उर्दू में क्यों बढ़ रही है लोगों की दिलचस्पी?

  • 3 नवंबर 2012
उर्दू किताबख़ाना
Image caption उर्दू की किताबो को बिक्री करने वाली दुकानों अभी तक पुराने शहरो में ही मिलती हैं.

उर्दू की किताबें हिंदुस्तान और बाहर के बाज़ारों में धड़ल्ले से बिक रही हैं.

भारत में उर्दू प्रकाशकों के छापेख़ाने जैसे रुकने का नाम ही नहीं ले रहे. कई ने तो पिछले पांच से आठ सालों के दौरान आठ से दस हज़ार नए शीर्षक छापे हैं.

अनुमान के मुताबिक़ आधे दशक से कम समय में ही उर्दू किताबों के बाज़ार में 25 फ़ीसद तक का इज़ाफ़ा हुआ है.

बॉलीवुड फ़िल्मों की विदेशों में दिन-प्रतिदिन बढ़ती लोकप्रियता ने हिंदी गानों, गीतों और ग़ज़लों में लोगों की दिलचस्पी को बढ़ाया है और हिंदी गानों के लेखक अभी भी भावनाओं और परिस्थितियों की अभिव्यक्ति के लिए ज़्यादातर उर्दू शब्दों का ही इस्तेमाल करते हैं.

'अर्थ से साहित्य तक'

पिछले साल लखनऊ में आयोजित पुस्तक मेले में पहुंचे कई विदेशी, इस्मत चुग़ताई से लेकर वाजिद अली शाह की किताबों की मांग कर रहे थे.

कनाडा से आए चैड वालसैक के हवाले से कहा गया, ''जज़्बात को बयां करने के लिए उर्दू सबसे बेहतर ज़बानों में से एक है. मैं उर्दू शायरी के बारे में और जानना चाहता हूं. ज़बान तहज़ीब का अहम हिस्सा है.''

पुस्तक मेले में जिन किताबों की मांग अधिक थी उसमें हिंदी-उर्दू शब्दकोष भी शामिल थे.

दिल्ली जामा मस्जिद के पास मौजूद मकतबा जामिया लिमिटेड के मैनेजर सैयद अज़ीज़ अहमद कहते हैं कि शब्दों के अर्थ, फिर सही उच्चारण जानने की कोशिश, कई दफ़ा भाषा और उसके साहित्य को जानने की ख़्वाहिश पैदा कर देती है.

वे कहते हैं, ''बात ग़ज़लों, फिर अल्फाज़ों को समझने से शुरू होती है, जिसके लिए डिक्शनरी ली जाती है. लेकिन कई दफ़ा ऐसा भी होता है कि मामला ग़ालिब, मीर और मोमिन तक पहुंच जाए.''

दूसरी भाषाओं का सहारा

ऐसे पाठकों को ध्यान में रखते हुए कुछ प्रकाशकों ने उर्दू के मक़बूल शायरों की गज़लों, गीतों और काव्य-ग्रंथों को हिंदी-उर्दू में साथ-साथ छापना शुरू कर दिया है.

सरकारी प्रकाशक 'उर्दू घर' ने फ़िराक़ गोरखपुरी, फ़ैज़ अहमद फैज़ और दूसरे उर्दू कवियों की रचनाओं को एक ही पुस्तक में साथ-साथ उर्दू और देवनागिरी लिपियों में प्रकाशित किया है.

लेकिन स्टार पब्लिकेशन के चेयरमैन अमर वर्मा कहतें है, "बढ़ती बिक्री को उर्दू ज़बान और अदब में आम लोगों की बेहद बढ़ी दिलचस्पी के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि उर्दू अदब के क्षेत्र में ज़्यादातर लोगों की दिलचस्पी महज़ शायरी तक महदूद है और उसे बेचने के लिए भी दूसरी भाषाओं की मदद की दरकार हो रही है."

Image caption पहले के मुक़ाबले अब प्रकाशन की क्वालिटी बेहतर है जिसने विदेशों के बाजा़र भी खोले हैं.

स्टार पब्लिकेशन ने उर्दू के 15 मशहूर शायरों की कविताओं के वैसे संग्रह प्रकाशित किए हैं जिनमें मूल उर्दू कृति को रोमन और हिंदी में भी मुहैया करवाने के साथ-साथ उनके अंग्रेज़ी अनुवाद भी मौजूद हैं.

मज़हब-शिक्षा-शोध

अमर वर्मा का मानना है कि उर्दू किताबों की जो बिक्री तेज़ हुई है वो मुख्यत: मज़हबी, उच्च शिक्षा और शोध से तालुक्क़ रखती हैं.

केंद्र और राज्य सरकारें उर्दू की तरक्क़ी के लिए विश्वविधालयों, सरकारी और स्वयंसेवी संस्थाओं को फंड मुहैया करवा रही हैं. संस्थाएं आर्थिक सहायता के कुछ हिस्सों को लाइब्रेरी को बेहतर करने पर ख़र्च कर रही हैं.

अमरीका पर हुए 9/11 के हमलों के बाद विश्व भर में इस्लाम को लेकर जिज्ञासा बढ़ी है.

सुन्नी समुदाय से संबंधित दो विचारधाराओं- देवबंदी और बरेलवी की जन्मस्थली भारत में ही है और ज़ाहिर है इन विचारधाराओं की व्याख्या करती अधिकतर पुस्तकें उर्दू ज़बान में ही मौजूद हैं.

प्रकाशन आसान

नई पीढ़ी ने प्रकाशन के काम को व्यावसायिक ढंग से चलाने की कोशिश की है.

पिछले कुछ सालों में तेज़ी से ऊपर आए फ़रीद बुक डिपो के मैनेजिंग डायरेक्टर नासिर ख़ान बताते हैं, "इस्लामी विचारधारा से संबंध रखनेवाले पुराने समय के प्रकाशक दूसरी विचारधारा से संबंधित किताबें नहीं छापते थे. लेकिन नई पीढ़ी ने इस रूढ़िवादिता से पीछा छुड़ा लिया है."

नासिर ख़ान के मुताबिक़ कंप्यूटर से पेज कंपोज़िग ने इसमें लगने वाले समय को कम कर दिया है और बेहतर प्रिंटिग तकनीक ने प्रकाशन को आसान और पहले की अपेक्षा सस्ता कर दिया है.

वो कहते हैं, ''पहले किताबें उतनी छापी ही नहीं जा रही थीं. साथ ही हमने डिज़ाइन पर भी बहुत तवज्जो दी है, जिसने नए बाज़ार खोले हैं.''

कंपनी के एक्सपोर्ट मैनेजर शाहिद अनवर कहते हैं कि उनके पास पाकिस्तान, बांग्लादेश के अलावा दक्षिण अफ्रीक़ा और बर्मा से भी सप्लाई आर्डर हैं.

स्टार पब्लिकेशन के मालिक भी मुझे टोक्यो विश्वविधालय से मिला एक बड़ा आर्डर दिखाते हैं.

संबंधित समाचार