'राम की जन्मभूमि हमारे लिए नई जगह थी'

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Image caption भारत में बाबरी मस्जिद का विध्वंस आजादी के बाद की सबसे अहम घटनाओं में से एक है

नब्बे के दौर के शुरुआती साल और उनमें बना माहौल 7-8 साल के हमउम्र दोस्तों के लिए बड़ा अबूझ था. हमारे जिले फैजाबाद की फिजा में ऐसा बहुत कुछ घट रहा था जो हम बच्चों के लिए नया नया था जिसे हम कौतूहल के साथ देखते और सुनते भर थे.

स्कूल आते-जाते हुए हम बसों में कारसेवकों को अयोध्या की ओर जाते हुए देखते थे.

वो तेज आवाज में कई नारे लगाते हुए जाते थे जो अभी भी यादों में हैं. राम की नगरी में ही हमें नारों में सुनाया जाता था- 'बच्चा-बच्चा राम का, जन्मभूमि के काम का'.

अयोध्या से आठ कोस दूर गाँव में रहते थे, राम को बहुत छुटपन से ही जानते थे लेकिन यह 'जन्मभूमि' हमारे लिए नई जगह थी. गाँव के लोग 'नहान' पर अयोध्या सरयू में डुबकी लगाने जाते थे, परिक्रमा जाते थे, हनुमान गढ़ी जाते थे लेकिन जन्मभूमि का परिचय हमें रेडियो, अखबारों और कारसेवकों से मिला.

धीरे-धीरे बाजार और मेलों में लुगदी-कागज में छपी ऐसी किताबें भी बिकती हुई दिखतीं जो 'जन्मभूमि का इतिहास' बताती थीं. लोग इन्हें खरीदते और पढ़ते थे, ऐसी ही किताबों के हवालों से बड़ी-बड़ी चर्चाएं और दावे करते.

उमा भारती और ऋतंभरा के कैसेट

गाँव के एक घर में उमा भारती और ऋतंभरा के भाषण की कैसेट थी. उन्हीं के यहाँ एक टेप भी था, वह भी दहेजू! वे तेज आवाज में इन कैसेटों को बजा देते थे और लोग चारों तरफ इकट्ठा होकर इन्हें सुनते. इन्हें सुनते हुए लोगों में उत्तेजना होती, तनाव भी होता और दुख भी.

गाँव के कई घरों में राम जन्मभूमि के लिए जान देने वाले कई कारसेवकों में से किन्हीं कोठारी-बंधुओं की फोटो भी दीवारों पर लगी हुई देखी जा सकती थीं. लोगों की निगाह में वे धर्म के लिए शहीद हुए थे.

इन कोठारी-बंधुओं की चर्चाएँ लोग कुछ इस अंदाज में करते- ''इनकी माँ ने इन्हें भेजा था यह कहते हुए कि बेटा या तो मंदिर बनवा कर आना नहीं तो मत आना'.

यह एक ऐसी व्यापक राम-लहर थी जिसके बल पर भारतीय जनता पार्टी, उत्तर प्रदेश की सत्ता पर आसानी से काबिज हुई थी. लोगों ने उसे मंदिर बनवाने के लिए वोट दिया था. उसे भी अपनी आगे की राजनीति के लिए 'बाबरी मस्जिद के ढाँचे' को गिराना जरूरी था.

कारसेवकों के जत्थे

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Image caption इस घटना ने भारत के राजनीतिक और सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित किया

केंद्र में काँग्रेस की सरकार थी. वर्ष 1992 के जाड़े के दिनों में कारसेवक जहाँ-तहाँ से अयोध्या की ओर बढ़े जा रहे थे. प्रशासनिक तौर पर बाहर-बाहर इन्हें रोकने जैसी कोशिश थी पर दूसरे तरीकों से ये कारसेवक पहुँचने में सफल हो रहे थे.

सड़क के रास्ते नहीं तो गाँवों के रास्ते कारसेवकों की टुकड़ियाँ अयोध्या की ओर पहुँचाई जा रही थीं. राजस्थान से आए हुए जवान लोगों की एक टुकड़ी हमारे गाँव से होते हुए भी गई थी. ये लोग कुछ देर गाँव के एक घर में ठहरे थे, पानी पिया और फिर आगे बढ़ गये थे.

शायद ये लोग अपने अभियान में उन गावों से गुजरना पसंद करते थे जहाँ मुस्लिम आबादी न्यूनतम हो या न हो. मेरे गाँव में, जो कि 12 घरों का पुरवा है, एक भी घर मुस्लिम का नहीं है.

