विपक्ष को 'जमूरा' कहते ही उबला सदन

संसद
Image caption लोकसभा में एफडीआई पर आज मतदान होगा.

खुदरा में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, एफ़डीआई पर लोकसभा में बुधवार को बहस जारी है और सरकार को विपक्ष के विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, शिरोमणि अकाली दल, शिवसेना, बीजू जनता दल, राष्ट्रीय जनता दल के नेताओं ने बहस में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. दूसरी तरफ़ सरकार के बचाव में एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल सामने आए.

दोपहर बाद लालू यादव ने जैसे ही विपक्ष को जमूरा कह दिया तो सदन में शोर मच गया. इस बयान पर विपक्ष ने आपत्ति की और कुछ देर तक लोकसभा स्थगित की गई. हालांकि बाद में उनके माफ़ी मांगने के बाद संसद की कार्यवाही फिर से चालू हो गई.

दोबारा बहस में हिस्सा लेते हुए लालू यादव ने सरकार का ज़ोरदार समर्थन करते हुए कहा, "हम सरकार का समर्थन करते हैं और देश के किसानों और मजदूरों से अपील करते हैं कि वो बीजेपी के झांसे में न आएं, वो देश को आगे नहीं बढ़ने देना चाहती."

लालू प्रसाद के मुताबिक़, "कहीं भी दुकानदारों पर कोई दबाव नहीं है. वहां हर देश के उत्पाद होंगे, किसी पर खरीदने के लिए कोई दबाव नहीं होगा. अगर देश के किसान या खुदरा व्यापारी या दुकानदार पर कोई खतरा लगा, तो राजद सारी दुकानों पर आग लगा देंगे."

लालू यादव ने कहा कि भाजपा ने 2002 के अपने मेनिफेस्टो में खुदरा में एफ़डीआई का समर्थन किया था.

इससे पहले भारतीय जनता पार्टी के मुरली मनोहर जोशी ने कहा, "विदेशी बैंकों की ही तरह वॉलमार्ट गांवों में नहीं जाएगा, वो शहरों में ही रहेगा. सरकार किसानों की आमदनी बढ़ाने की बात करती है लेकिन इससे किसानों की दुर्दशा होगी, उनकी आमदनी नहीं बढ़ेगी. दुनिया के धनी देशों के किसानों को सब्सिडाइज़ किया जा रहा है, आप उसकी सब्सिडी ख़त्म करने पर उतारू हैं. आप किसान को बढ़ाइए, वॉलमार्ट को नहीं बढ़ाइए."

सरकार का बचाव

इसके पहले विपक्ष पर पलटवार करते हुए प्रफुल्ल पटेल ने विपक्ष से सवाल पूछा कि उन्होंने देश में मॉल्स का विरोध क्यों नहीं किया. अपने संसदीय क्षेत्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां चीनी फर्नीचर की दुकानें होने के बावजूद काम करने के लिए बढ़ई मिलना मुश्किल है.

वैश्वीकरण और आर्थिक उदारीकरण की बात करते हुए प्रफुल्ल पटेल ने कहा, "आउटसोर्सिंग को लेकर, जिस सेक्टर में हमारे हज़ारों नौजवान काम कर रहे हैं, आज उसका अमरीका में विरोध हो रहा है. तो क्या आप चाहेंगे कि हमारे यहां से सॉफ्टवेयर का निर्यात बंद हो जाए? जितने उमंग से हम चाहते हैं कि हमारी वस्तुएं बाहर निर्यात हों, वही दूसरे देश के लोग भी चाहते होंगे. आज हमें बदलती हुई परिस्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए."

अपनी बात को बल देते हुए प्रफुल्ल पटेल ने कहा, "मुझे याद है कि एक ज़माने में कोका कोला को देश से भगाया गया लेकिन आज वो ब्रांड वापस भारत में आ गया है. उसे हमारे-आपके बच्चे और नागरिक पीते हैं. कोका कोला ने देशी कंपनी पारले का थम्सअप खरीदा, ये सोचकर कि कोका कोला को चलाएंगे और थम्स अप को बंद कर देंगे. लेकिन आज भी थम्स अप, कोका कोला से ज़्यादा लोकप्रिय है. इसलिए बाहर से कुछ आएगा और यहां से निवेश चला जाएगा, और ईस्ट इंडिया कंपनी बन जाएगी, ये सही नहीं है."

विरोध

सुबह बहस की शुरुआत करते हुए सीपीएम के बासुदेब आचार्य ने कहा "सरकार को खुदरा में एफ़डीआई नीति के बारे में फिर से विचार करना चाहिए. इससे न तो किसान और न ही उपभोक्ताओं को फ़ायदा होगा. हम अपने देश में आसानी से वॉलमॉर्ट को नहीं आने देंगे."

इससे पहले संसदीय कार्य राज्य मंत्री राजीव शुक्ला ने कहा था, "हम सभी दलों से संपर्क में हैं. खुदरा में एफ़डीआई से किसानों और छोटे व्यापारियों को नुक्सान नहीं होगा. बल्कि इससे उन्हें मदद मिलेगी."

जनता दल युनाइटिड के शरद यादव ने भी एफ़डीआई का विरोध करते हुए सरकार पर देश से ज़्यादा बाज़ार के बारे में चिंतित होने का आरोप लगाया.

