क्या रतन टाटा की विरासत को आगे बढ़ा पाएँगे सायरस?

रतन टाटा
Image caption विरासत सौंपने के लिये तैयार हैं रतन टाटा

कारोबारी दुनिया में नेतृत्व में किसी किस्म के बदलाव के लम्हे बेहद नाज़ुक होते हैं. खासकर उन हालात में जबकि कोई शख़्स दो दशकों से भी ज़्यादा समय से कंपनी की अगुआई कर रहा हो, कारोबार बहुत फैला हुआ हो और उसे इज़्ज़त भरी नज़रों से देखा जाता हो.

ऐसे वक़्त में जबकि रतन टाटा कंपनी का नेतृत्व सायरस मिस्त्री को सौंपने के लिए तैयार हैं, टाटा समूह के अंदर और बाहर दोनों ही तरफ बेचैनी का आलम है.

रतन टाटा ने अपने उत्तराधिकारी के लिए एक समृद्ध विरासत छोड़ी है. दुनिया में आर्थिक मंदी के बावजूद टाटा समूह ने अंतरराष्ट्रीय फ़लक पर विकास और विस्तार की रणनीति को कामयाबी के साथ अंजाम दिया है.

रतन टाटा ने टाटा को एक ब्रांड के रूप में स्थापित किया है और यही उनके विरासत का सबसे कीमती पहलू है. इसकी चमक लगातार बरकरार है. वर्ष 2011 में एक एजेंसी ने टाटा ब्रांड का मूल्यांकन 16.3 अरब डॉलर में किया था और उसे दुनिया के 45 वें सबसे कीमती ब्रांड का दर्जा दिया था.

बदलाव की दस्तक

वर्ष 1991 में जब रतन टाटा को समूह का नेतृत्व सौंपा गया था, तब हालात अलग थे. उनके पूर्ववर्ती जेआरडी टाटा को पुरोधा समझा जाता था. जेआरडी ने सरकारी नियंत्रण और लालफीताशाही वाले बेहद मुश्किल भरे दौर में न केवल कंपनी की अगुआई की थी बल्कि उसे आगे भी बढ़ाया था. भारतीय उस दौर को लाइसेंस राज के नाम से जानते हैं.

लेकिन 80 के दशक के आखिर तक जेआरडी का नेतृत्व कमज़ोर पड़ने लगा था. समूह के भीतर ही कंपनी के प्रमुख कारोबारी हितों का नियंत्रण महत्वाकांक्षी और बड़े प्रबंधकों के हाथ में आ गया. ये प्रबंधक क्षत्रप समझे जाने लगे और पकड़ बनाए रखने के संघर्ष में आपस में ही उलझ गए. कंपनी के नेतृत्व के लिए ये प्रतिद्वंदी बन गए थे.

इस अखाड़े में रतन टाटा लगभग अनजान चेहरे की तरह आए. कुछ क्षत्रपों को लगा कि इन्हें किनारे किया जा सकता है. लेकिन रतन ने धीरे-धीरे अधिकारपूर्वक सूमह पर अपनी पकड़ मज़बूत करनी शुरू कर दी.

जिम्मेदारी संभालने के बाद रतन टाटा की पहली प्राथमिकता एक मज़बूत ब्रांड के विकास की थी. उन्होंने सालों बाद कहा भी था कि “हमारे पास एक मज़बूत विरासत थी लेकिन ब्रांड नहीं था.”

कंपनी की छवि

उपभोक्ता, कर्मचारी, निवेशक, समुदाय और सभी भागीदारों के बीच ब्रांड के विकास को लेकर सालों कोशिश की गई. नतीजतन भारत में टाटा समूह को लेकर लोगों का नज़रिया तेज़ी से बदला.

90 के दशक की शुरुआत में टाटा का नाम भरोसे और इज़्जत के साथ लिया जाता था. लेकिन इसकी छवि पुरानी और जड़ किस्म की हो गई थी. इन्फोसिस और रैनबैक्सी जैसी नई और आधुनिक कंपनियां भारत के वास्तविक भविष्य की नुमाइंदगी करती हुई दिखाई दे रही थीं.

लेकिन एक दशक के बाद सब कुछ बदल गया. टाटा को भविष्य की तरफ बढ़ रहे नए कारोबारी समूह की तरह देखा जाने लगा. वर्ष 2008 में बिजनेस वीक नाम की मैगज़ीन ने टाटा समूह का नाम दुनिया के दस सबसे अभिनव कारोबारियों की सूची में शुमार किया. नौकरी करने के लिहाज़ से नवयुवक अब टाटा को अपनी पसंदीदा कंपनी समझते हैं, भले ही टाटा उन्हें अपने प्रतिद्वंदियों की तुलना में कम वेतन देती हो.

