ऑनर किलिंग की धरती पर मना 'प्रेम का उत्सव'

 बुधवार, 19 दिसंबर, 2012 को 11:47 IST तक के समाचार
प्रेमोत्सव

दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में कुछ प्रेमी युगलों एक छत के नीचे जमा होकर प्रेमोत्सव मनाया

प्रेम ना बाड़ी ऊपजै, प्रेम ना हाट बिकाय..राजा परजा जिस रुचै, सीस देई ले जाए...

संत कबीर ने 14वीं सदी में प्रेम की सरलता और प्रेम की जटिलता को बड़ी ही खूबी से अपने इस दोहे में परिभाषित करने की कोशिश की है, लेकिन कई सदी बाद भी हमारे समाज में प्रेम संबंधों को सम्मान की नज़रों से नहीं देखा जाता है.

लेकिन दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा में एक छत के नीचे जमा हुए कुछ सफल, कम सफल और असफल प्रेमी युगलों ने 'प्रेम' की भावना को 'प्रेमउत्सव' के रुप में मनाने की पहल की.

इस 'प्रेमउत्सव' में शामिल होने वाले ज्य़ादातर युगल ऐसे थे जिन्होंने अंतरजातीय और अंतरधार्मिक प्रेम विवाह किया था. आधी रात तक चले इस उत्सव में कविता पाठ, चित्रकला प्रदर्शनी और प्रेम के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई.

प्रियंवद-विभावरी

प्रेमोत्सव

विभावरी और प्रियंवद ने अपने घरवालों के खिलाफ़ जाकर अंतरजातीय विवाह किया है

ये आयोजन प्रियंवद और विभावरी के घर पर हुआ था. इन दोनों का साथ 13 सालों का है. दोनों इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान पहली बार मिले थे और आज ग्रेटर-नोएडा में शादीशुदा ज़िंदगी बसर कर रहे हैं.

लेकिन ये सफर इतना आसान नहीं था. प्रियंवद ब्राह्मण परिवार से हैं और विभावरी दलित वर्ग. इसी कारण दोनों के परिवार इस रिश्ते को लेकर सहज नहीं थे.

घरवालों को मनाने की नाकाम कोशिशों के बाद इन्होंने दो साल पहले शादी कर ली.

दोनों को घरवालों के साथ-साथ अपने दोस्तों का भी विरोध सहना पड़ा. विभावरी के अनुसार, ''शुरुआती दौर में हमारे दोस्तों ने भी हमें गंभीरता से नहीं लिया लेकिन धीरे-धीरे जब उन्हें हमारे रिश्ते की गंभीरता और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का अंदाज़ा हुआ तो उनकी भी हमारे लिए सोच मज़बूत हुई.''

जबकि प्रियंवद कहते हैं, ''प्रेम आदमी को सरल बनाता है, बंदिशों से आज़ाद करता है. हमारा प्रेम इलाहाबाद में शुरु हुआ तो हमने वहीं जाकर शादी की, और जिस जगह ऑनर-किलिंग की घटनाएं होना आम है हमने यहां आकर अपना घर बसाया. कहीं ना कहीं हमारे मन में ये बात थी कि हम उस जगह पर प्रेम को लेकर रचनात्मक पहल करें जहां ऑनर किलिंग जैसी घटनाएं होती हैं.''

कार्यक्रम में शरीक होने आईं युवा कवियत्री रेणु यादव कहती हैं कि, ''ये वे युगल जोड़े हैं जो अपने परिवार से कटकर अपना अलग जीवन जी रहे हैं और उसे जीवंत बनाने की कोशिश कर रहे हैं. परिवार के साथ मनाए जाने वाले सभी त्यौहारों से दूर होकर ये प्रेम का उत्सव मना रहे हैं.''

धनंजय-गौसिया

प्रेमोत्सव

धनंजय और गौसिया को अपने घरवालों का ज्य़ादा विरोध नहीं सहना पड़ा

धनंजय त्रिपाठी दिल्ली के एक कॉलज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं और उनकी पत्नी गौसिया गृहिणी. दोनों ही यूपी के इलाहाबाद के रहने वाले हैं. करीब 18 साल के साथ के बाद दोनों ने अपने-अपने परिवार वालों को बगैर नाराज़ किए शादी की और आज काफी हद तक सुखी जीवन बिता रहे हैं.

धनंजय कहते हैं कि शुरुआत में दोनों के घरवाले तैयार नहीं थे, लेकिन जब दोनों ने शादी कर ली तो उन्होंने इनके रिश्ते को स्वीकार कर लिया.

ऐसा नहीं कि उन्हें समाज में ताने नहीं सुनने पड़ते हैं लेकिन उनके खुद के निजी व्यवहार में कट्टरता नहीं है. धनंजय के मुताबिक शायद इसकी वजह उनका और गौसिया का 18 साल का साथ या उनकी समझदारी थी जो उन्होंने कभी भी अपने घरवालों को तकलीफ़ नहीं दी.

गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर और शायर नवरस जाट अफ़रीदी कहते हैं, ''हमारे समाज का एक बड़ा हिस्सा काफी पिछड़ा हुआ है. मैं एक प्रेम विवाह की संतान हूं, मेरा ननिहाल सिख है और ददिहाल मुसलमान. जब मैंने अपनी शादी के लिए किसी धर्म विशेष की लड़की के लिए ज़ोर नहीं दिया तो अपने ही समाज में अछूत हो गया. इसलिए मैं हर उस जोड़े के साथ हूं जो समाज में व्याप्त इन जकड़बंधियों को तोड़ता है.''

निरुपमा-प्रियभांशु

प्रेमोत्सव

प्रियभांशु ने निरुपमा की दुखद मौत के बाद भी हिम्मत नहीं हारी है

निरुपमा और प्रियभांशु की प्रेम कहानी का अंत काफी दुखद था. दोनों दिल्ली में पत्रकारिता की पढ़ाई करते हुए पहली बार मिले थे और बाद में एक दूसरे से प्यार करने लगे.

निरुपमा ब्राह्णण जाति से थीं तो प्रियभांशु कायस्थ. दोनों बिहार के रहने वाले थे.

लेकिन जब निरुपमा अपने माता-पिता से इस रिश्ते के बारे में बात करने अपने घर गईं तब वहां कथित तौर पर उसकी हत्या कर दी गई.

इस घटना के बाद निरुपमा के घरवालों को जेल भी भेजा गया और प्रियभांशु पर निरुपमा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप लगाए गए.

इस आरोप के बाद प्रियभांशु भी जेल गए. प्रियभांशु के अनुसार वे आज भी निरुपमा को इंसाफ दिलाने की कोशिश में लगे हैं लेकिन अदालत के सामने खुद भी निर्दोष साबित नहीं हो सके हैं.

प्रियभांशु के मुताबिक, ''निरुपमा की मौत से मुझे काफी सदमा पहुंचा. मैं जेल भी गया लेकिन इस दौरान मेरे दिमाग में ये लगातार चलता रहा कि मुझे हिम्मत ना हार कर एक लडा़ई लड़नी है. मेरे अंदर सकारात्मक बदलाव आए, जो मुझे हर वक्त प्रेम का पैरोकार बनाता है.''

रचनात्मक पहल

प्रेम उत्सव

इस कार्यक्रम में मेहमानों ने चित्रकारों की पेंटिंग पर हाथ आज़माए

इस 'प्रेमोत्सव' में रचनात्मक जगत से कई लोग शामिल हुए. युवा कवि और चित्रकार कुमार अनुपम के अनुसार, ''प्रेम खुद में एक रचनाकारी क्रांतिकारी घटना है. ऐसे में जो प्रगतिशील कलाएं हैं वो किस तरह से अपनी भागीदारी इसमें कर सकती हैं हमने वो सुनिश्चित करने की कोशिश की है. अगर एक स्त्री और पुरुष ने जीवन में साथ आने का निश्चय किया है तो हमें इसे सलाम करना चाहिए.''

जबकि कवि और चित्रकार रविकांत जिन्होंने इस कार्यक्रम में पहली बार अपनी पेंटिंग प्रर्दशित की वे कहते हैं, ''हमने अपनी पेंटिग की पहली प्रदर्शनी के लिए इन प्रेमी जोड़ों के संघर्ष के इस उत्सव को इसलिए चुना क्योंकि मैं मानता हूं कि प्रेम सभी भावनाओं से उपर है. इसलिए मैंने अपनी पेंटिंग में दूसरों को भी अपने ब्रश और स्ट्रोक से रंग भरने की छूट दी ताकि लोगों को पेंटिंग से आत्मिक लगाव हो सके.''

रविकांत के अनुसार, ''ऐसा नहीं है कि यहां जुटे प्रेमी युगल एक बंद कमरे में ही ये प्रेमोत्सव कर रहे हैं जिसका समाज से कोई लेना देना नहीं है, दरअसल बंद कमरे के भीतर भी अगर विभिन्न पृष्टभूमि के लोग जब सार्थक प्रयास करते हैं तो वह कमरा भी असल में एक सामाजिक चौराहा बन जाता है. जिसका कभी-कभी सड़क के चौराहे पर जुटने से ज्य़ादा बड़ा सामाजिक महत्व होता है.''

और इन लोगों की कोशिश प्रेम को इन कलाओं के माध्यम से लोकतांत्रिक बनाने की है. इन कलाओं में जिस तरह के संयम, ताक़त और नैतिक शक्ति की ज़रुरत होती है असल में वही जीवन में प्रेम को बरकरार रखता है.

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