न भारत अपना रहा है न पाकिस्तान...

  • 20 दिसंबर 2012

मोहम्मद इदरीस पिछले 13 वर्षों से कानपुर की सड़कों पर भटक रहे हैं. ज़ाहिर है आप जानना चाहते होंगें कि उनका जुर्म क्या है और वो ऐसा क्यों कर रहे हैं?

पाकिस्तानी शहर कराची के रहने वाले मोहम्मद इदरीस 1999 में अपनी पत्नी और चार बच्चों को छोड़कर भारत में अपने बीमार पिता से मिलने कानपुर आए थे.

मोहम्मद इदरीस दर असल भारतीय नागरिक थे लेकिन एक पाकिस्तानी महिला से शादी करने के बाद वो पाकिस्तान चले गए और वहां की नागरिकता हासिल कर ली थी.

मोहम्मद इदरीस के कानपुर पहुंचने के कुछ ही दिनों बाद उनके पिता का देहांत हो गया था और उसी परेशानी के आलम में वो अपना वीज़ा ख़त्म होने के बाद तीन दिनों तक कानपुर में रह गए थे.

जब वो अपना वीज़ा बढ़ाने के लिए कानपुर में अधिकारियों से मिले तो उन्हें पाकिस्तानी जासूस समझकर गिरफ़्तार कर लिया गया.

दस साल की लंबी लड़ाई के बाद भारतीय अदालत ने उन्हें बरी कर दिया और पांच सौ रूपए के जुर्माने के साथ पाकिस्तान भेजने का आदेश दिया.

क़िस्मत का खेल

लेकिन उनकी मुसीबत यहीं ख़त्म नहीं हुई 13 साल के बाद भी वो अपने देश पाकिस्तान लौटने की लड़ाई लड़ रहे हैं.

मामला सामने आने के बाद पाकिस्तान के मानवाधिकार कार्यकर्ता अंसार बर्नी ने बीबीसी के ज़रिए मोहम्मद इदरीस की कहानी पढ़ने के बाद उनकी मदद करने का वादा किया है.

अंसार बर्नी ने ट्वीट किया है कि उनका संगठन अंसार बर्नी ट्रस्ट भारत और पाकिस्तान के अधिकारियों से मोहम्मद इदरीस के बारे में बातचीत करेगा.

भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार मोहम्मद इदरीस एक पाकिस्तानी पासपोर्ट के साथ 1999 में भारत आए थे और 2003 में उनका पासपोर्ट की मियाद ख़त्म हो गई थी.

अब पाकिस्तान का कहना है कि इदरीस पाकिस्तानी नागरिक नहीं हैं, वो अपनी पत्नी से अलग हो गए हैं और उनके परिवार ने उनको अपने परिवार का हिस्सा मानने से इनकार कर दिया है.

दिल्ली स्थित पाकिस्तानी दूतावास के प्रवक्ता मंज़ूर अली मेमन ने इसकी जानकारी देते हुए कहा, ''हमारे गृहमंत्रालय ने हमें बताया है कि वो पाकिस्तानी नागरिक नहीं हैं. हमारी जानकारी के अनुसार वो अपनी पत्नी और उनके घरवालों से अलग हो गए हैं. हमने भारतीय अधिकारियों को इसकी जानकारी दे दी है.''

तो इस तरह मोहम्मद इदरीस की कहानी ये है कि कोई भी देश उन्हें अपना नागरिक नहीं मान रहा और वो कानपुर की सड़कों पर दर-दर भटक रहे हैं.

इसी हालत में 40 साल के मोहम्मद इदरीस से कानपुर में मेरी मुलाक़ात हुई.

सफेद शर्ट और पैंट पहने हुए पतले-दुबले इदरीस को देखकर ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि दोनों देश के रवैये ने उनकी क्या हालत बना दी है.

अपनों का सितम

उनकी पूरी संपत्ति और सामान के नाम पर उनके पास एक कपड़े का झोला है जिसमें एक कंघी, एक टूथ ब्रश और टूथ पेस्ट, एक तौलिया और कुछ तस्वीरें हैं.

मैं उनके साथ पास में ही बह रही गंगा नदी के घाट पर जाती हूं और थोड़ी देर बाद इदरीस धीरे-धीरे अपनी कहानी बताना शुरू करते हैं.

इदरीस कहते हैं कि कराची में अपने परिवार के साथ गुज़ारे दिनों की याद करते हुए वो किसी तरह ज़िंदा रहते हैं.

इदरीस कहते हैं, ''मुझे यहां आकर दिन गुज़ारना बहुत पसंद है. मैंने कई बार आत्महत्या करने के बारे में सोचा लेकिन जब मैं यहां बैठता हूं तो गंगा का पानी मुझे शांत कर देता है.''

Image caption इदरीस की अपने बच्चों के साथ तस्वीर.

इदरीस कराची में चमड़े के सामान की एक दुकान चलाते थे. कराची के दिनों की याद करते हुए इदरीस कहते हैं, ''मैं अपनी पत्नी और चार बच्चों को अपनी मोटरसाइकिल पर लादकर कराची का नज़ारा लेते थे. किसी भी दूसरे परिवार की तरह हमलोग आपस में हंसी मज़ाक़ करते थे और आइसक्रीम खाते थे.''

लेकिन ये उन दिनों की बाद है जब सबकुछ ठीक चल रहा था और तभी दोनों देशों के क़ानून और आपसी रिश्तों ने उनकी ज़िंदगी में भूचाल ला दिया.

इदरीस कहते हैं, ''भारत को मेरे मामले में बहुत पहले फ़ैसला कर देना चाहिए और पाकिस्तान को मुझे एक नया पासपोर्ट दे देना चाहिए. मैंने 10 वर्षों तक अदालत में लड़ाई लडी और अब पिछले तीन साल से अधिकारियों के चक्कर काट रहा हूं.''

लेकिन ऐसा लगता है कि क़िस्मत के मारे इस शख़्स पर केवल अधिकारियों ने सितम नहीं किया, उनके अपनों ने जो किया शायद वो और भी दर्दनाक है.

इदरीस कहते हैं कि उनके पिता की मौत के बाद उनके भाईयों ने तमाम रिश्ते तोड़ दिए, यहां तक कि उन्हें घर से भी निकाल दिया और तभी उन्हें एक शेल्टर होम में शरण लेनी पड़ी.

और उसके बाद से वो कानपुर की सड़कों पर भटक रहे हैं, रात होती है तो कभी किसी सरकारी अस्पताल में, कभी किसी पुरानी इमारत में रात गुज़ार लेते हैं.

उम्मीद

लेकिन उनकी फ़रयाद कोई सुन क्यों नहीं रहा इसको जानने के लिए मैंने ख़ुद भी उनके साथ तीन दिनों तर सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काटे लेकिन सबके पास कोई न कोई बहाना मौजूद था.

इदरीस कहते हैं कि वो शायद ज़्यादा दिनों तक जीवित न रहें लेकिन वो अपने बचे हुए दिन अपनी पत्नी और बच्चों के साथ गुज़ारना चाहते हैं.

लेकिन इदरीस को ये बताने की मेरी हिम्मत नहीं हुई कि पाकिस्तान में हमारे साथी रिपोर्टर ने जब इदरीस की पत्नी से संपर्क किया तो उन्होंने कहा कि इदरीस से अब हमारा कोई वास्ता नहीं है.

संबंधित समाचार