दूसरा बदलाव टाटा समूह को भारतीय कंपनी से अंतरराष्ट्रीय नजरिए वाली कंपनी की छवि देकर किया गया. भारतीय बाज़ार को प्राथमिकता में रखकर टाटा देश में कारोबार करती आई थी. इसलिए उसकी रणनीति भी भारत केंद्रित रही. शुरुआत से ही रतन टाटा को यह यकीन था कि तरक्की करते रहने के लिए कंपनी को अंतरराष्ट्रीय फ़लक पर उतरना होगा.

अधिग्रहण की रणनीति

Image caption सायरस के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है

अंतरराष्ट्रीय रणनीति रातों-रात नहीं बनी. सोच में बदलाव की ये प्रक्रिया कंपनी में लगातार जारी है. टाटा ब्रिवरेजेज़, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज और ताज होटल जैसी समूह की कंपनियां दूसरों के मुक़ाबले आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरीं. इसी समूह की कुछ कंपनियों ने अपनी शुरुआत देर से की.

टीसीएस ने शुरुआत में बाज़ार की अगुआई की और आज इसका कारोबार पूरी दुनिया में फैला हुआ है. टाटा ब्रिवरेजज़ जो पहले टाटा टी के नाम से जानी जाती थी, काफी पहले बाज़ार में उतर गई थी. वर्ष 2000 में टेटली टी के अधिग्रहण के साथ ही कंपनी सबकी नज़र में आ गई. समूह की दूसरी कंपनियों ने पिछले कुछ सालों में अतंरराष्ट्रीय स्तर पर अधिग्रहण करने की शुरुआत ही की है.

हालांकि कंपनी की रणनीतिक मंशा अब साफ़ है. इसमें किसी को संदेह नहीं होगा कि टाटा स्टील के राजस्व का बड़ा हिस्सा भारत के बाहर के बाज़ारों से आता है. अब पीछे लौटने जैसी कोई बात नहीं रही.

रतन टाटा के उत्तराधिकारी सायरस मिस्त्री की जिम्मेदारी इसी रणनीति को आगे ले जाने की है. टाटा के प्रबंधकों और उस पर नज़र रखने वाले लोगों की बेचैनी की एक वजह उनका रतन टाटा की तरह ही अनजान सा होना है. क्या उनमें यह माद्दा है कि वे टाटा समूह की रणनीति को सुचारु तरीके से लागू कर पाएँ?

कंपनी का विस्तार

Image caption भविष्य के प्रति आशान्वित हैं रतन टाटा

यह महज़ समूह के भौतिक विस्तार के प्रबंधन, उसकी अगुआई या समन्वय का मुद्दा नहीं है जो इसे बहुत बड़ी व्यापारिक इकाई के रूप में स्थापित करेगा. वास्तविक चिंता तो टाटा की कामयाबी, उसकी साख, ब्रांड और कंपनी के मूल्यों को बरकरार रखने की है.

भरोसा, ईमानदारी, समुदाय को लेकर प्रतिबद्धता, ये वो चीजें हैं जिन्हें टाटा समूह ने आत्मसात किया है. इनकी वजह से टाटा को भारत के कारोबारी जगत और लोगों के बीच बेहद प्यार और इज़्ज़त मिली है.

लेकिन क्या अतंरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की कठोर दुनिया में ये मूल्य बचे रह सकते हैं? क्या टाटा को अपनी जगह बरकरार रखने के लिए अपने मूल्यों के साथ कोई समझौता करना होगा? क्या दूसरी संस्कृतियां और समाज इन मूल्यों को समझ भी पाएंगे? क्या टाटा को यहाँ भी समझौता करना पड़ेगा? प्रबंधन के शीर्ष पदों पर ग़ैर भारतीयों के आने से कहीं भविष्य में इन मूल्यों का पतन तो नहीं होगा?

सायरस मिस्त्री को बेहद नाज़ुक तरीके से संतुलन साधना होगा. रतन टाटा ने जो साख और मूल्य उनके लिए विरासत में छोड़े हैं, उसे बरकरार रखना होगा. इसके साथ ही उन मूल्यों को एक जुबां देनी होगी ताकि बाकी दुनिया उन्हें समझ सके. सायरस मिस्त्री के सामने चुनौतियां ठीक वैसी ही हैं, जैसी रतन टाटा ने जिम्मेदारी संभालने के समय महसूस की होगी.

भविष्य चाहे जैसा भी हो लेकिन यह तय है कि रतन टाटा जैसा कद हासिल करने के लिए सायरस मिस्त्री की राह चुनौतीपूर्ण है.

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