...वो मशहूर मसखरा था, आंख से कंठ तक भरा था

Image caption हास्य के माध्यम से समाज के ज्वलंत मुद्दों पर टिप्पणी करने वाले अभिनेता जसपाल भट्टी नहीं रहे.

हंसाने वाले लोग बड़ी मुश्किल से इस धरती पर अवतार लेते हैं. उसमें भी वो लोग जो उस श्रेणी के हों जो हंसी के पीछे आम लोगों के दर्द को पनाह देते हैं. वे स्वयं नहीं हंसते, उनकी बातों से जमाना हंसता है.

भट्टी साहब से हमारे संबंध तीन दशक पुराने थे. आकाशवाणी और दूरदर्शन के जमाने से हम एक दूसरे को जानते थे. नए साल के कार्यक्रम पर अक्सर हम मिलते थे जो शुरुआती दौर में 10 साल तक बनाए जाते थे, उसमें हम मनोहर श्याम जोशी के साथ आलेख बनाते थे.

इन कार्यक्रमों में जसपाल की कोई पेशकश ना हो ऐसा नहीं होता था.

वे पसंद करते थे कि वे अपनी छोटी-छोटी नाटिकाएं स्वयं प्रस्तुत कर के लाएं और बनाएं. ये विशेष छूट उन्हें दूरदर्शन की तरफ से दी जाती थीं. वो जमाना कमीशन प्रोग्राम का नहीं था तब दूरदर्शन के उपकरणों से ही सब कुछ करना होता था.

लेकिन 'उल्टा-पुल्टा' के जमाने से ही उन्होंने दूरदर्शन के अलावा स्यवं निर्माण के कौशल को दिखाया.

क्योंकि उस वक्त कई बार कैमरा नहीं मिलता था. उस समय आकाशवाणी और दूरदर्शन आचारसंहिता के नाम पर कोई भी व्यंग्य दिखाने में गुरेज करता था लेकिन जसपाल ने लोगों की पीड़ाओं को बहुत सजह तरीके से बहुत सहजता से परोसना शुरू किया.

हम क्रोध का परिणाम जानते हैं. पड़ोसियों में झगड़ा होता है जरा देर में गाली गलौज होने लगती है. एक भोले अपराधी गलत काम भी करते हैं, जो समाज में अक्सर हम देखते हैं, उनके दुष्परिणामों को भी देखते हैं लेकिन कहीं क्रोध नहीं आता.

उनके 'उल्टा-पुल्टा' के छोटे-छोटे एपिसोड देखिए या 'फ्लॉप शो' देखिए उनमें पड़ोसी, किराएदार-मकान मालिक के संबंधों की किचकिच हम रोजाना देखते हैं, लेकिन दूसरे रूप में देखते हैं. वो हास्य के जरिए क्रोध को समाप्त करने के लिए सामने वाले की शान बढाने का काम करते थे.

पीड़ा की अभिव्यक्ति

कहा जो तुमने गुस्से से वही हंसकर कहा....ये उनकी शैली थी. जसपाल भट्टी जी की शैली हंस कर कहने की नहीं थी, लेकिन हंसा के कहने की थी. आप ऐसे भोलेपन से अपराध करेंगे कि सामने वाला हंसेगा, उसके दुष्परिणाम भी भोगने होंगे.

अगर थानेदार आएगा वो कहेगा कि आपने गलत काम किया है वो तत्काल स्वीकार कर लेंगे, इसके दंड में आपको चार दिन तक थाने में रहना पड़ सकता है वो कहेंगे मुझे सात दिन रख सकते हैं आप, मेरी तो छुट्टी है. पत्नी कहेंगी ठीक है तुम हो आओ मैं सात दिन के लिए मायके चली जाती हूं.

उन चीजों में हम जहां असहज होते हैं वहां सहजता से हास्य उत्पन्न करना और उस व्यंग्य को सामने ले आना. जसपाल, उन जुगत और तिकड़मों के बीच आम लोगों की पीड़ाओं को सामने लाते थे.

उनका रचनात्मक जीवन बतौर कार्टूनिस्ट 'दैनिक ट्रिब्यून' से शुरू हुआ. आकाशवाणी में एक साक्षात्कार के दौरान मैंने पूछा था कि कार्टून बनाते समय आप किन बातों का ध्यान रखते हैं और उसकी रचना प्रकिया क्या होती है? तो उन्होंने कहा कि कार्टून तो हमारे जीवन में हर जगह इधर उधर फैले हुए हैं.

'सपने में बनाते थे कार्टून'

उन्होंने बड़ी दिलचस्प बात कही कि वो कार्टून नहीं बनाते कार्टून उन्हें बनाते हैं. वो भी सपने में. वो कहते थे कि वो सपने बहुत देखते हैं और सपने में उनकी स्क्रिप्ट तैयार हो जाती है.

