इच्छा मृत्यु माँगने वाली बनी ज़िंदादिली की मिसाल

दिल्ली की गुनगुनी धूप में कुछ दिनों पहले एक दोपहर मैं गुरुद्वारे के एक कमरे में सोनाली मुखर्जी नाम की युवती से मिलने पहुँची. बुलंद और आत्मविश्वास से भरी उसकी आवाज़ ने मेरा स्वागत किया.

सोनाली की हालत के बारे में मुझे पता था लेकिन फिर भी उनसे मिलने के बाद जो देखा और सुना उसके लिए मैं कतई तैयार नहीं थी.

27 साल की सोनाली का चेहरा जलकर बहुत बुरी तरह खराब हो चुका है और वे अब देख भी नहीं सकतीं. खूबसूरत और प्यारी सी सोनाली को जिसने पहले देखा हो उसके लिए सोनाली को अब पहचाना मुश्किल होगा.

उनका चेहरा किसी हादसे में नहीं जला. करीब दस साल पहले कुछ लड़कों ने उनके चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया था...जब वो रात को गहरी नींद में सो रही थीं.

सोनाली मौत के मुँह से लौटी हैं. लेकिन पिछले दस सालों में जिन शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक तकलीफों से सोनाली होकर गुज़री हैं उसके बारे में सोचकर ही सिहरन सी होती है.

आज सोमवार को उनकी दूसरी सर्जरी हो रही है. एक समय इसी सोनाली ने अपने हालात से तंग आकर इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई थी लेकिन आज वो ज़िंदादिली की मिसाल हैं.

जैसे आग की भट्टी में डाला हो...

ये बात 2003 की है. सोनाली झारखंड में धनबाद में रहने वाली सामान्य सी लड़की थी. एक मिल में सिक्योरिटी गार्ड का काम करने वाले चंडीदास मुखर्जी की बेटी. कम आमदनी के बावजूद चंडीदास मुखर्जी अपनी बेटी को पढ़ा लिखा रहे थे.

सोनाली ने हमें बताया, “ज़िंदगी बहुत अच्छी नहीं थी तो बहुत बुरी भी नहीं थी. पढ़ाई के साथ-साथ मैं एक निजी कंपनी में काम भी करती थी. मन में बहुत सारे सपने थे और उमंगें थी. इस बीच कुछ लड़के मुझे आते जाते परेशान करने लगे जैसा कि समाज में अकसर होता है. काफी दिनों तक मैं इन लड़कों को नज़रअंदाज़ करती रही. लेकिन छींटाकशी बंद नहीं हुई तो एक दिन मैने हिम्मत दिखाई और उन्हें आगाह किया. उन लड़कों को टोकने का खामियाज़ा मैं आज तक भुगत रही हूँ.”

सोनाली को उस दर्दनाक रात का एक-एक लम्हा याद है. उन्होंने बताया, “वो 22 अप्रैल 2003 की रात थी. मैं, पिताजी और मेरी बहन छत पर सोए हुए थे. रात को ढाई बजे का समय था. वही लड़के जो मुझे छेड़ा करते थे, वो बदला लेने के इरादे से आए और मेरे चेहरे पर तेज़ाब फेंक दिया. मेरा चेहरा बुरी तरह जल गया और तेज़ाब आँखों में चला गया. ऐसा लग रहा था कि किसी ने मुझे आग की भट्ठी में डाल दिया हो, इतनी जलन हो रही थी. आँखों के सामने अंधेरा हो गया था, मैं रो रही थी और रोते रोते बेहोश हो गई.”

जब ये हादसा हुआ तो सोनाली मात्र 17 साल की थीं.

ज़मीन, गहने सब बिक गया..

Image caption कॉलेज के दिनों में सोनाली की तस्वीर

मैं काफी हिचकिचाते हुए सोनाली के सामने अपने सवाल रख रही थी लेकिन सोनाली के जवाबों में कोई हिचकिचाहट नहीं थी. शायद वक़्त के थेपड़ों ने उन्हें इतना मज़बूत बना दिया था.

