'एक कठपुतली की ज़िंदगी का अंत डोर पर'

 गुरुवार, 22 नवंबर, 2012 को 08:34 IST तक के समाचार
अख़बारों में क़साब

गुरूवार के सारे अख़बारों में क़साब की ख़बरें ही छाई हुईं हैं.

'एक कठपुतली की ज़िंदगी का अंत डोर पर'.......ये सुर्ख़ी लगाई है अंग्रेज़ी अख़बार 'द टाइम्स ऑफ़ इंडिया' ने क़साब की फांसी पर.

बुधवार की सुबह 26/11 मुंबई हमलों के दोषी आमिर अजमल क़साब को पुणे की येरवडा जेल में फांसी दे दी गई.

गुरूवार को दिल्ली से छपने वाले सारे अख़बारों में बस यही एक ख़बर छाई हुई है.

जबकि दैनिक जागरण ने सुर्ख़ी लगाई है, 'दफ़न हुआ क़साब'.

क़साब को फांसी देने से संबंधित तैयारी को भारत ने ऑपरेशन एक्स नाम रखा था. सारे अख़बारों में इस बात का भी ज़िक्र है कि किस तरह से ये पूरा ऑपरेशन पूरा हुआ.

लेकिन इस बेहद गुप्त ऑपरेशन की किसको-किसको जानकारी थी, इस बारे में अलग-अलग अख़बारों की राय अलग है.

दैनिक जागरण का कहना है कि प्रधानमंत्री की सीधी निगरानी में पूरा हुआ ऑपरेशन 'एक्स'.

गोपनीयता

लेकिन कई अख़बारों में केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे के हवाले से ख़बर दी गई है कि क़साब को फांसी दिए जाने की ख़बर प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी तक को नहीं थी और उन्हें बुधवार की सुबह टीवी चैनलों से फांसी दिए जाने की ख़बर मिली.

कई अख़बारों में 26 नवंबर, 2008 को मुंबई में हुए हमले से लेकर 21 नवंबर, 2012 तक जब क़साब को फांसी दी गई इसका पूरा टाइम टेबल दिया गया है कि कब क्या हुआ.

हिंदी अख़बार हिंदुस्तान ने समय सारणी की हेडलाइन दी है, '26/11 जुर्म से इंसाफ़ तक'.

पुणे की येरवडा जेल

बुधवार की सुबह पुणे की येरवडा जेल में क़साब को फांसी दी गई थी

कई अख़बारों में फांसी दिए जाने से ठीक पहले क़साब के अंतिम क्षणों का भी विवरण दिया गया है जैसे बुधवार को क़साब कब सोकर उठा, कब स्नान किया, उसकी आख़िरी इच्छा क्या थी, फांसी दिए जाने से पहले उसने क्या कहा वग़ैरह-वग़ैरह.

कुछ अख़बारों में क़साब की फांसी के बारे में गोपनीयता बर्ते जाने पर सवाल उठाए हैं. हिंदुस्तान अख़बार के अनुसार क़साब के वकील रहे अमीन सोल्कर, फ़रहाना शाह और अब्बास काज़मी पूछ रहें हैं कि इतनी गोपनीयता के साथ फांसी क्यों दी गई.

हालांकि इस बारे में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने बुधवार को कहा था कि गोपनीयता बरतने का कारण ये था कि इसके बारे में पता चल जाने से पाकिस्तानी की धरती से फिर कोई चरमपंथी कार्रवाई हो सकती थी या फिर भारत का ही कोई ग़ैर-सरकारी संगठन क़साब को फांसी दिए जाने का विरोध करता और अदालत का दरवाज़ा खटखटा सकता था.

बहुत से अख़बारों में ये भी सवाल उठाए गए हैं कि संसद पर हुए हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरू को फांसी कब दी जाएगी. ग़ौरतलब है कि दिसंबर 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले में अफ़ज़ल गुरू को फांसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है लेकिन उनकी दया याचिका भी राष्ट्रपति के पास विचाराधीन है.

कुछ एक अख़बार में पाकिस्तान की जेल में बंद भारतीय नागरिक सरबजीत पर इसके असर का भी ज़िक्र किया गया है. सरबजीत सिंह को पाकिस्तान की अदालत ने पंजाब प्रांत में 1990 में हुए धमाको का दोषी मानते हुए फांसी की सज़ा सुनाई है. सरबजीत की दया याचिका पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के पास लंबित है.

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