भारतीय कंपनियां विदेशों में क्यों मुश्किल में हैं

जीएमआर से छिना कॉन्ट्रैक्ट
Image caption भारतीय कंपनियों की वैश्विक पहचान को लगातार धक्का लगा है.

भारतीय कंपनियों को हाल के वर्षों में विदेशों में मिली जुली कामयाबी मिली है.

अच्छी खबर ये है कि कई भारतीय कंपनियां वैश्विक कंपनियों को खरीदकर या विदेशों में आकर्षक अनुबंध हासिल कर बहुराष्ट्रीय कंपनियां बन गई हैं.

बुरी खबर ये है कि इनमें से कुछ कंपनियों से कई तरह गलतियां हुई हैं जिससे उनकी वैश्विक पहचान को धक्का लगा है.

ऐसी कुछ मिसालें हैं:

इसी महीने मालदीव की सरकार ने माले के हवाई अड्डे के प्रबंधन के लिए भारतीय कंपनी जीएमआर को दिए गए 50 करोड़ डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट को रद्द कर दिया. वहां की सरकार का कहना है कि इस कॉन्ट्रैक्ट के साथ कई तरह के कानूनी, तकनीकी और आर्थिक मुद्दे जुड़े हैं. वहीं जीएमआर का कहना है कि उससे इब्राहिम नासिर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नियंत्रण ले लेना 'बेतुका' और 'गैरकानूनी' है.

स्टील कंपनी जिंदल स्टील एंड पावर लिमिटेड (जेएसपीएल) को जुलाई में बोलिविया की सरकार के साथ विवाद के बाद वहां एक खनन परियोजना से हटना पड़ा. वहां की सरकार ने कहा कि हालांकि जेएसपीएल ने एल मुतुन में लोहे की खान विकसित करने के लिए 2.1 अरब डॉलर के निवेश का वादा किया था, लेकिन इस परियोजना में जो धन लगाया गया वो 10 करोड़ डॉलर से भी कम था. 2007 में इस परियोजना को लेकर दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ था.

जब पंकज ओस्वाल की आंशिक स्वामित्व वाली पर्थ आधारित कंपनी बुरुप फर्टीलाइजर दिवालिया हुई तो भारतीय व्यवसायी पर कंपनी से 21 करोड़ डॉलर निकाल लेने के आरोप लगे. ये पैसा ओस्वाल की निजी कंपनियों में लगाया गया जिनमें से कुछ सिंगापुर में रजिस्टर्ड थीं. वहीं ओस्वाल का कहना है कि उन्होंने पैसा निकाल कर कुछ गलत नहीं किया.

भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनी आर्सेलर-मित्तल ने अक्टूबर में घोषणा की कि वो फ्लोरेंज में अपनी संयंत्र भट्टियों को बंद करना चाहती है जो पहले से ही काम नहीं कर रही हैं. फ्रांस में इस कंपनी के लिए 20 हजार लोग काम करते हैं. भट्टियां बंद करने के उसके फैसले का भारी विरोध हुआ. फ्रांस की सरकार ने कहा कि आर्सेलर-मित्तल 2006 के उस समझौते को तोड़ रही है जिसमें कंपनी ने चालू विस्फोट भट्टियों को बंद न करने का वादा किया था. आर्सेलर-मित्तल इस आरोप से इनकार करती है.

विदेशों में भारतीय उद्यमों में कहां गलती हो रही है?

भयानक भूल

Image caption मित्तल के साथ फ्रांस सरकार का विवाद खासा सुर्खियों में रहा

क्यों भारतीय कंपनी अपने अंतरराष्ट्रीय करारों और विदेशों में साझेदारी समझौतों को नहीं संभाल पा रही हैं? क्यों जीएमआर जैसी कुछ कंपनियों पर विदेशों में पैसे देकर प्रभाव हासिल करने के आरोप लग रहे हैं? या फिर क्या वो स्थानीय कानूनों को समझने में नाकाम रहती हैं?