चेहरे पर तेज़ाब फेंका जाना तो मुसीबतों की शुरुआत भर थी. धनबाद में तुरंत ठीक से इलाज नहीं हो सका तो डॉक्टरों ने बोकारो भेज दिया.

सोनाली बताती हैं, “सबसे बड़ी चुनौती थी कि इलाज के लिए पैसा कहाँ से आए. मेरे पिता एक मिल में सिक्योरिटी गार्ड थे, मुझे बचाने के लिए पिताजी ने अपनी ज़मीन और घर के गहने बेच दिए. लेकिन ये पैसे भी खत्म हो गए. हमें कहा गया कि दिल्ली के सरकारी अस्पताल में जाओ. मेरा चेहरा 70 फीसदी जल चुका था और बहुत महंगा इलाज था. इन परिस्थतियों में हम दिल्ली आए और सफदरजंग अस्पताल में तीन चार साल इलाज चला. इस बीच मेरी 22 सर्जरी हुईं.”

पिता के सामने एक तरफ बेटी की जान बचाने की कोशिश थी और दूसरी ओर कानूनी कार्रवाई की जद्दोजहद.

सोनाली बताती हैं, “कोर्ट में तीन साल तक सुनवाई चलती रही. घर में जो भी बची खुची संपत्ति या पैसे थे वो कानूनी कार्रवाई में चली गई.. ज़िला कोर्ट से उन लड़कों को अंतत नौ साल की सज़ा मिली. मेरे हिसाब से नौ साल की सज़ा बहुत कम है”.

लेकिन सोनाली के लिए वो सदमे भरा दिना था जब उसे पता चला कि अभियुक्तों को हाई कोर्ट से ज़मानत मिल गई है.

आवाज़ उठाने की हिम्मत दिखाई

साल दर साल सोनाली गुमनामी, मायूसी और लाचारी के भंवर में फँसती जा रही थीं. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि सोनाली ने एक दिन दुनिया के सामने आवाज़ बुलंद करने की हिम्मत जुटाई?

सोनाली बताती हैं, “मुझ पर हमला करने वाले लोग खुले आम घूमने लगे. मेरा परिवार झारखंड में खौफ में रहने लगा. दिल्ली में आकर कड़ी गर्मी और सर्दी में सड़क किनारे परिवार ने दिन बिताए. पैसे खत्म हो चुके थे. फिर एक दिन मुझे लगा कि इस तरह नहीं चलेगा. मेरी वजह से परिवार की स्थिति इतनी बुरी हो गई है. एक दिन मैंने इस मुद्दे पर आवाज़ उठाने की हिम्मत जुटाई. हमने उन अच्छे लोगों तक पहुँचना शुरू किया जो इस मुद्दे को समझते हों. कुछ लोग आगे आए मदद के लिए आए और इलाज दोबारा शुरु हुआ.”

Image caption सोनाली का चेहरा पिछले 10 सालों में बहुत बदला गया है

सोनाली का चेहरा भले ही तार-तार हो चुका है लेकिन सोनाली की हिम्मत बरकरार है. अपना इलाज करवाने की कोशिश में तो वो लगी ही हुई हैं पर क़ानूनी लड़ाई भी उन्होंने नहीं छोड़ी है.

वो बुलंद आवाज़ में कहती है, “कानूनी लड़ाई रोकने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता. जब तक आखिरी साँस है तब तक मैं लड़ूँगी. आवाज़ तो मुझे ही उठानी पड़ेगी क्योंकि बिजली मुझ पर गिरी है. हमने अभियुक्तों की ज़मानत रद्द करने के लिए अपील की हुई है, मुझे उम्मीद है कि एक न एक दिन मुझे इंसाफ मिलेगा..”

चुप क्यों है समाज?

