'मैं रिक्शा वाला क्यों बना?'

गौरव जैन

गौरव जैन ने दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई की है. फ़िलहाल वो सप्ताह में छह दिन रिक्शा चलाते हैं और अपने अनुभव अपने ब्लॉग के ज़रिए शेयर करते हैं. बीबीसी हिंदी पर उन्होंने अपनी अब तक की यात्रा का सार लिखा है.

वैसे थोड़ा पागल तो मैं शुरू से ही रहा हूं. और यक़ीन मानिए, ये अपने-आप में एक पूरा जवाब है कि आखिर मैं एक रिक्शावाला क्यों बना. लेकिन अगर आप इससे ही संतुष्ट नहीं हैं तो आइए मिलकर कोशिश करते हैं जवाब ढूंढने की, क्योंकि शायद इससे पहले मैंने भी कभी इतनी गहराई से इस बारे में नहीं सोचा!

ज़्यादातर जन कल्याण योजनाओं के आलोचक अक्सर ये तर्क देते हैं कि "सरकार ज़मीन से जुड़ी नहीं है". वो कहते हैं कि कि लोगों की क्या ज़रूरते हैं, ये एसी कमरों में बैठने वाले मंत्रियों और नौकरशाहों को पता ही नहीं है. जिस तरह की विवादास्पद नीतियां सरकार और योजना आयोग द्वारा बीते कुछ सालों में लाई गई हैं, उनसे इस तर्क को और भी बल मिलता है.

तो मुझे कहीं-न-कहीं ये लगा कि अगर मुझे अपने लोगों को बेहतर तरीके से जानना है और ये समझना है कि ग़रीबी क्या होती है, तो एक दर्शक की तरह इसे समझ पाना थोड़ा मुश्किल होगा. इसके लिए मुझे वो ज़िंदगी जीनी होगी.

मगर ग़रीबी के तो कई रूप हैं और एक रिक्शे वाले से कहीं ज़्यादा भयावह. लेकिन शायद एक रिक्शा वाला बनना मुझे सबसे ज़्यादा सहज और व्यावहारिक लगा. वो इसलिए क्योंकि साइकिल चलाना मेरा शौक है. मैंने अपनी साइकिल पर पिछली दिवाली के दौरान महाराष्ट्र दर्शन भी किया....12 दिनों में 1000 किलोमीटर. भले ही मानसिक रूप से न सही लेकिन शारीरिक रूप से मैं ज़िंदगी के लिए सबसे ज़्यादा तैयार था.

मैंने फ़ैसला तो कर लिया था पर वो कितना सही था, उस पर संशय के काले बादल मंडरा रहे थे... उस समय भी जब मैं 10 सितंबर की सुबह आठ बजे घर से निकल रहा था ! किसी तरह मैं उस आवाज़ को अनसुना करते हुए राजा रिक्शा गैराज पहुंचा. मेरे बारे में कुछ सवाल-जवाबों के बाद 70 नंबर का रिक्शा मुझे दे दिया गया. अब मैं आधिकारिक रूप से रिक्शे वाला बन गया था.

बेईमान भी और ईमानदार भी

लेकिन मुश्किल ये थी कि मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी इलाके की कोई जानकारी नहीं थी. हिंदू कॉलेज से शक्ति नगर या फिर ऐसे ही कई और न तो रास्ते पता थे और न किराया! अनुभवी दोस्तों ने सलाह दी कि सब सवारी पर छोड़ दो.

मुझे बताया गया, "10 में से आठ सवारियां आपको जायज़ किराया ही देंगी. और जो नहीं देंगी वो आपको सिखा देंगी कि अगली बार कितना किराया लेना है."

तरकीब अच्छी थी. अपनी 'ट्रेनिंग' के दौरान मुझे ऐसे लोग भी मिले जो मीठी-मीठी बातें बना कर मुझे चांदनी चौक तक केवल 25 रूपये में ले गए और ऐसे भी जो बिना कुछ बोले 20 रूपये की जगह 100 रूपये दे कर चले गए.

कॉलेजों के सामने लगी लंबी लाइनों में सवारी के लिए घंटों इंतज़ार करना एक बड़ा ही "आंखें खोलना वाला" अनुभव था.

आखिर दिल्ली वालों को लाइन में लगना कहां पसंद है!

लेकिन रिक्शे वालों का अनुशासन मेट्रो स्टेशन पर देखने को नहीं मिलता. वहां तो जंगल राज है. एक दूसरे की सवारी काटना, स्टेशन में अंदर तक घुस जाना, सवारियों, ख़ासकर लड़कियों, को चारों तरफ़ से घेर लेना, मेट्रो स्टेशन पर सब जायज़ है. जिसने जितनी चतुराई और बेशर्मी दिखाई, उसने उतना ही कमा लिया और जो बेचारा सवारी के इंतज़ार में अपने रिक्शे पर बैठा रहा, वो बैठा ही रह गया.

इस सबके बीच जब कोई अपनी सवारी मुझे दे देता ताकि मैं बोहनी या पहली कमाई कर लूं, तो मैं हैरान रह जाता.

मगर इससे भी ज़्यादा हैरानी और ख़ुशी मुझे अपने नए दोस्तों की कहानियां जान कर होती.

हौसला नहीं खोना चाहिए

बिहार के बांका ज़िले से आए संजय तूरी, जो अब मेरे सबसे अच्छे दोस्त है, का मानना है कि "आज के समय में शिक्षा ही संपत्ति है."

