भारतीय परमाणु रिएक्टर सुरक्षित: आईएईए

आईएईए
Image caption आईएईए रिपोर्ट में भारतीय रिएक्टरों की तारीफ हुई

संयुक्त राष्ट्र की परमाणु निगरानी संस्था ने कहा है कि भारत के रिएक्टर दुनिया के सबसे सुरक्षित और बेहतरीन रिएक्टरों में शामिल हैं.

कई हफ्तों तक राजस्थान एटॉमिक पॉवर स्टेशन की जांच पड़ताल करने के बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने कहा कि ये संयंत्र फुकुशिमा जैसे हादसे से निपटने से सक्षम हैं.

लेकिन आईएईए की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि संयंत्र में अग्नि सुरक्षा और इलेक्ट्रिक केबलिंग सिस्टमों में बेहतरी की जरूरत है.

ये पहला मौका है जब भारत ने अपने यहां संयुक्त राष्ट्र के निरीक्षकों को आने की अनुमति दी है.

लेकिन भारतीय विशेषज्ञों का कहना है कि देश के कुछ पुराने रिएक्टरों में स्थिति अलग है और भारत को उनकी भी जांच पड़ताल करानी चाहिए.

बेहतरी की गुंजाइश

वियना स्थिति आईएईए की ऑपरेशनल सेफ्टी डिविजन के प्रमुख मीरोस्लाव लिपर का कहना है, “भारत (ऑडिट में) वैश्विक सुरक्षा रैंक में विजेता के तौर पर उभरा है.”

लिपर ही उस बहुराष्ट्रीय 12 सदस्यों वाली टीम के प्रमुख थे जिसने भारत में निर्मित राजस्थान के 220 मेगावॉट क्षमता वाले इस संयंत्र का मुआयना किया.

उन्होंने कहा, “भारत के रिएक्टर सुरक्षित और प्रभावशाली हैं.” लेकिन उन्होंने कहा, “इसमें सुधार की गुंजाइश भी है.”

संयंत्र में ऐसा तंत्र भी होना चाहिए तो गड़बड़ी होने की स्थिति में मूल समस्या का विश्लेषण करे. उनके अनुसार, “ये बताना आसान है कि क्या हुआ, लेकिन ये बताने की भी जरूरत है कि ऐसा क्यों हुआ.”

लिपर ने कहा जिन दो रिएक्टरों का उन्होंने मूल्यांकन किया वो “दुनिया के बेहतरीन रिएक्टरों में से हैं जहां ऐसे तौर तरीके अपनाए जाते हैं जिनसे दुनिया सीख सकती है.”

लिपर ने बताया कि उनकी टीम को रिएक्टर के सभी हिस्सों को देखने की अनुमति दी गई और उनसे कुछ भी नहीं छिपाया गया.

उन्होंने कहा कि कचरे के निपटारे की व्यवस्था भी संतोषजनक थी. आईएईए की टीम इस बात से भी प्रभावित थी कि संयंत्र के कर्मचारी उच्च और निम्न रेडियोधर्मी कचरे को एक दूसरे से अलग करते हैं.

परमाणु ऊर्जा पर सवाल

Image caption कुडनकुलम परियोजना पर कई सवाल उठते रहे हैं

दूसरी तरफ आलोचकों का कहना है कि भारत को अपने सबसे पुराने तारापुर रिएक्टरों की जांच पड़ताल भी संयुक्त राष्ट्र से करानी चाहिए. इन दो वॉटर बॉइलिंग रिक्टरों का निर्माण 1969 में जनरल इलेक्ट्रिक ने किया था.

आण्विक ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष डॉ. ए गोपालकृष्णन कहते हैं, “तारापुर की ये छोटी इकाइयां पूरी तरह असुरक्षित हैं और इन्हें बहुत पहले ही बंद कर दिया जाना चाहिए था क्योंकि ये उसी तरह के रिएक्टर हैं जो फुकुशिमा दुर्घटना में एक के बाद एक धमाके के शिकार हुए थे.”

तमिलनाडु में हाल में हफ्तों तक कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के खिलाफ प्रदर्शन हुए.

कई सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय लोग वहां रूस की मदद से बनाए जा रहे 100 मेगावॉट क्षमता के रिएक्टर को असुरक्षित बता कर उसका विरोध कर रहे हैं.

विश्लेषकों का कहना है कि आईएईए की रिपोर्ट परमाणु रिएक्टर विरोधियों के स्वर कमजोर होंगे. भारत अगले दो साल में अपनी एटॉमिक रिएक्टर क्षमता को बढ़ा कर 63 हजार मेगावॉट करना चाहता है. अभी भारत में 20 रिएक्टर है जिनकी क्षमता 4,800 मेगावॉट है.

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