500 सेना अधिकारी मानवाधिकार उल्लंघन के दोषी?

 गुरुवार, 6 दिसंबर, 2012 को 18:40 IST तक के समाचार
श्रीनगर, कश्मीर

भारत-प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भारतीय सेना के कुछ अधिकारियों पर मानवाधिकार हनन के अन्य मामलों का आरोप लगाया है.

भारत-प्रशासित कश्मीर में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने भारतीय सेना के लगभग 500 अधिकारियों पर चरमपंथ के खिलाफ़ सेना की मुहिम के दौरान हिरासत में मौतों, लोगों के ग़ायब होने और मानवाधिकार हनन के गंभीर आरोप लगाए हैं.

एक 354-पन्नों की रिपोर्ट में मानवाधिकार हनन के 214 मामलों की समीक्षा की गई है. इसमें दो दशक से ज़्यादा अवधि में लगभग 70 लोगों की मौत और 8000 लोगों के ग़ायब होने में राज्य अधिकारियों की भूमिका को चिन्हित किया गया है.

इस रिपोर्ट के बारे में जब सेना के अधिकारियों से प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया गया तो उन्होंने ये कहते हुए फ़िलहाल कोई टिप्पणी करने से इनकार किया है कि अभी उन तक इस रिपोर्ट की प्रति नहीं पहुँची है.

एसोसिएशन ऑफ़ पेरंट्स ऑफ़ डिसापियर्ड पर्सन्स, एपीडीपी, नाम की एक स्थानीय संस्था का कहना है कि उसने कुछ भारतीय कार्यकर्ताओं के सहयोग से ये रिपोर्ट छापी है जो भारतीय सरकार को "मानवता के खिलाफ़ सुनियोजित अपराधों" का दोषी पाती है.

'अपराधों को बढ़ावा'

भारतीय सेना के दो मेजर जनरल, तीन ब्रिगेडियर, नौ कर्नल और 78 मेजर पद के अधिकारियों को "अपराधों को बढ़ावा" देने का ज़िम्मेदार ठहराया गया है. रिपोर्ट में जिन 500 अधिकारियों पर आरोप हैं उनमें से स्थानीय जम्मू-कश्मीर पुलिस के दो वरिष्ठ अधिकारी समेत 111 अधिकारी भी शामिल हैं.

ये रिपोर्ट गुरुवार को श्रीनगर में भारतीय पत्रकार गौतम नौलखा, वकील कार्तिक मुरुकुत्ला, एपीडीपी के परवेज़ इमरोज़ और ज़हीरुद्दीन ने रिलीज़ की.

"हालांकि हम व्यक्ति विशेष की ज़िम्मेदारी में यक़ीन रखते हैं लेकिन हमने अपराधों को बढ़ावा देने वालों की बचाने में भारतीय प्रशासन की अभियोज्यता को भी उजागर किया है."

परवेज़ इमरोज़, अध्यक्ष, एपीडीपी

कार्तिक मुरुकुत्ला कहते हैं, "लगता है कि पीड़ितों के लिए इंसाफ़ का इंतज़ार निरंतर है. इंसाफ़ के नाम पर भारत नकद मुआवज़े और दोबारा जांच के वादे से आगे नहीं बढ़ा है. भारत ने जानबूझकर इंसाफ़ के मानदण्ड कम किए हैं और अपराधों को कम करके आंका है." मुरुकुत्ला, रवांडा, युगोस्लाविया और न्यूरेमबर्ग मुकदमों के लिए बने संयुक्त राष्ट्र समर्थित अंतरराष्ट्रीय न्यायाधिकरण का हिस्सा रह चुके हैं.

एपीडीपी के अध्यक्ष परवेज़ इमरोज़ का कहना था, "हालांकि हम व्यक्ति विशेष की ज़िम्मेदारी में यक़ीन रखते हैं लेकिन हमने अपराधों को बढ़ावा देने वालों की बचाने में भारतीय प्रशासन की अभियोज्यता को भी उजागर किया है."

वहीं पत्रकार गौतम नौलखा मानते हैं कि इंसाफ़ के अभाव में कश्मीर में अशांति का एक और दौर शुरु हो सकता है. उन्होंने कहा, "अगर पीड़ितों को ये नहीं लगेगा कि उन्हें अंतत: इंसाफ़ मिला है, तो इससे आप भविष्य में संघर्ष के बीज बो रहे हैं."

गौतम नौलखा और कार्तिक मुरुकुत्ला

रिपोर्ट के रिलीज़ के मौके पर गौतम नौलखा और कार्तिक मुरुकुत्ला.

"योजनाबद्ध और नीतिगत अभियान"

इस मौके पर वक्ताओं ने रिपोर्ट को "असाधारण" बताते हुए कहा कि इससे पता चलता है कि पिछले दो दशकों में जो कुछ भी हुआ, वो दुर्घटनाओं की एक श्रंखला नहीं था बल्कि "भारतीय प्रशासन द्वारा योजनाबद्ध और नीतिगत अभियान था."

रिपोर्ट में चरमपंथ के खिलाफ़ अभियान से जुड़े 2000 से ज़्यादा अधिकारियों को दिए गए पुरुस्कार और पदोन्नतियों के बारे में भी आधिकारिक जानकारी है.

रिपोर्ट की कार्यप्रणाली के बारे में जानकारी देते हुए आयोजकों ने बताया, "हमने आधिकारिक तरीकों का इस्तेमाल किया है. हमने सूचना का अधिकार कानून और पुलिस थानों में दर्ज एफआईआरों को आधार बनाया है."

आयोजकों ने बताया कि रिपोर्ट की प्रतियां भारत-प्रशासित कश्मीर के मुख्यमंत्री और गृहमंत्री के अलावा भारत के प्रधानमंत्री को भी भेजी गई हैं.

गौतम नौलखा ने कहा, "ये तथ्यों एक संकलन है और इसमें जो कुछ है, उसके बाद मैं एक भारतीय के तौर पर शर्मिंदा महसूस करता हूं. मुझे लगता है कि ये रिपोर्ट से अधिकारियों को भी शर्मिंदा करेगी."

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