महंगाई की मार से अंगीठी गरमाई

रसोई गैस का दर्द

Image caption ऐसे कई लोग है जो अब रसोई गैस की जगह कोयले, लकड़ी का इस्तेमाल करने लगे हैं.

सरकार की इस घोषणा के बाद कि घरों में इस्तेमाल के लिए रियायती दामों वाले सिर्फ छ सिलेंडर ही मिलेगें, उन लोगों की मुसीबत की शुरुआत हो गई जो इस रसोई गैस से छोटे-मोटे काम किया करते थे. मसलन चाय या फिर ढाबे वाले.

ये लोग आम तौर पर व्यावसायिक गतिविधियों के लिए मिलने वाले सिलेंडरों का इस्तेमाल नही करते.

दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद और नोएडा में अब ऐसे छोटे दुकानदारों की संख्या बढ़ने लगी है जो अब रसोई गैस की जगह कोयले या फिर लकड़ी जैसे परंपरागत संसाधनों का इस्तेमाल करने लगे हैं.

यूँ तो मकनपुर गाँव के चौराहे के पास कई चाय वाले हैं, पर इनमें से एक इमरान हैं जिन्होंने अब गैस चूल्हे की जगह कोयले की अंगीठी का इस्तेमाल शुरु कर दिया है.

पूछने पर वो कहते हैं, "गैस अब रुलाती है. अब आप ही सोचिए कि गैस अगर 120 रुपए किलो बिकेगी तो पड़ता कहाँ से आएगा."

जो चाय अब तक पाँच रुपए में बिका करती थी वो अब सात रुपए की हो गई है.

चाय मंहगी के सवाल पर वो कहते हैं कि पहले भी गैस की तो हमेशा से ही काला बाजारी होती आई है.

पहले सिलेंडर 600- 700 रुपए में मिल जाया करता था. पर अब हालत ये है कि ब्लैक में सिलेंडर 1100 तक पहुंच गया और पर्ची पर तो इतने मिलते ही नही. इसलिए गैस बंद कर दी और अंगीठी से काम निकालते हैं.

इमरान बताते हैं कि ऐसा करने वाले सिर्फ वो अकेले नही हैं, बल्कि तमाम छोटे दुकान दारों ने ऐसा किया है.

पर अंगीठी जलाने पर जो काला धुआं निकलता है उससे होना वाला प्रदूषण इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं कि भई जब अंगीठी जलेगी तो धुंआ तो निकलेगा ही, इस बात को तो सरकार को समझना चाहिए.

सवाल गैस की काला बाजारी का है और ये भी कि जो छह सिलेंडर मिल रहे हैं उससे साल भर तक बड़े घर की रसोई तो चल नही सकती.

साल में रियायती दामों में छह सिलेंडरो के चलते लोगों ने एक आसान सा उपाय निकाला है और वो है कोयले व लकड़ी का विकल्प.

कोयले की ओर

पिछले पाँच साल से कोयले का कारोबार कर रहे चैता प्रसाद कहते हैं कि अभी तो महज ये शुरुआत भर है, आने वाले दिनों में देखिए क्या होता है ?

अभी तो कोयले का इस्तेमाल इतना नही है लेकिन आने वाले दिनों मे काफी हो जाएगा, क्योंकि अभी तो सिर्फ चंद दिन ही हुए हैं और लोगों के पास गैस है. लेकिन जब ये खत्म हो जाएगी तो फिर वो लकड़ी लगाएंगे, कोयला लगाएंगे या फिर बुरादे का इस्तेमाल करेंगे.

चैता प्रसाद कहते हैं कि सरकार सिलेंडर के दाम थोड़ा बढ़ा देती लेकिन ये छह वाली बात ठीक नही.

अब गाँव में सौ फीसदी लोगों के यहाँ गैस जलती है, सौ गाँवों में 90 गाँव ऐसे हैं जहाँ गैस का ही चूल्हा जलता है. पहले सब लकड़ी ही जलाया करते थे, शहर की स्थिति थोड़ी अलग है.

चैता प्रसाद सरकार की नीति से बेहद नाराज हैं, उऩका कहना है, “शहर में पति- पत्नी दो जने ही रहते हैं, इस हिसाब से सरकार नें आंकड़ा लगा कर छह सिलेंडर का हिसाब बैठा दिया, उनके यहाँ तो एक सिलेंडर दो महीने चल सकता है, पर गाँव का क्या, जहाँ दस-बारह लोगों का परिवार रहता है.”

लकड़ी हमेशा साथ है

चैता प्रसाद की तरह ही तीस साल के मिंटू लकड़ी की चाल चलाते हैं,यानी लकड़ियाँ बेचने का काम करते हैं.

वो भी सरकार के छह सिलेंडर वाली नीति से सहमत नही हैं.

उनका कहना है कि रसोई गैस पर ब्लैक इतना ज्यादा बढ़ गया है कि वो लोग जो बड़े सिलेंडर से छोटे सिलेंडर में गैस भरकर बेचने का काम करते थे. अब उनके हाथ भी कस गए हैं. वो रसोई गैस को इतनी ज्यादा कीमत पर बेच रहें हैं कि खरीदने वाले क्या खाएंगे.

मिट्टी के तेल के इस्तेमाल पर मिंटू कहते हैं कि एक तो तेल मिलता नही और जो मिलता है वो कौन सा सस्ता है, उस पर भी ब्लैक है. 40 से 42 रुपए लीटर का भाव है तो गरीब क्या करें.

वो कहते हैं, कुछ लोग तो अब लकड़ी पर आ गए हैं, यूं तो लकड़ी जाड़े में आग तापने के लिए या फिर शादी के मौसम में ज्यादा बिका करती थी, पर आज की तारीख में घर के काम के लिए भी लोग लकड़ी खरीदने लगे हैं और ये पिछले महीने से काफी बढ़ गया है.

कुल मिलाकर सरकार के छह रियायती सिलेंडरों से सरकार की तो झोली भर रही है, लेकिन इस चक्कर में बड़े परिवार पालने वाले आम आदमी की रसोई में चपत लगने लगी है.

साथ ही रसोई गैस पर भारी कालाबाजारी के चलते चाय ढ़ाबे जैसे छोटे दुकानदारों के पास कोयले या फिर लकड़ी का विकल्प ही बचा है.

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