वो गलियां लाशों से पटी पड़ी थीं.....

दिल्ली में 1984 के सिख दंगे
Image caption वर्ष 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके सिख सुरक्षागार्डों द्वारा हत्या के बाद दिल्ली में व्यापक सिख विरोधी दंगे हुए.

मैं तब इंडियन एक्सप्रेस में रिपोर्टर था. हमारे दफ़्तर में एक नवंबर को एक व्यक्ति आया जिसका नाम मोहन सिंह था.

उसने हमें बताया कि दो गलियों में पिछले 24 घंटों से सिखों का कत्लेआम चल रहा था और वो अपने बाल कटाकर, वहां से छुपता-छुपाता हमारे दफ़्तर आया था.

मैं अपने दो साथियों के साथ त्रिलोकपुरी के ब्लॉक 32 में गया. वहां पहुंचने पर हमने देखा कि वहां इंसानों की दीवार बनी हुई थी जो लोगों को आगे नहीं जाने दे रही थी. तभी वहां से पुलिस की मोटरसाइकिल निकली और हमने पुलिसवालों से पूछा कि क्या हुआ है. उन्होंने कहा कि कुछ नहीं हुआ है.

इतनी देर में हम पर पथराव हो गया. वहां से भागकर जब हम पास के पुलिस स्टेशन पर गए तो हमने देखा कि वहां एक ट्रक खड़ा था जिसमें छह सिखों की लाशें थीं और एक अधमरा लड़का था. हमने बहुत कोशिश की पुलिस को वहां ले जाने की लेकिन कोई नहीं आया.

शाम को फिर जब सात बजे हम त्रिलोकपुरी पहुंचे और जो मैंने वहां देखा वो मैं 28 साल के बाद भी नहीं भूल पाया हूं.

'लाशों से भरी गलियां'

उन दो गलियों में हम अपना पैर भी पूरी तरह नीचे नहीं रख सकते थे क्योंकि या तो वहां लाशे थीं या लोगों के अंग और बाल कटे पड़े थ. वहां की नालियां पूरी तरह खून से भरी पड़ी थीं.

48 घंटों तक लगभग 320 लोगों का कत्लेआम होता रहा. लोग अपने घर गए, खाना खाया और फिर आकर हत्याएं कीं. ये सब हुआ सिर्फ़ दो गलियों में.

अगले दो-तीन दिन मैं त्रिलोकपुरी गया, पश्चिमी दिल्ली भी गया. तब तक सेना बुला ली गई थी. अख़बारों में तो लिखा था कि सेना को शूट-एट-साइट ऑर्डर दिए गए हैं लेकिन असल में सेना को देखते ही गोली मारने के आदेश तीन दिन बाद इंदिरा गांधी के अंतिम संस्कार के बाद ही मिले.

सिखों के घरों के आस-पास भीड़ जमा थी, वे उनके घरों पर पथराव कर रहे थे. 80-80 साल की महिलाओं को घरों से निकाल कर भीड़ ने मारा. पुलिस वाले भी वहां मौजूद थे लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया, न ही उन्होंने कोई एक्शन लिया, न ही फ़ायरिंग की.

इंसाफ़ नहीं मिला

जो मैंने उन तीन दिन में देखा तब मेरी कोई प्रतिक्रिया नहीं थी. उस वक्त तो मैं सकते में था. गाड़ी चला रहा था, लोगों से बातचीत कर रहा था, उन्हें बचा रहा था.

आज जब मैं उस बारे में सोचता हूं तो मुझे आज भी रातों को नींद नहीं आती, रोंगटे खड़े हो जाते हैं. रोना आता है जब उन दिनों के बारे में सोचता हूं.

आज 28 साल हो गए लेकिन किसी भी पीड़ित को इंसाफ़ नहीं मिला है. अगर कुछ है तो ये कि भारत का नाम और भी ख़राब हुआ है. इन दंगों से जुड़े मुकदमों में शायद एक या दो लोग जेल में हैं. लेकिन 5000 लोगों की मौत के लिए अगर दो या तीन लोगों को जेल होना इंसाफ़ नहीं होता.

मैंने ख़ुद त्रिलोकपुरी से एक या दो बच्चों को बचाया जो उस वक्त सिर्फ़ कुछ महीनों के ही थे. आज वो पश्चिमी दिल्ली में रहते हैं. वो क्या सोचते होंगे, उन पर क्या बीत रही होगी, ये तो वही जानते हैं लेकिन इंसाफ़ नहीं मिला.

मैंने कोई आठ या नौ कमीशनों के सामने गवाही दी, व्यक्तिगत तौर पर मुक़दमें भी दायर किए लेकिन उसका कुछ हुआ नहीं. मैं इस घटना को शर्मनाक मानता हूं क्योंकि इसमें प्रशासन की मिलीभगत थी जो कि भारत में पहली बार हुआ था.

इसका कलंक तो भारत पर हमेशा रहेगा.

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