क्या हवा हवाई है किंगफ़िशर की योजना?

Image caption फिलहाल किंगफिशर एयरलाइन्स के किसी जहाज़ को उड़ान भरने की अनुमति नहीं है.

किंगफिशर एयरलाइंस को अगर दोबारा काम शुरू करना है तो सबसे पहले बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी करनी चाहिए और बाज़ार में कदम तभी रखना चाहिए जब कंपनी करीब एक अरब डॉलर की पूंजी जुटा पाए- ये कहना है सेंटर फॉर एशिया-पैसिफिक एविएशन में दक्षिण एशिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कपिल कॉल का.

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) ने 20 अक्तूबर को किंगफिशर एयरलाइंस का लाइसेंस रद्द कर दिया था, यानि कंपनी अपने नेटवर्क और ट्रैवल एजेंटों के माध्यम से फिलहाल कोई बुकिंग नहीं कर सकती है.

किंगफिशर का कहना है कि ये अस्थायी निलंबन है और वो जल्द ही डीजीसीए को उड़ानें दोबारा शुरू करने की योजना पेश करेंगे.

इसके लिए किंगफिशर ने अपने हड़ताली कर्मचारियों को कुछ महीने का वेतन देने का भरोसा दिलाते हुए उन्हें काम पर लौटने का आग्रह किया है.

लेकिन बीबीसी संवाददाता दिव्या आर्य से बातचीत में उड्डयन मामलों के जानकार कपिल कॉल ने इसे कर्ज़े को बढ़ानेवाला कदम बताया. पढ़िए इस बातचीत के प्रमुख अंश.

किंगफिशर के कर्मचारियों को सात महीने से वेतन नहीं मिला, उनकी इस हालत के लिए कौन ज़िम्मेदार है?

दुख की बात ये है कि ये सही समय पर उपयुक्त फैसले ना लेने का नतीजा है. इसी वर्ष अप्रैल में जब किंगफिशर ने डीजीसीए को ये कहा कि वो अपनी उड़ानें कम करने जा रहे हैं, उन्हें उसी वक्त अपने कर्मचारियों की छंटनी करनी चाहिए थी.

20 हवाई जहाज़ चलाने के लिए 4,000 कर्मचारियों को क्यों रखा गया, ये समझना मुश्किल है.

अब भी अगर ये एयरलाइन दोबारा काम शुरू करने के बारे में सोच रही है तो उसे अब छंटनी का कड़ा फैसला कर लोगों को उनके बकाए पैसे देकर एक छोटी टीम के साथ आगे बढ़ना चाहिए.

क्या किंगफिशर अपने कर्मचारियों का बकाया पैसा देने और दोबारा काम शुरु करने की स्थिति में है?

किंगफिशर आधे मन से दोबारा कुछ नहीं कर सकता. उसे काम करने का मौका ही तब दिया जाएगा जब वो डीजीसीए को आश्वस्त कर सके कि उसके पास जहाज़ हैं, उन्हें चलाने के लिए ईंधन खरीदने की क्षमता है, पायलट और इंजीनीयर हैं.

उतना ही ज़रूरी है कि किंगफिशर 4,000 लोगों के साथ दोबारा काम शुरू करने का प्रयास ना करे, ये उसे और कर्ज़े में ही डुबोएगा.

वैसे तो इस एयरलाइन के दोबारा सफलता की सीढ़ी पर चढ़ने के आसार नहीं दिखते पर इस कोशिश भर के लिए किंगफिशर को करीब एक अरब डॉलर की पूंजी की ज़रूरत होगी.

इसके लिए ज़ाहिर तौर पर वो अपनी मूल कंपनी, यूबी ग्रुप, और बैंकों की तरफ ही हाथ बढ़ाएगी.

एक साल पहले तक बाज़ार में सबसे बेहतरीन मानी जाने वाली एयरलाइन किंगफिशर का ये हाल कैसे हो गया?

Image caption किंगफिशर एयरलाइन्स के कर्मचारी अपने वेतन दिए जाने की मांग के साथ कई प्रदर्शन कर चुके हैं.

किंगफिशर के इस पतन के पीछे मैं मोटे तौर पर मैनेजमेंट और कंपनी को बोर्ड के स्तर पर खामियां देखता हूं, रोज़मर्रा के कामकाज की देखरेख में भी और कंपनी की दिशा तय करने में भी.

ये अपने आप में इतनी बड़ी कमी है कि फिर और परेशानियां इसमें जुड़ती जाती हैं. मसलन कारोबार से जुड़े ग़लत फैसले फिर चाहे वो कंपनी के लिए बिसनेस मॉडल का चुनाव हो या खर्चों का अनुमान.

‘एयर डेक्कन’ को खरीदने का फैसला कितना सही था?

एयर डेक्कन की खरीद के सफल ना होने के पीछे कई वजहें थीं. उसे खरीदने के समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किंगफिशर एयरलाइंस के बहुत सारी प्रतिबद्धताएं थीं.

किंगफिशर ने पांच ए330 खरीदे थे, बैंगलोर-लंदन सेवा शुरू की थी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वो कई उड़ानें चला रहे थे.

उसी वक्त ईंधन के दाम बहुत तेज़ी से बढ़े और किंगफिशर के अलावा भारत की दो बड़ी एयरलाइंस को भी बड़ा नुकसान हुआ जिसकी भरपाई वो अब तक कर रहे हैं.

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