अगर मोनालिसा भारतीय होती तो?

  • 17 अक्तूबर 2012
मोनालिसा
Image caption मोनालिसा को मिला बनी-ठनी का रुप.

पश्चिम में रूप और सौंदर्य की प्रतिमूर्ति मोनालिसा पिछले पांच साल से राजस्थान में सौंदर्य की नायिका 'बनी-ठनी' के लिबास में कला प्रदर्शनियों की शोभा बनी हुई है.

राजस्थान के एक चित्रकार ने मोनालिसा को 'बनी-ठनी' के रूप में चित्रित किया है लेकिन कोई इसमें पूर्व और पश्चिम के मिलन की झांकी देखता है तो कुछ चित्रकार इसे ठीक नहीं मानते.

'बनी ठनी ' औरत की ऐसी चित्रकृति है जिसमे लोग सैंकड़ो सालों से राजस्थान के रूपसी वैभव को निहारते रहे है. अब उसने यूरोप के मोनालिसा का बाना पहन लिया है.

राजस्थान के शाही दौर में राजसी मोहब्बत के कई अफसाने सहारा की रेत पर इबारत बन कर उभरे, लेकिन बनी-ठनी वो प्रेम गाथा है जिसमे एक राजा ने अपने चहेते चित्रकार से सपनों की महबूबा को केनवास पर उतरवाया.

बनी-ठनी

किशनगढ़ रियासत के एक चित्रकार ने जब राजा की अनाम प्रेयसी को तस्वीर में उभारा तो उस बेपनाह खूबसूरती को हर देखने वाले ने बनी-ठनी का नाम दिया. ये किशनगढ़ के तत्कालीन राजा सावंत सिंह के दौर की बात है जब सौंदर्यकी गाथाओ में बनी-ठनी नायिका बन उभरी.

बनी-ठनी पहले राजा सावंत सिंह के ख्वाबों में आई, फिर केनवास पर उतरी. चित्रकार गोपाल खेतांची ने मोनालिसा को उसी-बनी ठनी चित्रों के जरिए रूपांतरित किया है.

वे अपने इस प्रयोग के बारे में कहते है, ''सौंदर्य के दो नजरिए हैं, एक यूरोप का और दूसरा राजस्थान का. सुंदरता तो सुंदरता है. मैंने इन दोनों का समागम किया है.इस प्रयोग को पेरिस और लंदन की कला जगत में बड़ी सराहना मिली है. वैसे तो सौंदर्य देखने वाले की आंखों में होता है. वहां के सौंदर्य में एक मांसलता है, थोड़ी मादकता है. अपने यहां सौंदर्य में नजाकत है, नफासत है.बनी-ठनी तो भारत के रूप का प्रतीक है.''

बनी-ठनी राजस्थान के रूप लावण्य का प्रतिबिंब बन गई है.उसमें नायिका की बादाम जैसी आँखे, धनुष सरीखी भौंए ,उभरी ठोड़ी ,लंबी अंगुलियां और गुलाबी अदा है.इसमें औरत का रूप सौंदर्य से भरपूर है.मगर उस खूबसूरती में इतनी गरिमा है कि वो किसी फैशन शो का हिस्सा नहीं लगती.

चित्रकृति

जाने माने शिल्पी और पद्मश्री से सम्मानित अर्जुन प्रजापति कहते है, ''बनी-ठनी एक ऐतिहासिक चित्रकृति है.दुनिया भर में इसका नाम है. उसमे नायिका के तीखे नाक नक्श है.जब ये पेंटिंग बनी, उस वक्त कैमरे नहीं थे. राजा बताते गए और उनका चित्रकार केनवास पर पेंटिंग बनाता गया. राजा बोलते गए कि उसका नाक तीखा और लंबा था.आंखे मछली की तरह थी, होंठ कमल की पतियों के आकार की , वो विवरण बताते गए और कृति बनती चली गई. किशनगढ़ की ये बनी ठनी पूरे विश्व में मशहूर हो गई. मेरे हिसाब से बहुत चर्चित पेंटिंग पर प्रयोग नहीं करना चाहिए.''

वे कहते है ऐसी चर्चित अनूठी कृति से छेडछाड़ ठीक नहीं है. खुद प्रजापति ने भी बनी-ठनी की एक चित्रकृति अपने हाथो से बनाई है, जो काफी चर्चित रही है.

प्रजापति कहते हैं, ''बनी-ठनी का मतलब है सुंदर रूप, वो महिला जो गहनों से सजी हो और अच्छा परिधान हो उसे कहते है बनी-ठनी.''

प्रेम और भक्ति

बनी-ठनी में राधा कृष्ण है तो प्रेम और भक्ति भी है.अब उसने मोनालिसा का बाना भी पहन लिया है.

कला समीक्षक ईश्वर माथुर बनी-ठनी का रूप वर्णन करते है और कहते है, ''मछली जैसी आंख, नाक और ठोडी. ये तीन उसके रूप की खास बाते हैं.उसका चटख रंग सबको आकर्षित करता है. अगर किसी ने इन खूबियों को समाहित किया है तो ठीक है क्योंकि किशनगढ़ के राजा को उस समय नागरीदास कहा जाता था. अगर वो बनी-ठनी नागरीदास की कल्पना के मुताबिक है तो इसे बनी-ठनी कहा जा सकता है.''

Image caption मोनालिसा के दुनियाभर में दीवाने हैं

माथुर कहते है बनी-ठनी और मोनालिसा का अपना अपना स्थान है. दोनों की तुलना नही की जा सकती. हां कलाकर का हर सृजन खूबसूरत होता है. लेकिन सौंदर्य के इन दोनों प्रतिमानों की तुलना करना ठीक नहीं है.

किशनगढ़ की चित्र शैली मुगल बादशाहत के दौर में पर्शिया के फराज से लाए गए चित्रकारों की कला का ही विस्तार माना जाता है.

इतिहास

मुग़ल बादशाह हुमायूँ ने फराज से चित्रकारों को बुलाया और प्रोत्साहित किया. बाद में ये रियासतों में पहुंची और नया रंग रूप अख्तियार किया.

चित्रकार एकेश्वर हटवाल मोनालिसा के राजस्थानी अवतरण पर कहते है, ''कलाकार ने अपनी पेंटिंग में मोनालिसा को राजस्थानी परिधान में संवारा है. गहने भी राजस्थानी है, शैली भी वही. बाकि उसकी मुस्कान मोनालिसा जैसी है. चित्र में उसका रूप वैभव वैसा ही है. मगर कलाकार ने उसे बनी-ठनी से जोड़ कर अपनी भावना को प्रदर्शित किया है.जैसे मोनालिसा महान कृति है.''

वे कहते हैं कि वैसे ही बनी-ठनी भी अनूठी है. इन दोनों को बराबर सम्मान मिलना चाहिए. ऐसे प्रयोग हर विधा में हो रहे है. ये संगीत में भी हो रहा है. इसे फुजंन कहते है. ये दो संस्कृतियो के मिलन का प्रयोग है. इसमें आनंद की सृष्टि होती है. ऐसे प्रयोग ठीक है और नई पीढ़ी इसे बहुत पसंद करती है.

सदियों पहले चित्रकार की कूंची ने औरत को केनवास पर उतारा तो न फैशन के मेले थे, ना कैटवाक. वो हाथ के हुनर का दौर था. अब कैमरे है, लेकिन केनवास पर वैसा सौंदर्य नहीं दिखता जो मोनालिसा के मुस्कान और बनी-ठनी का रूप लावण्य में है.

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