संजय ख़ुद भले ही न पढ़ पाए हों लेकिन अपने तीनो बच्चों को पढ़ा रहे है. अपनी दो बेटियों और एक बेटे की उम्र वो जन्मदिन के साथ बताते है.

वो कहते हैं, "मुझे आज तक नहीं पता कि मेरी उम्र कितनी है या मेरा जन्मदिन कब आता है. इसलिए मैंने फ़ैसला किया था कि अपने बच्चों के साथ मैं ऐसा नहीं होने दूंगा."

रमेश यादव जी के लिए रिक्शा चलाना बांए हाथ का खेल है क्योंकि उनका दांया हाथ है ही नहीं.

वो पिछले 10-12 सालों से वो रिक्शा चला रहे हैं. गांव में 3-4 बीघा खेत और रिक्शे की मिली-जुली आमदनी से ही उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ाया और दो बेटियों की शादी भी की.

जब उन्होंने कहा कि "इंसान को हौसला नहीं खोना चाहिए", उस वक्त मैं उनसे नज़रें नहीं मिला पाया क्योंकि मेरी आंखों में आंसू थे.

ऐसा नहीं है कि मैं दिन भर सिर्फ़ मेहनत मज़दूरी ही करता हूं. मौज-मस्ती भी पूरी होती है. सवारी का इंतज़ार करने के दौरान सभी अपनी-अपनी कहानियां, मिर्च-मसाला लगा कर सुनाते हैं जिसमें गालियों की कोई कमी नहीं होती.

हालांकि इस हंसी-ठिठोली में ये बात भी अक्सर मुंह से निकल जाती है कि "दिन भर में कुछ नहीं कमाया". बड़ी विडंबना है कि एक तरफ़ तो रसोई गैस, सब्ज़ी, दाल से लेकर सभी कुछ महंगा होता जा रहा है, वहीं दूसरी ओर रिक्शे का किराया दिन-पर-दिन गिरता जा रहा है.

लोग जायज़ किराया भी नहीं देते क्योंकि उन्हें पता है कि एक नहीं तो दूसरा जाएगा. मजबूरी का नाम रिक्शा वाला!

लेकिन पैसा, घर, परिवार और आराम की कमी से भी ज़्यादा रिक्शे वालों को अगर कुछ खलता है तो वो है इज़्ज़त की कमी. और इस घाव को कुरेदने का काम सबसे बेहतर तरीके से अगर कोई करता है तो वो है पुलिस.

पुलिस की मनमानी

पुलिस वालों का जब मन करता है वो मेट्रो स्टेशन पर खड़े रिक्शे वालों को खदेड़ने लग जाते हैं....बातों से नहीं बल्कि गालियों, डंडों और लातों से. और जब इस सब से उनका पेट नहीं भरता तो अपना 'ब्रह्मास्त्र' निकाल लेते हैं. आम भाषा में इसे सूआ बोलते हैं--लकड़ी के हत्थे में लगी 4 इंच लंबी लोहे की पैनी सलाख.

अभी मुझे दो हफ़्ते भी नहीं हुए थे जब मैं इस हथियार का शिकार बना. पहले तो ट्रैफ़िक हवलदार (विनोद कुमार) ने मेरा रिक्शा पंक्चर किया और मेरे सवाल पूछने पर मुझे दो थप्पड़ भी रसीद कर दिए. उस पर मेरी एफ़आईआर लिखने से साफ़ इंकार करके एसएचओ साहिबा ने जले पर नमक छिड़क दिया.

फिर लगभग एक महीने बाद पुलिस हवलदार( राम नरेश) ने थप्पड़, मुक्के और लातों से मेरा स्वागत कर डाला. क्यों ? शायद इसलिए क्योंकि मैं मेट्रो स्टेशन पर चुपचाप खड़ा था. मेरी शिक़ायत पर मुझे 'मेडिकल' जांच के लिए हिंदू राव अस्पताल ले जाया गया जिसमें डॉक्टर ने मेरे सूजे हुए होंठ का ज़िक्र भी किया. लेकिन फिर वही ढाक के तीन पात...कोई एफ़आईआर दर्ज नहीं की गई.

जब मुझे जैसे "पोस्टग्रैज्युएट रिक्शे वाले" को भी पुलिस गोल-गोल घुमाती रहती है तो फिर मेरे बाकी दोस्तों का क्या हश्र क्या करती होगी जो ज़्यादातर पढ़े-लिखे नहीं हैं. जब क़ानून के रक्षक ही इंसान ही इंसान को इंसान न समझे तो उम्मीद कहां रह जाती है? खैर छोड़िए...एक रिक्शे वाले को इतनी बड़ी-बड़ी बातें शोभा नहीं देती.

मुझे नहीं पता कि मैं इस प्रयोग से क्या हासिल करने वाला हूं. मेरा मक़सद तो बस ये जानना था कि एक रिक्शा वाला होने का क्या मतलब होता है. मैं अपने अनुभवों को अपने ब्लॉग पर लिखता हूं लेकिन क्या मैं इस पर किताब भी लिखूंगा या कोई डॉक्यूमेंट्री बनाऊंगा, मुझे अभी पता नहीं. लेकिन उम्मीद है कि इस प्रयोग के बाद भले ही समाज में न सही, मैं अपने आप में कुछ बदलाव देख पाऊंगा.

गौरव जैन के ब्लॉग पर जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते है http://cycletorickshaw.blogspot.in/

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