उन्होंने कहा, "हम सरकार को गिराना नहीं चाहते. अगर ऐसा होता तो हम अविश्वास प्रस्ताव पर तृणमूल का साथ देते. हमारा मकसद किसान को बचाना है. अगर आप(सरकार) एफ़डीआई रोलबैक नहीं करेंगे तो हम सरकार को रोलबैक करेंगे."

कौन साथ, कौन खिलाफ़?

इससे पहले खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई को लेकर मंगलवार को संसद में बहस हुई थी और बुधवार को संसद में इस मुद्दे पर मतदान होना है. लेकिन इस मुद्दे पर मतदान में कौन सी पार्टी सरकार के पक्ष में होगी और कौन विरोध में, इसे लेकर संशय बरकरार है.

हालांकि राजनीतिक प्रेक्षकों का आकलन है कि यूपीए सरकार इस मुद्दे पर मत विभाजन में जीत के प्रति आश्वस्त है और इसके बाद ही वो नियम 184 यानी मत विभाजन वाली बहस के लिए तैयार हुई है.

लेकिन मंगलवार की बहस सुनकर एकबारगी लगा कि कहीं बात सरकार के हाथों से निकल न जाए.

मंगलवार को लोकसभा में जब एफ़डीआई पर चर्चा शुरु हुई तो ऐसा लगा नहीं कि समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी सरकार के साथ हैं.

मुलायम सिंह ने ये कहकर विपक्षी दलों की आस बढ़ा दी कि एफ़डीआई से देश में बेरोज़गारी बढ़ेगी. उन्होंने कहा, "आप कितनी भी सफाई दें, कितना भी तर्क दें लेकिन ये देश के हित में नहीं है. क्योंकि बीस-पचीस करोड़ लोग बेरोजगार हो जाएंगे."

टाल दें एफडीआई

उन्होंने प्रधानमंत्री और सोनिया गांधी से अपील कर डाली कि वे कुछ दिनों के लिए एफ़डीआई के मुद्दे को छोड़ दें क्योंकि इससे लोकसभा के आगामी चुनाव में भी यूपीए सरकार को कोई फायदा होने वाला नहीं है.

हालांकि कि वे ये कहने से अपने आपको बचा ले गए कि मत विभाजन के दौरान वे क्या करेंगे.

यही हाल बहुजन समाज पार्टी का भी था. एफ़डीआई का विरोध करने के बाद पार्टी के सांसद दारा सिंह चौहान सिर्फ़ ये संकेत देकर रहे गए कि वे सरकार को मत विभाजन में बचाने पर विचार कर सकते हैं.

तृणमूल कांग्रेस तो एफ़डीआई के इतना ख़िलाफ़ थी कि उसने सरकार के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लाने की भी कोशिश की थी. उसका यही रूख़ चर्चा के दौरान भी क़ायम रहा. वहीं वामपंथी दल तो पहले से ही एफ़डीआई के ख़िलाफ़ थे.

बहस की शुरुआत नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने की थी. उन्होंने एफ़डीआई का ज़ोरदार विरोध किया. ख़ूब तर्क और आंकड़े दिए. उन्होंने वॉलमार्ट के वित्तीय अधिकारी के निलंबन की ख़बर का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि कहीं इसके पीछे भ्रष्टाचार तो नहीं है.

सुषमा स्वराज जानती हैं कि अकेले भाजपा के वोट से उनका प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता. वे ये भी जानती हैं कि सपा और बसपा इस सरकार को गिराना नहीं चाहतीं. इसलिए उन्होंने इन दोनों दलों को लुभाने की कोशिश की.

उन्होंने कहा, "नियम 184 के प्रस्ताव के पारित होने से सरकार नहीं गिरेगी, केवल एफडीआई गिरेगी. इसलिए जिन्हें सरकार गिरने की आशंका है वे भयभीत न हों और मतदान में सहयोग करें."

सरकार का तर्क

वहीं, केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल सरकार के वकील की तरह खड़े थे. उन्होंने एफ़डीआई का समर्थन करते हुए तर्क दिया कि ये सिर्फ़ खुदरा व्यापार का मामला नहीं है, कंपनियाँ इसके अलावा भी बहुत निवेश करेंगीं.

बुधवार को इस प्रस्ताव पर आगे बहस के बाद मत विभाजन होना है. भले ही मुलायम सिंह की पार्टी एफ़डीआई के ख़िलाफ़ है लेकिन वो मत विभाजन के दौरान सदन से वॉक आउट करके भी सरकार का भला कर सकते हैं.

कुछ ऐसा ही बहुजन समाज पार्टी भी कर सकती है.

दोनों के लिए एक पुराना तर्क तैयार है कि वे भाजपा जैसी सांप्रदायिक पार्टी के प्रस्ताव का समर्थन नहीं कर सकते.

कहा जाता है कि राजनीति संभावनाओं का खेल है शायद इसीलिए भाजपा इन दोनों दलों से आस लगा बैठी है.

सरकार दिखा रही है कि उसके मन में परिणाम को लेकर दुविधा नहीं है लेकिन मत विभाजन तक थोड़ी बहुत धुकधुकी तो ज़रुर लगी रहेगी.

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