जिंदल स्टील की ही मिसाल लीजिए.

जून में जेएसपीएल की तरफ से जारी प्रेस विज्ञाप्त में कहा गया कि उसने बोलिविया में अपने अनुबंध को खत्म करने का फैसला किया है क्योंकि वहां की सरकार देश में गैस न होने की वजह से प्राकृतिक गैस खनन परियोजना के मौलिक करार के अनुसार प्रतिदिन 1 करोड़ घन मीटर में से सिर्फ एक चौथाई गैस को लेकर प्रतिबद्ध है.

ये बात सही भी हो सकती है लेकिन आलोचकों का कहना है कि भारतीय कंपनी से वहां दो बड़ी गलतियां हुईं.

पहली, वो ये समझने में नाकाम रही कि बोलिविया में गैस भंडार की वास्तविक क्षमता कितनी है. साथ ही उसने गलती से ये समझ लिया कि सरकार समझौते के अनुसार प्रतिदिन गैस की आपूर्ति करने में सक्षम होगी.

दूसरी बात, दोनों पक्षों के बीच खनन के समझौते के 180 के भीतर अलग से आपूर्ति समझौता होना था. लेकिन जेएसपीएल पांच साल में भी ये समझौता करने में नाकाम रही.

इसी तरह मालदीव में जीएमआर हवाई अड्डा परियोजना के मामले में ये मान बैठी थी कि वो एक जनवरी 2012 से इस हवाई अड्डे के उड़ान भरने वाले हर यात्री पर 25 डॉलर का एयरपोर्ट विकास शुल्क लगा सकती है.

कंपनी को उस वक्त झटका लगा जब मालदीव की अदालत ने कहा कि ऐसा कोई शुल्क गैर कानूनी है. इसे तभी लागू किया जा सकता है जब देश की संसद इसे बहुमत से मंजूर कर दे.

मालदीव ने इस शुल्क को रद्द कर दिया जबकि जीएमआर का कहना है कि इसके बिना हवाई अड्डे के आधुनिकीकरण की परियोजना को चला पाना मुश्किल है. इसके बाद मालदीव ने जीएमआर से कहा कि वो हवाई अड्डा वापस सौंप दे.

स्थानीय हालात समझें

Image caption जीएमआर माले के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के प्रबंधन और आधुनिकीकरण का काम संभाल रही थी

भारतीय कारोबारी आम तौर पर अपने देश में राजनीतिक परिदृश्य को अच्छी तरह संभालना जानते हैं. यहां तक कि केंद्र और राज्यों में होने वाले सत्ता परिवर्तन के बाद भी वे अपने निवेश को बचाने में कामयाब रहते हैं.

लेकिन इनमें से ज्यादातर भूल जाते हैं कि अन्य देशों में उनका ये आत्मविश्वास काम नहीं सकता क्योंकि वहां उन्हें “विदेशी खलनायक” के तौर पर देखा जाता है और स्थानीय राजनेता जनता को उनके खिलाफ भड़का कर राजनीतिक फायदा हासिल करने का प्रयास कर सकते हैं.

इस तरह विदेशों में निवेश करने वाले बहुत से भारतीय उद्यमी अन्य देशों में नई सरकार के सत्ता में आने पर तेजी से कदम नहीं उठा पाते हैं और नई सरकार के साथ सार्थक विचार विमर्श करने में नाकाम रहते हैं.

इनमें से कुछ इस अति-आत्मविश्वास का शिकार होते हैं कि स्थानीय अधिकारी उनके खिलाफ कदम नहीं उठाएंगे.

जीएमआर भी फरवरी 2012 में मालदीव में नई सरकार आने के बाद नए हालात को भांपने में नाकाम रही.

ऐसे में भारतीय कंपनियों को विदेश में मिलने वाले निवेश अवसर को हासिल करने से पहले वहां के स्थानीय माहौल, राजनीति और अपनी भावी संभावनाओं का स्पष्ट तौर पर विस्तार से मूल्यांकन करना चाहिए.

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