कमज़ोर किया विपक्ष का डंक?

मनमोहन सिंह और नेता

मोहम्मद अजमल कसाब को चुपचाप फाँसी पर लटका कर मनमोहन सिंह सरकार ने कई राजनीतिक निशाने एक साथ साधने की कोशिश की है.

कसाब को फाँसी दिए जाने का वक़्त काफी अहम है.

मुंबई में खुले आम गोलीबारी करके 166 लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तानी नागरिकों में शामिल कसाब को इन हमलों की चौथी बरसी से चार दिन पहले मृत्युदंड दिया गया.

इसके ठीक एक दिन बाद यानी कल संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होने वाला है जिसमें विपक्ष सरकार को कई मुद्दों पर घेरने की रणनीति बना चुका था.

रिटेल में विदेशी कंपनियों को सीधे निवेश की इजाज़त देने के मुद्दे पर तृणमूल काँग्रेस, भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और वामपंथी पार्टियाँ संसद में बहस और वोटिंग करवाने पर विचार कर रही हैं.

द हिंदू अखबार की स्मिता गुप्ता मानती हैं कि सरकार ने विपक्ष के हमले को एक तरह से बेअसर कर दिया है.

वो कहती हैं, "अगले ही महीने गुजरात विधानसभा का चुनाव होने वाला है और अजमल कसाब को फाँसी दिए जाने के बाद नरेंद्र मोदी अब इस मुद्दे का इस्तेमाल नहीं कर पाएँगे."

शीतकाल की गरमी

सोनिया गाँधी के दामाद रॉबर्ट वाडरा और विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण भी सरकार को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ सकता है.

इंडिया अगेंस्ट करप्शन के अरविंद केजरीवाल और प्रशांत भूषण ने मनमोहन सिंह सरकार पर रिलायंस इंडिया लिमिटेड के मुकेश अंबानी को फायदा पहुँचाने के आरोप भी लगाए थे.

Image caption मुंबई हमलों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया हुई थी और पाकिस्तान को कई सवालों के जवाब देने पड़े.

पर अजमल कसाब को यरवडा जेल में मंगलवार की सुबह साढ़े सात बजे फाँसी दिए जाने के बाद यूपीए के नेता कल जब संसद में कदम रखेंगे तो उनका आत्मविश्वास देखने वाला होगा.

उन्हें उम्मीद बनी है कि शीतकालीन सत्र के दौरान विपक्ष के हमलों की गरमी में उतना असर नहीं बचेगा जिसकी उन्हें आशंका थी.

प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी काँग्रेस और यूपीए सरकार पर चरमपंथियों के साथ नरमी बरतने का आरोप लगाती रहती है.

मुंबई हमलों की पाँचवी बरसी पर अब उसके पास अपने आरोपों को दोहराने का कोई आधार नहीं रह जाएगा.

पत्रकार स्मिता गुप्ता ये भी मानती हैं कि मनमोहन सिंह सरकार अपनी छवि सुधारने के लिए भी ऐसे फैसले कर रही है. वो बताना चाहती है कि यूपीए सरकार फैसले करने वाली सरकार है.

नए सवाल

इसका मतलब ये नहीं है कि सरकार अब सब सवालों से परे हो गई है.

उसके सामने अब भी कई पुराने सवाल नए तरीके से पेश आएँगे, जिनकी शुरुआत भी हो चुकी है.

संसद पर हमलों के लिए मृत्युदंड का इंतजार कर रहे मोहम्मद अफज़ल गुरू को फाँसी दिए जाने की माँग एक बार फिर से जोर पकड़ सकती है.

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही ये दाँव चल दिया है.

उन्होंने ट्विटर पर लिखा है: “अफ़ज़ल गुरू का क्या होगा, जिसने हमारे जनतंत्र के मंदिर – संसद भवन – पर 2001 हमला किया था. उसका अपराध कसाब के अपराध से कई साल पहले किया गया था.”

हालाँकि विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने इस तरह के संकेतों पर प्रतिक्रिया जताने से भी इंकार कर दिया है कि सरकार ने संसदीय सत्र के एक दिन पहले कसाब को फाँसी देकर राजनीतिक हित साधा है.

मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैं ऐसी बातों का जवाब देना भी उचित नहीं समझता. (जो लोग ऐसी बातें कह रहे हैं) क्या वो चाहते थे कि कसाब को फाँसी न दी जाती.”

संबंधित समाचार