चंद सिक्कों की मोहताज ज़िंदगी...

सोनपुर
Image caption रोहित की तरह उसके कई दोस्त रोज़ नदी से पैसे निकालने का काम करते हैं

28 नवंबर से शुरु हुए सोनपुर मेले में यूं तो श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी पड़ी है लेकिन यहां बहने वाली गंडक नदी के तट पर प्लास्टिक की रस्सियों और उनमें लगे ख़ास तरह के चुंबक के साथ 10 साल का रोहित भी नज़र आ जाएगा.

रोहित यहां श्रद्धालुओं द्वारा नदी में फेंके गए सिक्कों को निकालने का काम करता है.

रोहित ये काम करने वाला अकेला किशोर नहीं है, उसके कई दोस्त भी हैं जो रोज़ सुबह पांच बजे से लेकर शाम पांच बजे तक ये काम करते हैं.

सोनपुर मेला पूरे एशिया प्रांत में पशुओं का सबसे बड़ा मेला है. ये मेला पूरे एक महीने तक चलता है और रोहित ने एक महीने तक अपने स्कूल से छुट्टी ले ली है.

रोहित के पिता शत्रुघ्न सिंह एक दैनिक मज़दूर हैं और अगर उनकी किस्मत अच्छी हो तो एक दिन में 100 रुपये के आसपास कमा लेते हैं.

और कुछ इतने ही पैसे रोहित रोज़ गंडक नदी के बहते पानी से निकाल कर अपनी मां की हाथ में रखता है, जिससे उनके छह जनों के परिवार की देखभाल में मदद मिलती है.

रोहित कहते हैं, ''मेरी मां मेरी इस कोशिश से काफी खुश है.''

रोहित ने दो साल पहले अपने दोस्तों की देखा-देखी ये काम शुरु किया था.

वे कहते हैं, ''शुरु में मेरे मन में इस काम को लेकर जिज्ञासा थी, और धीरे-धीरे मैंने इसे करने का तरीका भी सीख लिया.''

रोहित ने काम शुरु करने के लिए अपनी मां से 10 रुपये मांगे इस वादे के साथ कि वो शाम को दुगुना पैसा उन्हें वापिस करेगा.

भक्ति और सम्मान

सोनपुर में लगने वाले इस पशु मेले में हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं. वे लोग यहां गंडक और गंगा नदी के संगम में स्नान करते हैं. सोनपुर मेला पटना से 36 किमी दूर सारन ज़िले में होता है.

इस दौरान श्रद्धालु नदी में सम्मान के तौर पर सिक्के फेंकते हैं.

जैसे ही कोई भक्त नदी में सिक्के फेंकता है तो ये लड़के बाज़ दृष्टि से उसे देख लेते हैं और तुरंत चुंबक लगी रस्सियों को पानी में फेंक देते हैं.

ऐसे ही एक किशोर राकेश कुमार कहते हैं, ''मैं रोज़ तक़रीबन 150 रुपये के आसपास जमा कर लेता हूं. जिससे मेरे परिवार के खाने-पीने का इंतज़ाम हो जाता है.

राकेश के पिता सुरेश राय एक छोटी चाय की दुकान चलाते हैं और उनके परिवार में नौ लोग रहते हैं. इस काम में राकेश की मदद उनके छोटे भाई बिट्टु भी करते हैं.

राकेश कहते हैं, ''मेरी रस्सी में सिर्फ एक चुंबक लगा है जो बहुत प्रभावी नहीं है इसलिए मैं जल्द ही इससे बड़ी रस्सी और चुंबक खरीदूंगा ताकि मैं ज्य़ादा पैसे जमा कर सकूं.''

ग़रीबी

राकेश और रोहित के दोस्त कृष्णा कुमार भी रोज़ाना 100-150 रुपये जमा कर लेते हैं लेकिन उनका कहना है कि उनका काम आसान नहीं है.

Image caption ये लड़के सुबह पांच बजे से शाम पांच बजे तक पानी में खड़े रहकर सिक्के निकालते हैं

राकेश के अनुसार, ''मैं रोज़ाना 10 घंटे अपनी नज़रें नदी में फेंके जा रहे एक-एक सिक्के पर गड़ाए रखता हूं. कभी ये सिक्के मेरी जाल में फंसते हैं कभी मेरे दोस्तों के जाल में. मैं जमा किए गए कुछ पैसों से अपने लिए मिठाई भी खरीदता हूं.''

यहां धार्मिक अनुष्ठान करवाने वाले राधेश्याम पांडा कहते हैं, ''सोनपुर मेला शुरू होने के साथ ही गंडक और गंगा के तट पर आपको हज़ारों ऐसे बच्चे मिल जाएंगे जो वहां सिक्के जमा करने का काम करते हैं. ये लोग ये काम स्थानीय तकनीक़ के इस्तेमाल से करते हैं.''

मेले में पूजा के सामान बेचने वाले महेंद्र बाबू कहते हैं, ''ये बच्चे भले ही अलग-अलग आकार की रस्सी और चुंबक का इस्तेमाल करते हों लेकिन इन सब में जो बात सामान्य है वो है इनकी ग़रीबी.''

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