घी को बनाया विरोध का हथियार!

घी
Image caption चकवाडा में दलितों के चूल्हे चौके में घी का इस्तेमाल 1936 से शुरू हुआ

सदियों पहले चार्वाक ने कहा था कर्ज लेकर घी पियो और मौज से जियो, लेकिन क्या घी किसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध बदलाव का ज़रिया हो सकता है?

राजस्थान के जयपुर ज़िले में चकवाडा गांव के दलित पिछले 76 साल से छूआछूत के खिलाफ खानपान में देसी घी का इस्तेमाल कर रहे हैं, क्योंकि आज़ादी से पहले किसी समय दलितों ने चकवाडा में भोज किया तो कथित रूप से ऊँची जात के लोगों ने उन्हें मारा-पीटा और भोज में मिट्टी डाल दी. तब से वे प्रतिकार स्वरूप देसी घी का प्रयोग कर रहे हैं.

जयपुर से कोई साठ किलोमीटर दूर चकवाडा में दलित परिवारों के लिए घी के पकवान मुंह के ज़ायके से ज्यादा वैचारिक भोजन हैं. आयुर्वेद में घी औषधि का हिस्सा है तो संस्कृत में शुद्ध घी के पूजा पाठ और हवन में इस्तेमाल का विवरण दर्ज है, लेकिन इन दलितों के लिए घी, परिवर्तन और प्रतिकार का माध्यम बना हुआ है.

'गंगा भोज'

दलितों के चूल्हा चौकी में घी का इस्तेमाल 1936 की एक घटना के बाद शुरू हुआ जब दलितों ने गांव में 'गंगा भोज' का आयोजन किया और देसी घी से पकवान बनाए. इसका ऊँची जात के लोगों ने भारी विरोध किया और भोज में विघ्न डाल दिया.

चकवाडा में दलितों में से एक बाबूलाल बेरवा अतीत में झांक कर कहते हैं, उस समय ऊँची जात के लोग बहुत खफा हुए और दलित भोज में देसी घी का इस्तेमाल ऊँची जात का आपमान माना गया क्योंकि ऊँची जात के लोग मानते थे कि देसी घी समाज के उच्च वर्ग के लिए ही है.

उस समय शाही दौर था, इसके बावजूद जयपुर रियासत ने दलित की सुनवाई की और ऊँची जात के लोगों के विरुद्ध कार्रवाई भी की. मगर इस घटना ने दलितों में चेतना पैदा की और सभी ने प्रण किया कि अब सभी हमेशा देसी घी का प्रयोग ही करेंगे.

देसी घी इस्तेमाल से रोका

Image caption चकवाडा गांव के दलित पिछले 76 साल से छूआछूत के खिलाफ खानपान में देशी घी का इस्तेमाल कर रहे हैं

दलित अधिकार कार्यकर्ता पीएल मीमरोथ कहते हैं कि खुद अम्बेडकर ने अपने एक लेख में चकवाडा की इस घटना का जिक्र किया और बताया कि कैसे दलितों को देसी घी इस्तेमाल करने से रोका गया.

चकवाडा के हरिशंकर बैरवा पहले विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता थे और कार सेवा के लिए अयोध्या तक गए थे. मगर वे कथित छूआछूत से इतने आहत हुए कि हिन्दू संगठनों का साथ छोड़ दिया.

वे कहते हैं चाहे कितनी ही महंगाई हो जाए, देसी घी का प्रयोग उनके लिए स्वाभिमान का हिस्सा बन गया है, ''उस समय एक सौ मन की सामग्री का भोज किया था. ये 1936 की बात है."

बैरवा के मुताबिक़, "ऊँची जात वालों का कहना था कि अगर दलित घी खाएंगे तो हम क्या करेंगे. हमारे भोज में कचरा डाल दिया और दलित न केवल पिट कर लौटे बल्कि भूखे पेट वापस गए, तभी से ही हमारे बुजर्गो ने तय किया कि घी उनके लिए दलित अभिमान का हिस्सा है, तब से ही घी खा रहे हैं.''

कोई नौ साल पहले इसी चकवाडा में सार्वजनिक तालाब के पानी को लेकर दलितों और ऊँची जात के लोगों के बीच भारी द्वंद्व हुआ. तब गाँव में पुलिस चौकी स्थापित करनी पड़ी थी. अब दलित आज़ादी से तालाब का वैसे ही इस्तेमाल करते हैं जैसे और लोग. उधर गांव में सवर्णों ने छूआछूत की बात से इंकार किया है.

चकवाडा के एक दलित श्रीकृष्ण कहते हैं देसी घी के प्रयोग से उनमें बराबरी का भाव पैदा हुआ है, ''अब हमें हीनता का बोध नहीं होता. हालाँकि हमें संघर्ष करना पड़ा है. मगर इससे हमें समानता का अधिकार भी मिला है.''

समाज विज्ञानी प्रोफेसर राजीव गुप्ता कहते हैं दरअसल हमारे सामाजिक संबंध मूलतः शक्ति संबंध हैं. शक्ति की अवधारणा हमारी पहचान से स्थापित होती है. इस घटना में दलितों को देसी घी खाने से रोकने का प्रयास उनकी पहचान को चोट पहुंचाना था. लिहाजा देसी घी दलितों की पहचान और स्वाभिमान से जुड़ गया. ये उनके सम्मान का हिस्सा बन गया है.

दीपक और बाती के साथ घी रोशनी के रूप में प्रकट होता है, अंधेरे को पराजित करता है.चकवाडा के दलितों को लगता है घी ने सामाजिक भेदभाव के अंधकार को परास्त करने में उनकी बड़ी मदद की है.

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