पद त्यागने से पहले इस अधिकारी ने वाड्रा के प्लॉट का म्यूटेशन रद्द कर दिया.

बीबीसी में बातचीत में इस अधिकारी अशोक खेमका ने कहा है कि अपने लगातार किए जा रहे तबादले से वो हतोत्साहित और बेइज्ज़त महसूस कर रहे हैं.

हरियाणा काडर के 1991 बैच के 47 वर्षीय आईएएस अधिकारी अशोक खेमका का अपने 20 साल के कैरियर में यह 41वां तबादला है. लेकिन इससे पहले किसी भी उनके तबादले पर इतना बवाल नहीं मचा जितना इस बार मचा है.

ट्रांसफर से ठीक पहले उन्होंने एक कंपनी और रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के बीच ज़मीन करार की जांच के आदेश दिए थे. इस कंपनी को सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी बताया गया है.

लेकिन फिर उनके तबादले के आदेश आ गए. हालांकि इंस्पेक्टर जनरल ऑफ रजिस्ट्रेशन का अपना पद त्यागने से पहले उन्होंने वाड्रा के प्लॉट का म्यूटेशन रद्द कर दिया.

क्योंकि यह कार्रवाई उनके तबादले के बाद हुई है इसलिए यह साफ नहीं है कि राज्य सरकार इसे वैध मानती है या नहीं.

हरियाणा सरकार का कहना है कि खेमका का तबादला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश अनुसार किया गया.

दिलचस्प बात ये है कि हरियाणा की मौजूदा भूपिंदर सिंह हुडा सरकार ने ही नहीं बल्कि पिछली सरकारों ने भी खेमका का बार बार तबादला किया.

बीबीसी हिंदी सेवा से बातचीत के दौरान खेमका ने कहा, "सभी राजनीतिक पार्टियाँ ऐसा करती रही हैं. इससे पहले भजनलाल, बंसीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की सरकारों ने भी मेरे साथ यही व्यवहार किया."

80 दिनों में तबादला

चौंकाने वाली बात यह है कि उनका यह तबादला केवल पद ग्रहण करने के 80 दिनों में ही किया गया है.

अपने तबादले के बाद उन्होंने मुख्य सचिव को एक चिट्ठी लिखकर शिकायत की है. खेमका ने बीबीसी को बताया, ''नियमों के मुताबिक एक पद पर दो साल तक रहना होता है लेकिन मेरा तबादला 80 दिन में ही किया गया है.'

खबरों के अनुसार उन्होंने गुड़गाँव, फ़रीदाबाद, पलवल और मेवात में वाड्रा की कंपनी के नाम से दर्ज की गई प्रॉपर्टी की जांच के आदेश दिए थे.

मानेसर का ये प्लॉट वाड्रा की कंपनी ने 7.5 करोड़ रुपए में खरीद कर डीएलएफ को 58 करोड़ रुपए में बेचा था.

तबादले के कारण

हरियाणा सरकार ने 28 मार्च 2008 को वाड्रा की कंपनी को इस प्लॉट पर हाउसिंग कॉलोनी बनाने की इजाज़त दी थी और लगभग दो महीनों बाद ही उनकी कंपनी ने डीएलएफ के साथ इसे बेचने का करार कर लिया.

बीबीसी से बातचीत करते हुए खेमका ने स्पष्ट तौर पर यह तो नहीं कहा कि उनके तबादले का कारण यह मामला है. उन्होंने कहा, ''यह तो तबादला करने वाले अधिकारी बता सकते हैं कि ऐसा क्यों किया गया. मैं क्यों कोई अंदाज़ा लगाऊं.''

खेमका ने कहा, ''किसी भी ईमानदार अधिकारी को प्रभावहीन करने का तरीका है कि उसका तबादला कर दिया जाए.''

पूछने पर कि इतने तबादलों के बाद उनका क्या कहना है, ''ज़ाहिर है कि मैं बेइज्जत और हतोत्साहित महसूस करता हूँ. आपका परिवार इससे प्रभावित होता है.''

इस बीच हरियाणा सरकार का कहना है कि खेमका का तबादला पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के आदेश अनुसार किया गया.

सरकार का कहना है कि यह पाया गया कि खेमका ने खुद ही स्पेशल कलैक्टर के अतिरिक्त पद से हटाए जाने के लिए अर्जी दी थी.

सरकारी बयान में कहा गया है, ''इसलिए सरकार ने यह आदेश जारी किया ताकि विभाग के काम पर फर्क न पड़े. उनके तबादले का कोई और कारण नहीं है.''

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