सीमाओं से परे लोकप्रिय साहित्यकार

सुनील गांगुली
Image caption सुनील गांगुली साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे

बांग्ला भाषी हिन्दुओं का सबसे बड़ा त्योहार- दुर्गा पूजा बुधवार को खत्म होने वाला है, लेकिन उससे ठीक एक दिन पहले बांग्ला साहित्य ने अपने महानतम साहित्यकारों में से एक सुनील गंगोपाध्याय को खो दिया.

हालांकि गंगोपाध्याय ने अपने करीब साठ वर्ष के साहित्यिक जीवन में सिर्फ और सिर्फ बांग्ला भाषा में लेखन किया, बावजूद इसके एक उत्कृष्ट साहित्यकार के रूप में देश भर में उनकी पहचान थी. फिलहाल वो साहित्य अकादमी के अध्यक्ष थे.

उन्होंने बांग्ला साहित्यिक पत्रिका देश के लिए वर्षों तक काम करते रहे.

उपन्यास, कहानी, पत्रकारिता जैसी साहित्य की विधाओं में नियमित और उत्कृष्ट लेखने के बावजूद सुनील गंगोपाध्याय कहते थे कि उन्हें कविता से उन्हें सबसे प्रिय है.

जाने-माने कवि नीरेंद्र नाथ चक्रवर्ती उन्हें याद करते हुए कहते हैं, “देश पत्रिका में उनकी पहली कविता मेरे संपादक रहते ही छपी थी. वो उस समय सिर्फ 15 साल के थे. मैं उस समय देश पत्रिका का कविता संपादक था.”

सुनील गंगोपाध्याय की बहुत सी कविताओं में नीरा नाम की एक महिला पात्र है जो कि बांग्ला भाषी लोगों के बीच बहुत लोकप्रिय है. वो कविता पर केंद्रित पत्रिका कृत्तिबास के संस्थापक संपादक थे. इस पत्रिका ने नई पीढ़ी के तमाम कवियों को एक मंच प्रदान किया.

उपनाम

सुनील गंगोपाध्याय ने अपने लिए कई उपनामों का प्रयोग किया- जैसे, नील लोहित, सनातन पाठक और नील उपाध्याय. नील लोहित के नाम से लिखे गए उनके रोमांटिक उपन्यास तो लोगों के बीच जबर्दस्त लोकप्रिय हुए. इसके अलावा सुनील गंगोपाध्याय ने कई ऐतिहासिक उपन्यास भी लिखे.

‘शेई सोमोए’ उपन्यास बंगाल में नवजागरण से पहले की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है जिसके लिए उन्हें साल 1985 में साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था. यह उपन्यास करीब दस साल तक सर्वेश्रेष्ठ बिकने वाले उपन्यासों में एक बना रहा. इसके अलावा उनके पूर्बा-पश्चिम, अरण्येर दिनरात्रि और प्रतिध्वनि उपन्यास भी काफी चर्चित रहे.

मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे ने सुनील गंगोपाध्याय के दो उपन्यासों- अरण्येर दिनरात्रि और प्रतिध्वनि पर फिल्म भी बनाई थी.

बांग्लादेश में बांग्ला भाषा की ऐसी शायद ही कोई पत्रिका या कोई अखबार हो, जहां सुनील गंगोपाध्याय की रचनाएं न छपी हों.

यही नहीं, बच्चों की एक पत्रिका आनंदामेला के लिए सुनील गंगोपाध्याय ने बाल उपन्यास भी लिखे.

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