'बाबरी विध्वंस के समय मैं एक साल की थी...'

  • 4 दिसंबर 2012
अयोध्या फैजाबाद
Image caption भारत में बाबरी मस्जिद का विध्वंस आजादी के बाद की सबसे अहम घटनाओं में से एक है

छह दिसम्बर 1992 के दिन पूरी दुनिया के इतिहास में एक काला दिन दर्ज हो गया, खासतौर पर हिंदुस्तान में रहने वाली सभी कौमों के लिए ये एक शर्म का दिन है क्योंकि नफ़रत फैलाने वालों ने हिंदुस्तान के संविधान की धज्जियां उड़ा दीं और मुल्क की अदालतें चीखती रह गईं.

छह दिसम्बर 1992 को जब बाबरी मस्जिद शहीद हुई थी, तब मैं महज एक साल की थी.

जब मैंने होश संभाला तो मेरे वालदैन ने बाबरी मस्जिद के बारे में मुझे बताया कि इस मसले पर एक दशक तक पूरे मुल्क में एक खौफ, बर्बरियत और खासतौर पर मुस्लिम कौम में असुरक्षा की बहुत ज्यादा भावना रही.

चूंकि हम लोग फैजाबाद-अयोध्या के रहने वाले हैं, इसलिए मेरे जानने वाले दोस्त भी हर साल छह दिसम्बर की याद ताजा करते हैं कि किस तरह से बाबरी मस्जिद पर हमला, सिर्फ एक 500 साल पुरानी इमारत पर हमला नहीं था, बल्कि भारत में रहने वाले पूरे मुस्लिम समाज के वजूद पर चोट की गई थी.

'हर मसले का हल फासीवाद नहीं'

मैं अपने हिंदू भाई-बहनों की धार्मिक आस्था का पूरा सम्मान करती हूं, लेकिन हर मसले का हल फासीवाद नहीं होता है.

अब तो यह सारी दुनिया को पता लग गया है कि बाबरी मस्जिद और राम जन्मभूमि का मामला एक सियासी मुद्दा था जो अब मर चुका है.

आज के वक्त में लोगों को मतलब नहीं रह गया है कि वहां मंदिर हो या मस्जिद. इन सबको देखते हुए यहां जो आपसी तनाव है, उसे खत्म करने के लिए इस विवादित भूमि पर किसी तरह की पूजा या इबादत की इजाजत नहीं होनी चाहिए.

यहां एक विश्व-स्तरीय बड़ा अस्पताल बन जाए जिससे सही मायनों में इंसानियत की खिदमत हो सके और लोगों के दुख-तकलीफ, रज़ो-गम दूर किए जा सकें.

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