सोशल मीडिया पर मोदी समर्थक हावी

  • 20 दिसंबर 2012
टि्वटर
Image caption सोशल मीडिया साइटों पर हर जगह गुजरात चुनाव की ख़बरें हावी हैं

गुजरात और हिमाचल के चुनाव नतीजों ने फ़ेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल मीडिया साइटों पर हलचल को एकाएक कई गुना बढ़ा दिया है.

ट्विटर पर आलम ये है कि उसके शीर्ष दस ट्रेंडिंग टॉपिक्स में दसों के दस गुजरात, नरेंद्र मोदी और हिमाचल प्रदेश से जुड़े हुए हैं.

इतना ही नहीं वैश्विक स्तर पर भी ट्रेंडिंग टॉपिक्स में दस में से कम से कम तीन टॉपिक्स गुजरात और नरेंद्र मोदी से जु़डे हुए थे.

फ़ेसबुक पर भी गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव परिणामों से जुड़े विषयों पर पोस्ट होते रहे और फ़ोटो शेयर किए जाते रहे.

आम तौर पर दिखता है कि सोशल मीडिया साइटों पर मोदी के समर्थक ज़्यादा आक्रामक ढंग से छाए रहे.

टिप्पणियाँ

जैसा कि चुनावों के दौरान दिख रहा था परिणाम आने के बाद भी मोदी के समर्थक और विरोधियों ने तीख़ी टिप्पणियाँ की हैं.

ख़ुद नरेंद्र मोदी ने चुनाव परिणाम आने के बाद दोपहर तीन बजे तक कोई टिप्पणी नहीं की थी. लेकिन सुबह उन्होंने विवेकानंद का एक सूत्र वाक्य अपने ट्विटर संदेश में डाला था.

इसमें लिखा गया था, "पीछे मुड़कर मत देखो, आगे बढ़ो. हमें असीम ऊर्जा, असीम साहस और असीम धैर्य की ज़रुरत है."

वहीं मोदी के समर्थक और भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने ट्विटर पर लिखा है, "भारत जल्द ही रवांडा को शर्मिंदा करने की स्थिति में पहुँच जाएगा. मोदी का समर्थन करने की ज़रूरत इसलिए है क्योंकि उनके पास रीढ़ है और वे उदारवादियों की ज़रा भी परवाह नहीं करते."

चुनाव परिणाम आना शुरू होने से पहले ही जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्लाह ने लिखा कि वे चुनाव परिणामों पर नज़र रखेंगे लेकिन एक में तो मामला सिर्फ़ जीत के अंतर का दिखता है. उन्होंने गुजरात का नाम नहीं लिखा लेकिन उनका इशारा उधर ही था.

ट्विटर पर डॉक्टर मनीष कुमार ने लिखा है, "चुनाव प्रचार श्रमसाध्य काम होता है जो मोदी ने किया. राहुल बाबा का अंतिम समय पर अवतरित होना ग़लत रणनीति थी."

लगभर इसी तरह की टिप्पणी कुमार संदीप ने बीबीसी हिंदी के फ़ेसबुक पेज पर की है. वे लिखते हैं, "मोदी जी ने चुनाव प्रचार को ही पुन:परिभाषित किया, कोई मुद्दा नहीं केवल मोदी. एक मोदी नहीं 26-26 मोदी. भारतीय चुनाव को किस तरह अमरीकी स्टाइल में लड़ा जाता है वो दिखाया मोदी जी ने. कांग्रेस कन्फ्यूज़ हो गई कि इस रणनीति का मुक़ाबला कैसे किया जाए."

बीबीसी हिंदी के ही फ़ेसबुक पेज पर किंग ख़ान ने लिखा है, "बात मज़े की है कि गुजरात में तो जीत गई भाजपा लेकिन हिमाचल राज्य खो दिया. दोनों राज्यों में भाजपा का शासन था. एक हारा, एक जीता फिर भाजपा ने क्या पाया? फिर भी केन्द्र में आने की बात कर रहे हैं भाजपाई."

Image caption बीबीसी हिंदी के फेसबुक पेज पर भी पाठकों ने कई कमेंट्स भेजे हैं

मोदी की जीत को बीबीसी हिंदी के ही फ़ेसबुक पेज पर नवल जोशी ने दूसरी तरह से देखा है, "गुजरात में मोदी का चुनाव जीतना दूसरी राजनीतिक पार्टियों के लिए जितना परेशान कर देने वाला है उससे अधिक स्तब्धकारी भाजपा और आरएसएस के लिए है. आज मोदी का कद भाजपा के लिए न तो निगलने लायक है और न ही वे इसे उगल सकते हैं. कहा जा सकता है कि भाजपा और आरएसएस की राजनीति को मोदी उसके चरम तक ले आये हैं जिसके बाद केवल व्यक्ति ही निर्णायक हो जाता है उसके लिए कोई पार्टी कोई सिद्धान्त या कोई नीति-निर्देशक तत्व रह नहीं जाता है. यह न तो किसी देश के लिए अच्छा है और न ही किसी भी राजनीति के लिए ही चाहे वह कोई भी हो."

यहीं अंकित कुंदन दुबे ने लिखा है कि ये मोदी की जीत नहीं कांग्रेस की हार है. उनका कहना है कि केशुभाई पटेल के कारण सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी वाले वोट बँट गए, ये भी हार का एक कारण रहा.

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