कैसे देखरेख होती है अलज़ाइमर के मरीजों की...

अलज़ाईमर केयर गिवर
Image caption संगीता शर्मा अलज़ाईमर के मरीज़ों के लिए एक केयरहोम चलाती हैं.

पिछले कुछ समय से बीबीसी हिंदी आपकी मुलाकात कुछ ऐसे पेशेवर लोगों से करवा रही है जो लीक से हटकर काम करते हैं या वे ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिनके बारे में लोगों के पास काफी कम जानकारी है.

इसी कड़ी में बीबीसी संवाददाता स्वाति अर्जुन ने बात की दिल्ली के पास बसे फ़रीदाबाद शहर में अलज़ाइमर के मरीज़ों के लिए केयर-होम चलाने वाली संगीता शर्मा से. अलज़ाइमर ऐसी बीमारी है जो वृद्धावस्था और कई बार उससे पहले भी किसी व्यक्ति की हाल-फिलहाल की घटनाओं को याद करने की अक्षमता से संबंधित है.

प्रस्तुत हैं इस बातचीत के कुछ अंश:

एक पेशे के तौर पर इस काम के बारे काफी कम सुना गया है. विस्तार से बताएं कि आखिर अलज़ाइमर मरीज़ के केयर-गिवर का मूल काम क्या होता है?

मैं फरीदाबाद में जो रिस्पाईट-होम चलाती हूं वहां ऐसे मरीज़ों की देखभाल का काम दिन-रात जारी रहता है.

हमारे दिन की शुरुआत सुबह उन्हें चाय पिलाने और बाहर टहलाने के लिए लेकर जाने से होती है. उसके बाद उन्हें नहला-धुला कर योग या एक्सरसाईज़ करवाए जाते हैं.

नाश्ता करवाने के बाद हम उनके साथ कैरम-बोर्ड, लूडो या शतरंज जैसे इन-डोर खेल खेलते हैं. इस दौरान हर मरीज़ की रुचि के अनुसार उन्हें म्यूज़िक सुनवाना, मेडिटेशन या पेंटिंग भी करवाई जाती है.

दोपहर के खाने के बाद हम उन्हें सुलाते हैं और शाम को फिर से उन्हें जगाकर बाहर लॉन में घुमाते और योग करवाते हैं. रात के खाने के बाद हम उन्हें बिल्कुल एक बच्चे की तरह सुलाते हैं.

एक अलज़ाइमर के मरीज़ की केयर-गिवर के तौर पर आपने अब तक कहां-कहां काम किया है?

मैं एक प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक हूं और शुरु से ही 'एम्स' के न्यूरोलॉजी विभाग में कार्यरत हूं. मैंने यहीं पर अपने काम के दौरान ही इन लोगों के बारे में जाना है और इनके साथ काम किया है.

Image caption अलज़ाईमर के मरीज़ ज्यादातर 60 की उम्र के उपर के होते हैं.

आपने कब और कैसे तय किया कि आपको इसी प्रोफेशन में अपना करियर बनाना है?

एम्स में ही न्यूरोलॉजी विभाग में अपने काम के दौरान मैंने कई अलज़ाइमर मरीज़ को वहां आते देखा था. अक्सर उनके केयर-गिवर परेशान रहते थे और जिस तरह की देखभाल इन मरीज़ों को मिलनी चाहिए उन्हें वो घर पर नहीं मिल पाती थी. वहीं से मेरे मन में एक रिस्पाईट होम खोलने का विचार आया.

जब भी आपके पास अलज़ाइमर का कोई नया मरीज़ आता है तब आप ये कैसे तय करते हैं कि उन्हें किस तरह की देखभाल की ज़रुरत होती है?

जिन मरीज़ों को माईल्ड अलज़ाइमर होता है हमें उनकी ज़्यादा देखभाल करने की ज़रुरत नहीं होती क्योंकि वो काफी काम खुद कर लेते हैं. लेकिन मॉडरेट या गंभीर रुप से बीमारी से ग्रसित मरीज़ों को अधिक देखभाल की ज़रूरत पड़ती है. इस तरह के मरीज़ अपने हाथों से खाना भी नहीं खा पाते. उन्हें नहाने-धुलाने से लेकर शौच कराने की ज़िम्मेदारी भी हमारी होती है. कुछ तो बिल्कुल ही बिस्तर पर पड़े होते हैं जिनके साथ हमें चौबीस घंटे रहना पड़ता है.

काम के दौरान आपको सबसे ज़्यादा किस बात का ध्यान रखना पड़ता है?

हमें सबसे ज़्यादा ध्यान इन मरीजों की सुरक्षा और सलामती पर लगाना पड़ता है. कई बार मरीज़ को होश नहीं होता और वे बिना किसी को बताए कहीं भी चले जाते हैं. ऐसे में ज़रुरी ये है कि उन्हें जहां भी रखा जाए वहां उनके लिए भरपूर खुली जगह हो.

हम एक टैग बनाकर उनके कपड़ों में पिन कर देते हैं. उनके हाथों में कड़ा पहना दिया जाता है जिसमें उनका नाम और केयर-होम का पता लिखा होता है ताकि अगर ग़लती से वो कहीं गुम भी हो जाएं तो कोई उन्हें वापिस पहुंचा सके.

क्या इस पेशे में इतना पैसा है कि कोई भी युवा इसे अपना करियर बनाकर आत्मनिर्भर हो सकता है?

मैं सिर्फ इतना कहना चाहूंगी कि ये काम धीरज का है. बुज़ुर्गों के साथ तालमेल बिठाना आसान काम नहीं है लेकिन एक बार वे अगर ऐसा कर पाते हैं तो सफलता निश्चित है.

क्या कोई संस्थान इस काम की ट्रेनिंग देता है?

भारत में जेराटिक केयर के लिए तो एक छह महीने का कोर्स कराया जाता है लेकिन अलज़ाइमर के मरीजों के लिए ऐसा कोई पढ़ाई नहीं होती. ये एक तरह से कुदरती गुण है जो हम समय के साथ-साथ ऐसे लोगों का ध्यान रखते-रखते सीख जाते हैं.

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