आखिर छह दिसंबर 1992 का वह दिन भी आया जिसका बहुत लोग इंतजार कर रहे थे. एक-एक करके बाबरी मस्जिद के गुंबद गिरा दिए गए. उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री ने विवादित-स्थल की रक्षा न कर पाने की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा दे दिया. पर राम-लहर में नहा रहे लोग यकीनन खुश हुए.

इन्हीं लोगों में से कई लोग कई दिनों तक गुंबदों के गिरने का 'आँखों देखा हाल' सुनाते रहे. कुछ लोग रुककर इन्हें सुनते. इन्हीं दिनों मेरा घर बन रहा था. घर बनाने का ठेका सुभान अली नाम के एक साहब ने लिया था. यह काम वह ठेका पर कर रहे थे, इसलिये वे अपने साथ एक-दो मजदूर रखकर अधिक समय लगा रहे थे.

हमें नया घर देखने की जल्दी थी. इस माहौल में उन्होंने 15-20 दिन काम रोक दिया था. उन दिनों मुझे सबसे ज्यादा दुख इस बात का हो रहा था.

आम लोगों की दिक्कतें

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Image caption इस घटना को बीस बरस गुजर गए लेकिन आज भी इसकी गूंज भारत की राजनीति में सुनाई देती है

जब-जब ऐसी राम-लहर का उफान होता, लोगों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता. कर्फ्यू की वजह से शहर से होने वाले कई काम बंद रहते. मैं फैजाबाद अपनी ननिहाल में पला-बढ़ा जबकि आजी का घर गोण्डा में है.

ऐसी स्थिति में घर के लोगों को गोण्डा जाने में दिक्कत होती तो उन्हें अयोध्या में सरयू के पुल से न जाकर दूसरे जगह नदी नाव से पार करनी पड़ती थी. रेडियो पर घिसी-पिटी आवाज सुनाई देती कि स्थिति तनावपूर्ण और नियंत्रण में है, लेकिन लोगों की इन दिक्कतों को भला कौन देखता!

साल 2003 में आगे की पढ़ाई करने के लिए मैं जेएनयू, दिल्ली चला आया. आने के बाद अयोध्या-फैजाबाद से ताल्लुक होने पर लोग इस मुद्दे पर मुझसे बात करते.

राजनीतिक स्वार्थ से किया गया अभियान अपनी जगह, पर मैं उन्हें नाज के साथ यह जरूर बताता कि फैजाबाद के अलग-अलग मजहबों के नागरिकों में आपसी सौहार्द बहुत है. इसका प्रमाण है कि अब तक के पूरे घटनाक्रम में फैजाबाद के थानों में एक भी ऐसी रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई जिनकी वजह मजहबी टकराव हो.

मजहबी विभाजन की कोशिश

दुनिया-जहान में अयोध्या को लेकर जो भी हुआ हो, लेकिन इसी साल के नवंबर महीने में फैजाबाद में ऐसी अप्रिय घटनाएँ घट गईं कि नाज के साथ जो मैं कहता आया था, अब वह नहीं कह सकता.

फैजाबाद में हुए सांप्रदायिक दंगों ने बहुतों के साथ मुझे भी चौंका दिया, क्योंकि वे लोग सियासी साजिश में सफल हो गये जो दशकों से फैजाबाद की जनता के बीच हिंसा को अंजाम देने वाले मजहबी विभाजन की कोशिश कर रहे थे.

राजनीतिक स्वार्थ में अंधे लोगों के 'जय श्री राम' के उद्घोष ने अवध के सियाराम के उस स्वरूप को जरूर नष्ट कर डाला जिसमें एक मुसलमान भी राम को हिन्दुओं जैसा प्यार करता था.

अठारहवीं सदी के भक्त कवि कारे खां ने अपने आराध्य से एक सवाल किया था, ''हिन्दू के हौ नाथ तो हमारो कछु दावा नहीं, जग के हौ नाथ तो हमारी सुधि लीजिए''.

राम को चाहने वाला एक मुसलमान बदली स्थिति में यही सवाल आज भी पूछता है. अयोध्या की इस फिजा में दुखी होकर कैफी आजमी के राम 'दूसरा वनवास' काट रहे हैं. क्या कभी राम 'दिवाली' को सार्थक करते पहले जैसे फिर आ सकेंगे'. क्या वे फिर जग के नाथ होकर सबकी 'सुधि' ले सकेंगे, राम ही जानें.

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