बंगलौर: गांव वालों के सिर शहरी कूड़ा

कूड़े का कोई प्रबंधन नहीं है
Image caption कूड़े के निपटारे का कोई प्रबंध नहीं है

आधी रात भी नहीं हुई है और बंगलौर से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित मानडूर की तरफ ट्रकों का काफिला बढ़ता हुआ दिखाई देता है. इन ट्रकों पर न अनाज है न ही खनिज.

इन पर लदा है ढेरों कूड़ा जो बंगलौर से रात के अंधेरे में ले जाया जा रहा है.

ये कूड़ा इस इलाके में फेंका जाएगा क्योंकि बंगलौर जैसे भारत के सबसे खूबसूरत शहर में कूड़े को ठिकाने लगाने की कोई जगह नहीं है.

शहर के दूर दराज इलाकों या फिर शहर से लगे गांव बंगलौर के कूड़े का दंश झेल रहे हैं.

यहां का नगर निगम शहर के कूड़े को गांव के लोगों के सिर मढ़ रहा है.

आंकलन बताते हैं की हर रोज़ लगभग पांच सौ ट्रक कूड़ा मानडूर, माव्ल्लिपुरा और इसी तरह के अन्य दूर दराज़ वाले इलाकों में फेंका जा रहा है.

कूड़ा बना चुनौती

माव्ल्लिपुरा में जहां कूड़ा फेंका जा रहा है वो अरकावती नदी का तटीय इलाका है. यहीं से पूरे इलाके में पीने का पानी की आपूर्ति होती है.

इतना ही नहीं माव्ल्लिपुरा के पास येलाहंका में भारतीय वायु सेना का प्रशिक्षण केंद्र भी है.

कहा जा रहा है कि वायुसेना के कई विमान कूड़े की वजह से मंडरा रहे पक्षियों से टकराने के कारण क्षतिग्रस्त हुए हैं.

पर्यावरण के संरक्षण में लगे सामाजिक संगठन 'एनवायरनमेंट सपोर्ट ग्रुप' के लियो सल्दाना कहते हैं कि सिर्फ माव्ल्लिपुरा में ही 45 लाख टन कूड़ा फेंका हुआ है.

मानडूर पहुंचते पहुंचते हवा में दुर्गंध की वजह से सांस भी लेना मुश्किल हो जाता है. ये छोटा सा कस्बा है जहां लगभग दो हज़ार घर है. यहां के लोगों में गुस्सा और बेचैनी है.

उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि आखिर बंगलौर शहर का कूड़ा उन्हें सिर पर क्यों लादा जा रहा है.

लोगों का कहना है की कूड़े की वजह से भूमिगत जल और वायु दोनों प्रदूषित हो गए है.

प्रदूषण से मौतें

मानडूर के नारायणअप्पा का कहना है, "आप इस दुर्गन्ध को महसूस कर सकते हैं. यहां सांस लेना भी मुश्किल है. मच्छर इतने हैं कि पूछिए मत. ज़मीन का पानी भी प्रदूषित हो गया है."

Image caption शहर से कूड़ा ट्रकों में भर कर गांवों में लाया जाता है

मानडूर के रहने वालों ने बताया कि आधे वर्ग किलोमीटर में कूड़ा पड़ा हुआ है और इसका दायरा बढ़ता ही जा रहा है.

कूड़े के मामले को लेकर लोगों का विरोध बढ़ता ही जा रहा है. इस मुद्दे को लेकर हो रहे प्रदर्शनों के बाद अब सरकार के मंत्रियों ने आश्वासन दिया है कि फ़रवरी से ये पूरी तरह बंद हो जाएगा.

बीबीसी से बातचीत में मानडूर के ही रेवम सिद्दप्पा ने कहा, “यहाँ रोज़ पांच सौ ट्रक कूड़ा लाया जाता है. पहले ये तय हुआ कि रात में लाया जाएगा. मगर अब तो दिन क्या और रात क्या, चौबीसों घंटे बस कूड़ा ही कूड़ा और ट्रक ही ट्रक. ज़िन्दगी नर्क बन गई है”

मानडूर से ज्यादा बुरा हाल माव्ल्लिपुरा का है जहां 45 लाख टन कूड़ा आसमान के नीचे पहिला पड़ा है.

पर्यावरणविद लियो सल्दाना कहते है कि वायु और जल में हो रहे प्रदूषण की वजह से मवाल्लिपुरा में ही कई लोग मर चुके हैं.

कूड़े पर राजनीति

सल्दाना का आरोप है कि लोगों के विरोध के बाद माव्ल्लिपुरा में कूड़ा फेंकना बंद हो गया था.

Image caption नारायणअप्पा कहते है कि कूड़े के कारण सांस लेना भी मुश्किल हो रहा है

मगर एक कद्दावर मंत्री के इशारे पर इस इलाके में फिर से कूड़ा फेंका जा रहा है जिसका लोग अब विरोध कर रहे हैं.

सल्दाना का मानना है कि कूड़े को उसके स्रोत पर ही ठिकाने लगा देना चाहिए न कि किसी और के सिर पर फेंका जान चाहिए.

वो कहते हैं, "कूड़ा आपने पैदा किया तो ये आपकी समस्या है. आप इसे गांव वालों के सर पर नहीं दाल सकते. शहर का कूड़ा गांवालों नें नहीं पैदा किया. वो फिर इसे क्यों झेलें?"

बहरहाल कूड़े के सवाल पर कर्णाटक की राजनीति गरमाई है. भारतीय जनता पार्टी से बगावत कर निकले नेता बीएस येदियुरप्पा नें घोषणा की है कि उनकी पार्टी 2013 में होने वाले विधानसभा के चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाएगी.

वहीं मानडूर और माव्ल्लिपुरा के लोगों नें चेतावनी दी है की उनके इलाकों में कूड़ा फेंकना अगर बंद नहीं किया गया तो वो सारा का सारा कूड़ा मंत्रियों और मुख्यमंत्री के घर के सामने लाकर डाल देंगे.

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