बलात्कार पीड़ित: ज़िंदगी भर मौत से लड़ना होगा

  • 21 दिसंबर 2012
प्रदर्शन
Image caption बलात्कार के इस मामले के बाद शुरू हुए प्रदर्शन पांच दिन बाद भी जारी है

दिल्ली के अस्पताल में मौत से लड़ रही बलात्कार पीड़ित लड़की को मातृत्व से लेकर भोजन जैसी आम खुशियों को हासिल करने के लिए पूरी ज़िन्दगी जूझना पड़ सकता है.

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के अधीक्षक डॉक्टर बीडी अथानी ने लड़की की सेहत के बारे में जानकारी देते हुए बताया, "उसके पेट से आंत का एक बड़ा हिस्सा निकाला जा चुका है."

अस्पताल का हर डॉक्टर इस लड़की के ज़िंदा रहने के ज़ज्बे को सलाम कर रहा है.

‘ज़िंदा बचना पहली लड़ाई’

चेन्नई ने जाने-माने अडयार इंस्टीट्यूट में वरिष्ठ सर्जन डॉक्टर आनंद राजा इस लड़की के सामने आने वाली चुनौतियों की बात करते हुए कहते हैं “इस तरह की हालत में मरीज़ के सामने तात्कालिक ख़तरा तो संक्रमण का है. साथ ही यह भी कि उसके शरीर के अंग धीरे-धीरे काम करना ना बंद कर दें.”

डॉक्टर राजा इस लड़की के सामने भविष्य में आने वाले संभावित खतरों के बारे में कहते हैं, “इसकी ज़िन्दगी बहुत ही कठिन हो सकती है.”

Image caption डॉ आनंद राजा का कहना है कि इस लड़की को बचाना इलाज कर रहे डॉक्टरों के सामने सबसे पहली चुनौती है.

डॉक्टर राजा समझाते हुए कहते हैं कि आंतें ना केवल शरीर के भीतर की गंदगी को बंद रखती हैं बल्कि खाने से पोषण को निकालने का काम भी करती है.

राजा कहते हैं, “आंतों की गैर मौजूदगी के चलते इस किसी को भी जीवन भर नसों के ज़रिए पोषण पर मजबूर रहना पड़ सकता है. नसों के ज़रिए पोषण लेते रहने पर इन्फेक्शन का ख़तरा सदा बना रहता है. यह दवाएं और विटामिन कतई सस्ते नहीं आते.”

इस लडकी के सामने आ सकने वाली दूसरी दुश्वारियों के बार में बात करते हुए डॉक्टर आनंद राजा कहते हैं, “आँतों के कम होने की वजह से मरीजों को शॉर्ट बॉवेल सिंड्रोम का शिकार भी होना पड़ सकता है जिसकी वजह से मरीज़ को कुछ भी खाते ही शौच जाने की ज़रुरत महसूस होती है.”

‘मातृत्व भी कठिन’

डॉक्टर राजा के अनुसार, “योनिद्वार से लेकर शरीर के मध्य में स्थित आँतों की गंभीर चोटों से उबरी हुई किसी भी महिला के लिए पहले गर्भ धारण करना बेहद कठिन हो सकता है. गर्भ धारण के बाद भी बच्चे के जन्म तक पूरी राह बेहद खतरों से भरी साबित हो सकती है.”

डॉक्टर राजा कहते हैं, “कुछ पश्चिमी देशों में शॉर्ट बॉवेल का प्रतिरोपण किया गया है लेकिन वो बेहद सफल नहीं साबित हुआ है. इसलिए अभी तक यह प्रचलित नहीं हो पाया है.”

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