बाल ठाकरे के बाद कौन.... उद्धव या राज ?

Image caption शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे

बाल ठाकरे की मौत ने कम से कम दो कटु प्रतिद्वंद्वियों को साथ आने के लिए सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया है.

शिव सेना के हल्कों में बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे को उनका स्वाभाविक उत्तराधिकारी माना जाता था. राज का उठने बैठने और यहाँ तक कि भाषण देने का अंदाज अपने चाचा पर गया था.

बाल ठाकरे के पुत्र उद्धव ठाकरे को भी पार्टी में ऊँचा मुकाम हासिल था लेकिन लोकप्रियता और स्वीकार्यता में वह अपने चचेरे भाई राज ठाकरे से उन्नीस बैठते थे.

उद्धव को तरजीह

लेकिन जब बाल ठाकरे के सामने इन दोनों में से एक को अपना उत्तराधिकारी चुनने का मौका आया तो उन्होंने अपने पुत्र उद्धव को अपने भतीजे राज पर तरजीह दी.

राज यह अवहेलना बर्दाश्त नहीं कर सके और उन्होंने अपनी अलग पार्टी महाराष्ट्र नव निर्माण सेना बना ली. पिछले विधानसभा चुनाव में जहाँ शिव सेना को 44 सीटें मिली थीं, राज ठाकरे की एमएनएस 14 सीटें जीतने में सफल हुई थी.

दोनों भाइयों के बीच राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ती चली गई.

लेकिन पिछले दिनों जब उद्धव ठाकरे को दिल की बीमारी हुई तो राज ठाकरे न सिर्फ उन्हें देखने अस्पताल पहुँचे बल्कि उन्हें अपनी कार में बिठा कर वापस मातोश्री लाए.

कयास लगाए गए कि राज के इस कदम के पीछे बाल ठाकरे का हाथ था. राज ने यह बात छिपाई भी नहीं. उन्होंने स्वीकार किया कि वह कार से मुम्बई से बाहर जा रहे थे.

Image caption शिव के करीब आ रहे हैं राज ठाकरे

तभी उनके पास बाल ठाकरे का फोन आया कि उद्धव को उनकी जरूरत है. उन्होंने तुरंत अपनी कार वापस मोड़ी और उद्धव को देखने अस्पताल चल दिए.

राज की इस पहल पर कई लोगों की भौंहें उठी लेकिन दोनों कैंपों से यही प्रतिक्रिया आई कि इसके राजनीतिक अर्थ नहीं लगाए जाने चाहिए.

लेकिन अगर राज ठाकरे के इस कदम को बारीकी से देखा जाए तो इसके गहरे राजनीतिक माने समझ में आते हैं.

भारतीय जनता पार्टी, शिव सेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठबंधन कम से कम कागज़ पर अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एनसीपी गठबंधन को हराने की क्षमता रखता है.

दिल की बीमारी

बाल ठाकरे जैसे राजनीतिक रूप से सजग इंसान के लिए मौके की नज़ाकत को भांपना और उसका राजनीतिक फायदा उठाना बाएं हाथ का खेल है.

बाल ठाकरे अब नहीं रहे. वह अपनी पारी खेल चुके हैं. उनके घोषित उत्तराधिकारी उद्धव को एक महीने के अंदर दिल के दो-दो ऑप्रेशन कराने पड़े हैं.

अंतिम क्षणों में बाल ठाकरे का अपने नाराज भतीजे से संपर्क साधना और उन्हें अपने चचेरे भाई से मतभेदों को दूर करने के लिए राजी करना, एक राजनीतिक सूजबूझ भरा कदम माना जा सकता है..

सूत्रों की मानी जाए तो बाल ठाकरे का फ़ॉर्मूला था कि अगले विधानसभा चुनावों के बाद राज को शिव सेना विधानमंडल दल का नेता बनाया जाए और उद्धव को पार्टी नेतृत्व की कमान दी जाए.

सूत्र यह भी कहते हैं कि राज को इस फ़ॉर्मूले से कोई आपत्ति नहीं है लेकिन उद्धव की तरफ से इसे हरी झंडी नहीं मिली है.

शायद यह बाल ठाकरे के राजनीतिक क़द का कमाल है कि इस असंभव से समझे जाने वाले प्रस्ताव पर गुप चुप तरीके से ही सही, लेकिन विचार तो चल रहा है. लेकिन देखने वाली चीज यह होगी कि ठाकरे के जाने के बाद दोनों भाई उनकी विरासत को अक्षुण्ण रख पाते हैं या नहीं.

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