भाजपा नहीं मोदी चुनाव लड़ रहे हैं!

  • 12 दिसंबर 2012
गुजरात का चुनाव नरेंद्र मोदी के इर्द-गिर्द सिमटा नज़र आता है

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी मंच पर आते हैं तो घंटों से इंतज़ार कर रही जनता ठीक उसी तरह सीटियाँ बजाती है जिस तरह से किसी फ़िल्मी सितारे के फै़न.

नरेंद्र मोदी भी जनता को निराश नहीं करते. दिन भर के प्रचार के बावजूद वो गंदा कुर्ता पहन कर या बिगड़े बालों में जनता के सामने नहीं आते.

वो मंच पर धड़धड़ाते हुए आते हैं, मंच पर बैठे अपने नेताओं की तरफ देखते भी नहीं. हार फूल पहना कर अपना स्वागत करने वालों को वो केवल इतनी मोहलत देते हैं जितने में फ़ोटो भर खिंच जाए.

केवल मुझे वोट दो

उसके बाद वो सीधे जनता से मुखातिब होते हैं, लेकिन उस माइक का इस्तेमाल नहीं करते जिसका इस्तेमाल मंच पर उनके समर्थक उनके आने से पहले जनता से बतियाने में करते हैं. मंच के बीचों बीच उनके लिए नया माइक लगाया जाता है.

मंच पर केवल उनकी तस्वीर सब पर भारी होती है. वो अपनी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों तक का नाम नहीं लेते, नेताओं-सांसदों का तो छोड़ ही दीजिये.

"मैडम सोनिया", "सोनिया बेन" पर चुटकियों, मीडिया पर चुटकुलों और कॉन्ग्रेस पर फब्तियों के बाद वो मौजूद जनता से वोट मांगते हैं. अपने प्रत्याशी के लिए नहीं अपने लिए. वो साफ़ कहते हैं कि "प्रत्याशी को मत देखो मुझे देखो, मैंने अब तक काम किया और आगे भी मैं ही करूंगा."

मोदी अगर अकेले अपने नाम पर वोट मांग रहे हैं तो शायद इसलिए, क्योंकि उन्हें मालूम है कि वो अकेले ही हैं.

संघ सखा सब दूर

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ परोक्ष रूप से उनके खिलाफ़ खड़ा है. राज्य चुनाव के ठीक पहले संघ के पूर्व प्रचारक एमजी वैद्य ने मोदी को षड्यंत्रकारी बताया था.

संघ ने केवल इतना कहा कि यह वैद्य की निजी राय है, यह नहीं कहा कि गलत राय है. यही नहीं, बयान देने के लिए वैद्य की कोई निंदा नहीं की गई.

मोदी के कई अपने अब उनके बेगाने हो चुके हैं.

आरएसएस के एक दूसरे महत्वपूर्ण संगठन विश्व हिन्दू परिषद या वीएचपी ने खुले आम मोदी के खिलाफ़ गुजरात में मोर्चा खोल रखा है. मोदी विरोधियों पर कार्रवाई तो दूर, संघ या प्रवीण तोगड़िया जैसे वीएचपी नेता टिप्पणी भी नहीं कर रहे हैं.

विश्व हिन्दू परिषद के कई नेता गुजरात परिवर्तन पार्टी या जीपीपी के केशु भाई पटेल के झंडे तले चुनाव लड़ रहे हैं. जूनागढ़ के ललित सुहागिया, सूरत में घनश्याम इताड़िया उर्फ काड़ू जैसे कई लोग विहिप जिलाध्यक्ष रहते हुए भाजपा के सामने चुनाव लड़ रहे हैं.

ऐसे कई और विहिप के लोग हैं जो खुले आम मोदी के खिलाफ़ काम कर रहे हैं.

अपने बेगाने

अहमदाबाद में यह भावना आम है कि भारतीय जनता पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय संगठन मंत्री संजय जोशी, जिन्हें मोदी ने हाल ही में पार्टी से निकलवाया है वो गुजरात परिवर्तन पार्टी के लिए परदे के पीछे से रणनीति बना रहे हैं.

गोविन्दाचार्य से अलग संजय जोशी को आज भी संघ नेतृत्व का बेहद प्रिय माना जाता है.

हालाँकि, जीपीपी के नेता और केशु भाई पटेल के दामाद डॉक्टर मयूर देसाई इस बात से साफ़ इनकार करते हैं.

इसके अलावा गुजरात की राजधानी गांधी नगर से भाजपा सांसद लालकृष्ण आडवाणी पूरे चुनावी परिदृश्य से एक तरह से गायब हैं.

हाल ही में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने सूरत में चुनावी सभाओं को संबोधित किया था, लेकिन उन सभाओं में भीड़ बहुत ही कम थी.

राज्य के कई भाजपा नेता और कार्यकर्ता मानते है कि मोदी ने अपने लोगों को गडकरी की सभा के लिए मेहनत करने का आदेश नहीं दिया, नतीजा कमज़ोर भीड़ के रूप में सामने आया.

मोदी की मर्ज़ी

मोदी हकीकत से बेखबर नहीं है. ऐसा लगता है कि उनकी मंशा ऐसा ही करने की थी वरना पिछले 15 बरसों से राज्य पर राज कर रही पार्टी के चुनावी पोस्टरों में केवल 11 साल में हुए विकास की बात नहीं होती.

भाजपा में डिजिटल विज्ञापनों में किरदार आ कर यह नहीं कहते कि "मैं मोदी का आदमी हूँ".

इन चुनावों में भाजपा की बात केवल कॉन्ग्रेस ही करती नज़र आती है भाजपा खुद नहीं.

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