फल बेचकर जगा रहे शिक्षा का अलख

 बुधवार, 14 नवंबर, 2012 को 09:04 IST तक के समाचार

स्कूली बच्चों के साथ हरेकाला हजाब्बा.

दक्षिण भारत के एक गरीब निरक्षर फल बेचने वाले हरेकाला हजाब्बा ने सीमित संसाधनों के साथ जो कर दिखाया है वो राज्य सरकारें और कई संगठन अक्सर मिलकर भी नहीं कर पाते.

हरेकाला हजाब्बा ने फल की अपनी छोटी-सी दुकान से हुई आमदनी से पहले अपने गांव के बच्चों के लिए प्राथमिक और माध्यमिक स्कूल बनवाया और अब एक विश्वविद्यालय बनवाने की तैयारी में हैं.

बंगलौर से 350 किलोमीटर की दूरी पर स्थित न्यूपाड़पू गांव में सड़कें बदहाल हैं और जगह-जगह पर कीचड़ है लेकिन स्कूल जाने को तैयार 130 बच्चों की फौज के लिए ये मुश्किलें कोई मायने नहीं रखतीं.

साल 2000 तक इस गांव में एक भी स्कूल नहीं था लेकिन 150 रुपए प्रतिदिन कमाने वाले हरेकाला हजाब्बा ने अपनी जमा पूंजी से गांव में पहला स्कूल बनवाया जिसे अब दक्षिण कन्नड़ ज़िला पंचायत हाई स्कूल के नाम से जाना जाता है.

प्रेरणा

"एक बार एक विदेशी ने मुझसे एक फल का नाम अंग्रेज़ी में पूछा तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं निरक्षर हूं. मुझे नही पता था कि इसका क्या मतलब है."

हरेकाला हज्जाबा

पचपन वर्षीय हजाब्बा कहते हैं, ''एक बार एक विदेशी ने मुझसे एक फल का नाम अंग्रेज़ी में पूछा तब मुझे इस बात का एहसास हुआ कि मैं निरक्षर हूं. मुझे नही पता था कि इसका क्या मतलब है.''

वो कहते हैं, ''तब मुझे ये ख्याल आया कि गांव में एक प्राइमरी स्कूल होना चाहिए ताकि हमारे गांव के बच्चों को कभी उस स्थिति से गुज़रना ना पड़े जिससे मैं गुज़रा हूं.''

स्थानीय लोग हरेकाला हजाब्बा की इस कोशिश के लिए उनकी प्रशंसा करते नहीं थकते लेकिन हजाब्बा के लिए प्रशंसा से ज़्यादा ज़रूरी है वो मिशन जो उन्होंने शुरु किया है.

साल 2000 में जब उन्होंने इस स्कूल की शुरुआत की तब उन्हें किसा से कोई सहयोग नहीं मिला. इसके बावजूद उन्होंने ये एक स्थानीय मस्जिद से सटे मदरसे में ये स्कूल खोला और 28 बच्चों के साथ पढ़ाई-लिखाई का काम शुरु हुआ.

सरकार की भूमिका

सबसे पहले एक स्थानीय मस्जिद से सटे मदरसे में स्कूल खोला. समय के साथ स्कूल की ये इमारत बनकर तैयार हुई.

जैसे-जैसे स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ी उन्हें बड़ी जगह की ज़रूरत महसूस हुई. तब उन्होंने कर्ज़े के लिए अर्जी दी और अपनी जमा-पूंजी से स्कूल की एक इमारत बनाने की शुरुआत कर दी.

हजाब्बा की इस लगन को देखकर कई लोग आगे आए और उनकी मदद में जुट गए. लेकिन हजाब्बा के लिए काम अभी खत्म नहीं हुआ है.

भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक देश की 25 फीसदी आबादी निरक्षर है और कई बच्चे सिर्फ इसलिए स्कूल नहीं जा पाते क्योंकि उनके गांव में स्कूल मौजूद नहीं.

एक स्थानीय अखबार ने जब हजाब्बा की कोशिशों के बारे में लिखा तब सरकार ने उनकी मदद के लिए एक लाख रुपए दिए.

हजाब्बा कहते हैं, ''मुझे सरकार की ओर से एक पुरस्कार दिया गया जिसमें मुझे एक लाख रुपए की राशि दी गई. इसके बाद लोगोंने भी मेरी मदद के लिए पैसे भेजने शुरु किए.''

तब से अब तक हजाब्बा को कई तरह की मदद और पुरस्कार मिल चुके हैं और आम लोग उन्हें समाज का नायक मानते हैं.

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