सोनाली अपनी लड़ाई अकेली लड़ रही हैं लेकिन समाज से उन्हें कुछ शिकायते हैं. अपने इलाज के दौरान सोनाली अपने जैसी कई लड़कियों से मिलीं.

अपने अनुभव बाँटते हुए सोनाली ने बताया, “कई मामलों में मैने देखा कि एफआईआर तक नहीं हुई है. परिवार भी साथ नहीं देता. लड़की को भी शर्म महसूस होती है कि ऐसा चेहरा लेकर मैं बाहर कैसे निकलूँगी. मैं यही कहूँगी कि हमें शर्म महसूस करने की ज़रूरत नहीं है. जिन्होंने ये काम किया है शर्म उन्हें आनी चाहिए. समाज को आवाज़ उठानी पड़ेगी, पीड़ित को आवाज़ उठानी पड़ेगी. मैं भी अकेली थी नौ साल पहले. मैने अकेले लड़ना शुरू किया और अब बहुत से लोग साथ जुड़ गए.”

सोनाली से मैने कई सवाल पूछे लेकिन एक सवाल पूछना सही नहीं लगा. मगर सोनाली ने जैसे भाँप लिया. हर लड़की कहीं न कहीं अच्छा दिखना चाहती है, अपने जल चुके चेहरे को लेकर सोनाली के ज़हन पर कैसा असर हुआ?

तपाक से और बेबाकी ने उसने जवाब दिया, “मैं कॉलेज में सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थी चाहे वो डांस हो या गाना हो या फिर एनसीसी. भगवान ने अच्छा चेहरा दिया था मैं कह सकती हूँ. सजरने संवरने का शौक था जैसा हर लड़की को होता है. फिर अचानक से जिंदगी में इतना बड़ा बदलाव आ गया. इसे स्वीकार करना और समझौता करना बहुत मु्श्किल था.”

सोनली ने बताया, “लगता था कि सिर्फ धुँआ है, जलन है और आग है. पता नहीं था कि आग से कैसे निकलूंगी. मानसिक परेशानी तो थी पर मैंने अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया. डॉक्टर भी मुझसे कहते थे कि ऐसी स्थिति में अकसर लड़कियाँ अपना मानसिक संतुलन खो देती हैं. मेरा शरीर काम नहीं कर रहा था, ज़ुबाँ बंद थी पर दिमाग़ चल रहा था. इसी दिमाग़ की बदौलत मैं इस मुसीबत से निकलने का रास्ता ढूँढ रही हूँ.”

आसान नहीं राह

अब अगले डेढ़ साल में उसकी नौ सर्जरी होनी है जो काफी तकलीफदेह होंगी. इसमें करीब 30 लाख का खर्च आएगा.

अकसर ऐसी घटनाओं के शिकार लोगों से जब आप उनके अतीत के बारे में बात करतें हैं तो वे असहज महसूस करते हैं, कई बार बात नहीं कर पाते. लेकिन सोनाली ने मेरे हर सवाल का बेबाकी से जवाब दिया, वो अपनी सोच में स्पष्ट हैं, ख़ुद पर तरस खाने वाली मानसकिता उनमें रत्ती भर भी नहीं थी.

चेहरे पर पड़ा तेज़ाब और तेज़ाब की जलन के बारे में बताते हुए सोनाली की आवाज़ ज़रा भी नहीं कांपी, गला नहीं रूँधा, वो असहज नहीं हुई.

समझ में नहीं आ रहा कि इतना जीवट, इतना हौसला कहाँ से लेकर आई हैं वो. क्या अंदर से वो भी इतनी ही मज़बूत है जितना बाहर से दिखती है?

अलविदा लेने के बाद से अब तक सोनाली ज़हन में ज़िंदा हैं. सोमवार 19 नवंबर को उनकी दूसरी सर्जरी है. एक समय इसी सोनाली ने अपने हालात से तंग आकर इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई थी लेकिन आज वो ज़िंदादिली की मिसाल है.

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