अगर वे तत्काल देखे हुए सपने को तुरंत लिख ले तो उसे स्क्रिप्ट बनाने में बड़ी आसानी होती है. जीवन में जो कुछ भी उल्टा पुल्टा है उसे सीधे बताने में क्या मजा है. उसे उल्टा पुल्टा करके सामने रखते थे.

दूरदर्शन की कैंटीन में कितनी बार नए साल की तैयारी पर हम साथ बैठें. वे बहुत सौम्य रहते थे धीमे धीमे बोलते थे. एक बार का वाकया मुझे याद आता है, वेटर अगर थोड़ी देर कर दे तो वे कहते थे, 'हमें कोई जल्दी नहीं है'۔ और अगले ही मिनट प्लेट हमारी टेबल पर होता था.

दरअसल, उनका तरीका सुधारक का था. हास्य उनका साधन था. वे हास्य के जरिए मौन तपस्वी बन कर बदलाव लाने वालों में थे. नॉ़नसेन्स क्लब में जितने मुद्दे उठाए वो काफी संवेदनशील मुद्दे थे एक तरह से वे नुक्कड़ नाटक करते रहे.

लोकप्रियता की भूख नहीं

Image caption जसपाल भट्टी की फिल्म पावर कट 26 अक्तूबर को रिलीज़ होने वाली है

उन्होंने कभी नहीं चाहा कि नए युग के चैनल उन्हें दिखाते रहे जो भी वो समाज सुधार के लिए कर रहे हैं. लोकपाल पर भी उन्होंने बात की. वो कहते थे, “वो भी कोई स्वर्ग से उतर कर तो आएगा नहीं, उसमें भी खामिया होंगी. ऐसा आदमी ढूंढेंगे कहां से जो सर्वशुद्ध होगा."

वे एक इलैक्ट्रिकल इंजीनियर थे. और कहीं ना कहीं 'बिजली' उनकी स्क्रिप्ट में जरूर होती थी. आप जानते हैं कि जिस फिल्म के प्रमोशन के लिए वो गए हुए थे वो भी बिजली पर थी उसका नाम भी 'पावर कट' था.

बिजली ना रहने पर मध्यम वर्ग के घरों में किस तरह की समस्या आ जाती है ये हम जानते हैं. मैंने हालांकि फिल्म नहीं देखी है लेकिन मैं अनुमान लगा सकता हूं कि किस तरह मुद्दे उन्होंने इस फिल्म में उठाए होंगे. कैसे उन्होंने हमारे उपकरणों को फालतू बताया होगा. उन दिनों की याद दिलाई होगी जब बिजली नहीं थी. फिर भी हम काम चलाते थे.

बहरहाल हमारे जीवन में जितने मुद्दे हैं जैसे महंगाई है, भ्रष्टाचार सर्वत्र व्याप्त है, बेरोजगारी है. इन सब का पूरा चिंतन करुणा के केंद्र से प्रारंभ होता था, तकलीफों के केंद्र से प्रारंभ होता था.

भारत के चार्ली चैपलिन

'वो जो मशहूर मसखरा होगा, आंख से कंठ तक भरा होगा.' इस दर्द को वो कभी एक हितैषी सलाहकार बनकर तो कभी समाचार वाचक बन कर बताते थे.

खबरों को कुछ इस तरह पढ़ते थे कि आप जाने कि इस महंगाई के दौर में भी नेता ही एक ऐसे हैं जिन पर कोई फर्क नहीं पड़ा. वे कल भी दो कौड़ी के थे आज भी दो कौड़ी के हैं.

उन्हें कोई फर्क नही पड़ता. वो लतीफे गढ़ते थे. वे लतीफों के सहारे कोई कमेडी नहीं करते थे. वे एक रचनात्मक, सृजनशील कार्टूनिस्ट होते हुए भी 'लो प्रोफाइल' अभिनेता थे.

मैं अगर उनकी तुलना करना चाहूं, तो मै उनकी तुलना चार्ली चैपलिन से कर सकता हूं. जैसे उनके पूरे अभिनय में पूरे जमाने का दर्द था. फर्क इतना है कि वे उछल-कूद नहीं करते. उनके पास शब्द भरपूर होते थे और शब्दों की जो टाइमिंग होती थी, वो जो भोलापन था वो हमें हंसने को बाध्य करता था.

मैं एक और चीज से प्रभावित हुआ कि वे बहादूर थे. उन दिनों जब पंजाब में आतंकवाद भरपूर यौवन पर था उस समय में भी वो आतंकवादियों के खिलाफ हंसाने के लिए अपने नुक्कड़ नाटक को लेकर हजारों लोगों के सामने आए. आतंकवाद की बुराई करने की क्षमता रखते थे.

ऐसे सरल, सौम्य व्यक्ति को जो आम आदमी का प्रतिनिधित्व करता हो, जो संता और बंता की श्रेणी से अलग हट कर संता के बारे में ये सोचता हो कि, 'संता तेरा कुछ बनता कि नहीं बनता.'

वो सबकी स्थिति को बनाने के लिए ‘संत’ के तौर पर अवतरित हुए उनका जाना बहुत बड़ी क्षति है.

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