हिमाचल में भाजपा, कांग्रेस की साख की लड़ाई

  • 4 नवंबर 2012
सोनिया गाँधी

हिमाचल प्रदेश विधानसभा के लिए रविवार को हो रहे मतदान में 46 लाख से ज़्यादा मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं. राज्य में विधानसभा की 68 सीटों के लिए चुनाव हो रहा है.

इस चुनाव में सबसे बड़ा सवाल ये है कि हिमाचल की जनता राज्य की मौजूदा भाजपा सरकार से संतुष्ट है या नहीं. इस बार भी भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, बढ़ती महंगाई प्रमुख मुद्दे हैं जो सत्ताधारी भाजपा और विपक्षी कांग्रेस दोनों ही पार्टियों के भविष्य के लिए अहम हैं.

राज्य की राजनीति में अब तक यही होता रहा है कि हर पांच साल के बाद जनता सत्ताधारी पार्टी को हटाकर बारी-बारी से कांग्रेस और भाजपा के हाथ में सत्ता सौंपती रही है.

राजधानी शिमला से सटे कसुम्पटी में वामपंथी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े युवा कार्यकर्ताओं ने पिछले दिनों विधानसभा क्षेत्र के कोने-कोने का दौरा कर लोगों को ये बताने की कोशिश की है कि महंगाई और एलपीजी सिलेंडर की सीमा तय करने से 'आम आदमी' का जीवन कितना कठिन हो गया है और इसके लिए केंद्र की कांग्रेस सरकार ज़िम्मेदार है.

उनकी शिकायत है कि ये दोनो ही पार्टियाँ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और तीसरा विकल्प बेहतर है.

नुक्कड़ नाटकों, वॉयस मैसेज का इस्तेमाल

जब भारत सरकार ने एलपीजी सिलेंडर के दामों में 26.60 रुपए की वृद्धि की घोषणा की तो युवाओं ने आम लोगों पर इस बढ़ोत्तरी के दुष्प्रभावों को दर्शानें की कोशिश की. जब तक कांग्रेस सरकार हिमाचल के चुनावों पर इस फैसले के असर को समझ पाती, चुनाव अभियान में उसे नुकसान होना शुरु हो गया था.

पूर्व भारतीय वन सेवा अधिकारी कुलदीप तंवर कसुम्पटी से सीपीआई(एम) की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. वो कहते हैं कि उनके कार्यकर्ता लोकनृत्यों और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से आम आदमी को प्रभावित करने वाले मुद्दों जैसे भ्रष्टाचार और विकास में कमी को दर्शा रहे हैं.

तंवर कहते हैं, “ये तरीका वोटरों तक अपनी बात पहुँचाने के लिए प्रभावशाली है. चुनावी रैलियों की बजाय ये सबसे अच्छा और सस्ता तरीका है.”

पार्टियों ने वोटरों तक पहुँचने के दूसरे तरीके भी अपनाए. इनमें पोस्टरों का इस्तेमाल और वोटरों से मिलने का कार्यक्रम शामिल है. सीपीआई(एम) ने टीवी और अखबारों में चुनाव प्रचार पर धन नहीं व्यय किया.

उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की त्रृणमूल कांग्रेस पहली बार हिमाचल के चुनाव में हिस्सा ले रही है. उसने चुनाव में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के लिए राज्य भर में कई जगह बड़े-बड़े बैनर लगाए.

Image caption गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हिमाचल के मंडी में चुनाव प्रचार किया था

लेकिन ये तय माना जा रहा है कि भाजपा या कांग्रेस में से ही एक पार्टी सत्ता की बागडोर संभालेगी. इन दोनो पार्टियों ने चुनाव प्रचार में खूब धन खर्च किया. न केवल अखबार चुनाव प्रचार संबंधी विज्ञापनों से भरे रहे, बल्कि हाल ही में लांच किए गए टीवी चैनलों पर मुख्य नेताओं ने भी जमकर प्रचार किया.

कांग्रेस हिमाचल में सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही है. कई पर्यवेक्षक मानते हैं कि कांग्रेस ने भाजपा के मुकाबले प्रचार पर खासा खर्चा किया है.

करीब आधा दर्जन टीवी चैनलों के माध्यम से कांग्रेस ने भाजपा सरकार पर भ्रष्टाचार, निजी विश्वविद्यालयों को खोलने और वादा खिलाफी का आरोप लगाया है.

हिमाचल प्रदेश कांग्रेस उप-प्रमुख हर्ष महाजन कहते हैं, “मात्र 15-16 दिनों के लिए चुनाव प्रचार होने के कारण पहाड़ी इलाकों में हर व्यक्ति से संपर्क करना बेहद मुश्किल था. विज्ञापनों और नेताओं की चुनावी रैलियों ने मुश्किलों को कुछ आसान किया.”

भाजपा, कांग्रेस के 34 विद्रोही मैदान में

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने भी चुनावी रैलियों को संबोधित किया है.

चुनाव प्रचारों में एसएमएस और वॉयस मैसेज के जरिए प्रेम कुमार धूमल और वीरभद्र सिंह जैसे नेताओं के संदेश भी वोटरों तक पहुँचाए गए हैं.

लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी तकनीक के इस्तेमाल में सबसे आगे थे. मंडी जिले में उनके भाषण के कुछ मिनटों के बाद ही पूरा संवाद यूट्यूब पर मौजूद था.

हिमाचल में ये चुनाव विधानसभा चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन के बाद हो रहे हैं और इससे विधायकों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

मुख्यमंत्री खुद एक नए चुनाव क्षेत्र हमीरपुर सदर से चुनाव लड़ रहे हैं. उनका पूर्व चुनाव क्षेत्र बामसन रद्द हो गया है.

वीरभद्र सिंह भी एक नए चुनाव क्षेत्र शिमला (देहात) से चुनाव लड़ रहे हैं.

इस बार 459 चुनाव उम्मीदवारों में से 105 निर्दलीय हैं और इनमें से 34 उम्मीदवार भाजपा और कांग्रेस से विद्रोह करके चुनावों में उतरे हैं.

हिमाचल में 27 महिला चुनाव उम्मीदवार भी हैं और इनमें से वरिष्ठ कांग्रेसी नेता विद्या स्टोक्स भी हैं. हाल ही में बनी हिमाचल लोकहित पार्टी भी 36 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. इसका नेतृत्व पूर्व भाजपा नेता माहेश्वर सिंह कर रहे हैं. इस पार्टी ने वामपंथी दलों के साथ चुनाव गठबंधन किया है.

करीब 46 लाख मतदाताओं वाले हिमाचल में चुनाव गतिविधियों पर चुनाव आयोग गूगल और जीपीएस के माध्यम से नजर रखेगा.

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