विज्ञापन: जागरुकता की कला या ब्रांड का भला

  • 5 नवंबर 2012
द हिंदू का विज्ञापन
Image caption द हिंदू के इस विज्ञापन द्वारा संसद में नेताओं के दुर्व्यवहार पर कटाक्ष किया गया है

भारत तमीज़ से पेश आओ, युवा देख रहा है! अंग्रेज़ी अख़बार 'द हिंदू' की इस सलाह को युवा सिर्फ देख ही नहीं रहा बल्कि इसे सोशल मीडिया पर सराहा भी जा रहा है.

'द हिंदू' के इस विज्ञापन में संसद की कार्यवाही के दौरान नेताओं के अभद्र व्यवहार पर कटाक्ष किया गया है.

विज्ञापन की दुनिया के जानकार लोगों का मानना है कि एक वक्त था जब विज्ञापन दर्शकों को सपनों की दुनिया में ले जाते थे, पर बीते कुछ वर्षों से ये सामाजिक हक़ीकत के ज़्यादा करीब होते जा रहे हैं.

जानकारों का मानना है कि चाय से लेकर कपड़े धोने की साबुन तक हर उत्पाद का ब्रांड खुद को मौजूदा हालातों के साथ जोड़कर दिखाने की कोशिश में लगा है. फिर वो टाटा टी का 'जागो रे अभियान' हो या फिर 'व्हाट एन आयडिया सर जी'.

ब्रांड का भला

'द हिंदू' अखबार के लिए विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी ओ एंड एम के नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर पीयूष पांडे कहते हैं, ''हर ब्रांड को वही करना चाहिए जिसमें वो यकीन रखता है. जैसे हिंदू अखबार अपने संपादकीय के लिए जाना जाता है, वो हमारे देश की अच्छी-बुरी मान्यताओं को सामने लाना चाहता है तो ये विज्ञापन यकीनन उसकी मदद करेगा.''

वहीं टाटा चाय के 'जागो रे' अभियान को बनाने वाले आर बाल्की ने बताया कि इस अभियान के पहले ही साल में टाटा-टी की बिक्री दोगुना हो गई थी.

ब्रांड और मुद्दे के बीच प्रासंगिकता की बात पर बाल्की ने कहा कि चाय का काम होता है जगाना और उनका विज्ञापन भी मूलतः जागने की ही बात कर रहा है.

इस मामले में समाजशास्त्री पुष्पेश पंत अलग राय रखते हैं. वे कहते हैं, "विज्ञापन के पूरे मायाजाल को सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में गंभीरता से लेना मुझे सार्थक नहीं लगता. बल्कि मुझे लगता है कि ये ज़रूरत से ज़्यादा चुस्त फिकरेबाज़ी, कटाक्ष करना, अप्रत्यक्ष रूप से कहना, आखिर इसका अर्थ क्या है, ये समय तो दो टूक बात करने का है."

समाज का आइना ?

विज्ञापन जगत से जुड़े जोज़ी पॉल तो विज्ञापन को समाज का आईना मानते हैं .

जोज़ी के मुताबिक आज ब्रांड चाहते हैं कि उनके विज्ञापन में सामाजिक संदर्भ हो क्योंकि दर्शक भी अब जागरुक हो गया है और वो विज्ञापन को देखना नहीं, उसका हिस्सा बनना चाहता है.

भ्रष्टाचार या चुनाव जैसे मुद्दों का सहारा लेकर ब्रांड के प्रति लोगों का ध्यान बटोरने पर समाजशास्त्री पुष्पेश पंत कहते हैं, ''विज्ञापन बनाने वालों की मंशा इन सामाजिक मुद्दों की दुम पकड़कर अपने धंधे को आगे बढ़ाने की रहती है. जिस तरह कोई माल बेचा जा सकता है उसी तरह विचार भी बेच दिया जाता है.''

ब्रांड के लिए ड्यूटी पूरी करते हुए ये विज्ञापन कभी-कभी हकीकत की सीटी बजा देते हैं जिसे गंभीरता से लेना या उससे सहमत होना शायद ज़रुरी नहीं पर, उसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है.

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