माओवादियों को अब नहीं भाती जन अदालतें?

Image caption माओवादियों का कहना है कि उनके संगठन के कई फैसले 'स्थानीय जनता' के द्वारा ही लिए जाते हैं.

मुझे याद है वो अस्सी के दशक का अंत था और नब्बे के दशक की शुरुआत थी.... झारखंड अलग नहीं हुआ था और मैं तत्कालीन दक्षिण बिहार के धनबाद में एक अंग्रेजी अखबार के लिए काम किया करता था. ये वो दौर था जब माओवादी इन इलाकों में अपना प्रभाव स्थापित कर रहे थे.

परिस्थितियां उनके अनुकूल थीं क्योंकि जातिगत संघर्ष, बंधुआ मजदूरी, पिछड़ेपन और अभाव की वजह से लोगों में काफी आक्रोश पनप रहा था. 'सूखा पलामू, भूखा पलामू' वाले इलाके में तो सामंतियों का वर्चस्व था जो स्थानीय लोगों से 'गुलामी' करवाया करते थे.

माओवादियों ने लोगों को शोषण के खिलाफ एकत्र करना शुरू किया. वो इसमें कामयाब भी रहे. आहिस्ता...आहिस्ता उनका प्रभाव फैलता गया. एक शाम की बात है जब मैं धनबाद के अपने दफ्तर में था. दो दिनों पहले एक पुलिस वाले का माओवादियों ने गिरिडीह में अपहरण किया था.

उस शाम मेरे पास संगठन से संबंध रखने वाले एक सज्जन पहुंचे और उन्होंने मुझे एक 'जन अदालत' में चलने को कहा जिसमे उस पुलिसकर्मी को पेश किया जाना था.

'ये पुलिसकर्मी ईमानदार है'

दोपहर का वक्त था और गिरिडीह के नीरो गाँव के पास ग्रामीणों की भीड़ जमा थी. इसी बीच उस पुलिसकर्मी को लोगों की अदालत में पेश किया गया.

Image caption माओवादियों पर आरोप लगते रहे हैं कि वो खुद ही आम लोगों को पुलिस का मुखबिर क़रार देकर उन्हें मार डालते हैं.

माओवादियों द्वारा लगाई गई जन अदालत शुरु हुई, मगर कुछ ही देर में ग्रामीणों ने पुलिसकर्मी के अपहरण का विरोध ये कहते हुए किया कि वो एक ईमानदार इनसान है.

फिर ग्रामीणों ने माओवादियों से उस पुलिसकर्मी को छोड़ने की सिफारिश की....माओवादियों ने उस पुलिसकर्मी को न सिर्फ छोड़ दिया बल्कि माफ़ी भी मांगी.

कई सालों के बाद आज माओवादियों की कार्यशैली में बदलाव साफ़ नज़र आता है. चाहे वो सुरक्षा बलों पर हमला करने के तौर-तरीके हों या फिर आम लोगों से निपटने के तरीके.

बीते सालों में अब जन अदालतों का प्रचलन भी कम होता प्रतीत हो रहा है क्योंकि ज्यादातर मामलों में देखा जा रहा है कि जनमुक्ति छापामार सेना के दस्ते खुद ही इंसाफ करने लगे हैं. माओवादियों के आधार वाले इलाकों में अब जनता नहीं बल्कि छापामार दस्तों के सदस्य खुद सजा देने का काम कर रहे हैं.

माओवादियों की जनमुक्ति छापामार सेना यानी पीएलजीए का गठन वर्ष 2000 में हुआ था. माओवादी गतिविधियों पर नज़र रख रहे विश्लेषकों को लगता है कि पीएलजीए के गठन के बाद से ही जन अदालतों का प्रभाव या यूँ कहा जाए चलन, कम हुआ है.

चाहे वो झारखंड हो या छत्तीसगढ़ या फिर ओडिशा, इन इलाकों में पिछले कुछ सालों से देखा गया है कि माओवादियों ने खुद ही किसी को पुलिस का मुखबिर करार देकर उसे मार डाला. पहले इन आरोपों में पकडे गए लोगों को जन अदालतों में पेश किया जाता था और इन अदालतों में मौजूद स्थानीय लोग ही इन लोगों के भाग्य का फैसला करते थे.

बस्तर संभाग में तैनात पुलिस अधिकारी सुरजीत आत्रेय का कहना है कि अब इस तरह का आरोप जिन पर लगता है माओवादी उनको अपनी सफाई देने का मौक़ा भी नहीं देते हैं और उनकी बेरहमी से हत्या कर देते हैं.

'जन अदालतों का महत्व कम नहीं'

Image caption माओवादियों के आधार वाले इलाकों में अब जन अदालतों का उतना प्रचलन नहीं रह गया है .

कुछ दिनों पहले मैंने भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की दंडकारण्य विशेष एरिया समिति के प्रवक्ता गुड्सा उसेंडी से इस बारे में चर्चा की तो उन्होंने इसका खंडन किया.

वो कहते हैं कि ऐसा बिलकुल नहीं है और आज भी जन अदालतों का उतना ही महत्व है जितना पहले रहा है. उनका कहना था कि उनके संगठन के कई फैसले 'स्थानीय जनता' के द्वारा ही लिए जाते हैं.

उनका दावा है कि जनमुक्ति छापामार सेना के गठन के बाद से उनका आंदोलन और मज़बूत और प्रभावशाली हुआ है क्योंकि अब हथियारबंद दस्ते और आम लोग मिलकर फैसले ले रहे हैं.

वर्ष 2004 में माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) और सीपीआई-एमएल (पीपुल्स वार) का विलय हुआ और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का गठन हुआ. हालांकि विलय के बाद माओवादी मध्य और पूर्वी भारत में एक बार फिर मज़बूत हुए मगर इनकी कार्यशैली में बड़ा परिवर्तन आया है.

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि दोनों अति वामपंथी गुटों का विलय तो हुआ मगर इसके साथ ही नए संगठन के शीर्ष नेतृत्व की पकड़ नीचे के 'काडरों' पर कमज़ोर होती चली गई. उन्हें लगता है कि यही बड़ा कारण है जिसकी वजह से माओवादियों के आधार वाले इलाकों में अब जन अदालतों का उतना प्रचलन नहीं रह गया है .

हाल ही में संगठन की ओडिशा कमिटी के सचिव सब्यसाची पांडा की बगावत और उनके द्वारा संगठन के नेतृत्व को लिखी गयी चिठ्ठी से भी पता चलता है कि माओवादियों की कार्यशैली में कितना बड़ा बदलाव आया है.

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