कैसे कर सकते हैं आप बबलू की मदद?

Image caption बीबीसी हिंदी के कई पाठकों ने बबलू की मदद की पेशकश.

जयपुर से रिक्शाचालक बबलू और उनकी बेटी पर नारायण बारेठ की भेजी मार्मिक रिपोर्ट को पढ़कर बीबीसी हिंदी के कई पाठकों ने मदद की पेशकश की है.

पैदा होते ही नवजात शिशु के सिर से माँ का साया उठ गया था, और अब बबलू पर ही उसकी देखभाल की जिम्मेदारी है.

बीबीसी को भेजे गए ईमेल में एनआईटी पटना के सहायक प्रोफेसर अभय कुमार लिखते हैं कि अगर उन्हें बबलू का पता या बैंक अकाउंट पता लगे तो वो उनकी मदद करना चाहेंगे.

इसी तरह बीबीसी हिंदी पाठक विकास शर्मा ने भी बबलू की मदद की पेशकश की है.

अंजनी कुमार राय लिखते हैं, “अभी आपकी साईट पर नारायण बारेठ की खबर पढ़ी; काफी दुःख हो रहा है और पीड़ा भी कि अभी भी अपने देश में हम लोग कितने अंधे है. एक रिक्शा वाला गली में एक बच्ची को टाँगे रिक्शा चला रहा है और किसी की नजर भी नहीं जा रही है.”

राजबाग रेडियो लिसनर्स क्लब, सीतामढ़ी, बिहार से अतुल कुमार लिखते हैं, “बबलू उस सभ्य समाज के लिए एक सबक है जहाँ बच्चियों के जन्म के बाद शोक मनाया जाता है.”

अमरीका के लॉस एजेंलिस से अमिताभ गाँधी कहते हैं कि वो और उनके दो दोस्त बबलू के लिए एक नया रिक्शा खरीदना चाहते हैं ताकि वो रिक्शा का 30 रुपया किराया बचाकर परिवार की मदद कर सकें.

वो कहते हैं कि बबलू जैसे लोग इज्जत के पात्र हैं ना कि किसी भीख के.

जालौर, राजस्थान से लक्षमण देसाई ने भी नारायण बारेठ को रिपोर्ट के लिए धन्यवाद दिया है.

बीबीसी के दिल्ली दफ्तर में भी बबलू की मदद के लिए फोन आ रहे हैं.

उधर बबलू ने बीबीसी को बताया कि उन्हें स्टेट बैंक ऑफ बीकानेर एंड जयपुर की ओर से एक रिक्शा और 10,000 रुपए का चेक मदद के तौर पर दिया गया हैं. बैंक ने बबलू के नाम पर एक खाता भी खोल दिया है.

बबलू ने इस मदद पर खुशी जताई है, हालाँकि वो अपनी सवा महीने की बच्ची की तबियत को लेकर भी चिंतित हैं जिसका इलाज भरतपुर के अशोक कुमार गर्ग अस्पताल में चल रहा है.

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