कांस्टेबल की मौत को लेकर विरोधाभासी बयान

 बुधवार, 26 दिसंबर, 2012 को 12:28 IST तक के समाचार

प्रदर्शनकारियों को खदेड़ती पुलिस

दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ बलात्कार के विरोध में हुए प्रदर्शनों के दौरान घायल हो गए और बाद में अस्पताल में दम तोड़ने वाले दिल्ली पुलिस के सिपाही सुभाष तोमर के मामले में विवाद पैदा हो गया है.

इस मामले में दिल्ली पुलिस और प्रदर्शनकारियों के अपने-अपने दावे हैं और उनमें विरोधाभासों के कारण संदेह की स्थिति बन गई है.

दिल्ली पुलिस का कहना है कि तोमर 23 दिसंबर को इंडिया गेट पर प्रदर्शनकारियों के हमले में घायल हुए थे जबकि एक चश्मदीद ने दावा किया है कि तोमर प्रदर्शनकारियों को खदेड़ते हुए अपने आप गिर पड़े थे और उनके शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था.

चश्मदीद का दावा है कि तोमर प्रदर्शनकारियों को खदेड़ रहे थे कि इस दौरान वह क्षण भर के लिए रुके और फिर गिर पड़े. चश्मदीद ने साथ ही दावा किया कि उसने तोमर को अस्पताल ले जाने में मदद की.

उधर दिल्ली पुलिस ने इस मामले में आठ लोगों के ख़िलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज किया है. पुलिस ने सोमवार को इन लोगों को गिरफ़्तार करने के बाद ज़मानत पर छोड़ दिया था.

दिल्ली के पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने मंगलवार शाम आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में बताया कि तोमर के शरीर पर चोट के निशान थे और उसी की वजह से उनकी मौत हुई. हालाँकि उन्होंने ये भी कहा कि पूरी स्थिति स्पष्ट होने के लिए पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट का इंतज़ार करना पड़ेगा.

मुख्यमंत्री की शिकायत

इस बीच गैंगरेप मामले में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे से दिल्ली पुलिस की शिकायत दर्ज कराई है.

शीला दीक्षित

इस शिकायत में कहा गया है कि दिल्ली पुलिस के अधिकारियों ने पीड़िता का बयान लेते वक्त दखलंदाजी की है. शीला दीक्षित ने इस मामले की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है.

शिंदे को लिखे ख़त में दीक्षित ने कहा कि सब डिविजनल मजिस्ट्रेट उषा चतुर्वेदी जब पीड़िता का बयान दर्ज कर रहीं थीं तब पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दखलंदाजी की.

बनाया जा सकता है जांच दल

सूत्रों के मुताबिक इस शिकायत के आधार पर मामले की जांच हो सकती है और इसके लिए एक महिला अधिकारी के नेतृत्व में जांच दल बनाया जा सकता है.

उषा चतुर्वेदी ने अपनी शिकायत डिप्टी कमिश्नर (पूर्व) बीएम मिश्रा को भेजी. मिश्रा ने ये शिकायत मुख्यमंत्री तक पहुंचाई. इस शिकायत को देखने के बाद मुख्यमंत्री ने काफी नाराज़गी में केंद्रीय गृह मंत्री को ख़त भेजने का फ़ैसला लिया.

चतुर्वेदी ने शिकायत में कहा है कि उन्हें पीड़िता का बयान दर्ज करते वक्त वीडियो रिकॉर्डिंग से मना किया गया. इसके अलावा पुलिस अधिकारियों ने उषा चतुर्वेदी को पहले से तय प्रश्नावली के आधार पर बयान लेने को कहा.

"अगर मजिस्ट्रेट को ऐसा लग रहा था कि उनके साथ सही व्यवहार नहीं हो रहा है तो वे बयान दर्ज करने से इनकार कर सकती थीं लेकिन उन्होंने बयान दर्ज किया."

जब उषा चतुर्वेदी ने इससे इनकार किया तो पुलिस अधिकारियों ने उनके साथ भी अभद्र व्यवहार किया.

कमिश्नर ने किया आरोपों का खंडन

दूसरी ओर पुलिस आयुक्त नीरज कुमार ने इन आरोपों को खंडन किया है.

उन्होंने कहा, "उषा चतुर्वेदी को हमारे अधिकारी साथ में लेकर अस्पताल गए. जब उन्होंने मामले के बारे में ब्रीफ करने को कहा तब हमने उन्हें इस मामले की जानकारी दी. जहां तक वीडियो रिकॉर्डिंग की बात है तो पीड़िता की मां नहीं चाहती थी कि बयान की रिकॉर्डिंग की जाए. डॉक्टरों की भी यही राय थी."

नीरज कुमार ने ये भी बताया है कि मजिस्ट्रेट को अपनी मर्जी से सवाल पूछने से भी नहीं रोका गया और ना ही उन्हें कोई प्रश्नावली दी गई.

"पीड़िता का बयान दर्ज करते वक्त वीडियो रिकॉर्डिंग से मना किया गया."

उन्होंने सवालिया लहजे में कहा, "अगर मजिस्ट्रेट को ऐसा लग रहा था कि उनके साथ सही व्यवहार नहीं हो रहा है तो वे बयान दर्ज करने से इनकार कर सकती थीं लेकिन उन्होंने बयान दर्ज किया."

दिल्ली पुलिस के मुताबिक उषा चतुर्वेदी ने पीड़िता और उनकी मां दोनों के बयान दर्ज किए और उस वक्त कोई शिकायत दर्ज नहीं की.

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर ने कहा, "इस शिकायत की जानकारी मीडिया से मिली है, बावजूद इसके यह पूरा प्रकरण ही खेद जनक है."

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