क्या ज़रूरी था बलात्कार पीड़िता का सिंगापुर जाना?

सिंगापुर अस्पताल
Image caption सिंगापुर के अस्पताल में बलात्कार पीड़िता को भर्ती कराने भारतीय दल गया था.

दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार की शिकार 23 वर्षीया लड़की की सिंगापुर में हुई मौत के बाद फिर सवाल उठ रहे हैं कि क्या उसे भारत से बाहर ले जाना जरूरी था.

कुछ विश्लेषकों की राय है कि लड़की को भारत से बाहर ले जाने के पीछे राजनीतिक ज्यादा और इलाज संबंधी कारण कम हैं.

बीबीसी हिंदी ने इसी बात की तह तक पहुँचने के लिए बात की भारत के दो नामचीन गैस्ट्रो इंटेस्टाइनल सर्जनों से और जानी उनकी राय.

डॉक्टर समीरन नंदी, भारत में आँतों की सर्जरी के जनक कहे जाने वाले और गंगाराम अस्पताल के प्रमुख सर्जन

मुझे इस फ़ैसले पर हैरानी है. मेरे हिसाब से पीड़िता को हवाई सफ़र कराके सिंगापुर ले जाने संबंधी सभी खतरों को परख लिया जाना चाहिए था.

मुख्य मुद्दा ये है कि इस लड़की की आँतों का ट्रांसप्लांट अभी कई महीनों दूर है.

अभी चिंता यही है कि लड़की की हालत में सुधार आए, उसकी तबियत स्थिर रखी जा सके.

मेरे तजुर्बे और भारत में मौजूद मेडिकल सुविधाओं को देखते हुए हम ज्यादा बेहतर देख-रेख कर सकते थे.

लेकिन मुझे लगता है कि सरकार भविष्य को लेकर चिंतित थी.

मेरी जानकारी के मुताबिक़ माउंट एलिज़ाबेथ अस्पताल में आँतों का अभी तक एक भी ट्रांसप्लांट नहीं हुआ है.

जबकि हमने यहाँ पर अभी तक दो, असफल ही सही, लेकिन ट्रांसप्लांट किए हैं और मरीज़ कई दिनों तक ज़िंदा भी रहे हैं.

दुनिया में सबसे बेहतरीन ट्रांसप्लांट सेंटर वैसे भी पिट्सबर्ग और टोरंटो में हैं.

लेकिन अभी तो आँतों के ट्रांसप्लांट का सवाल ही नहीं उठता. अभी तो लड़की की जान बचानी आवश्यक है और उसके महीनों बाद ही ये शायद मुमकिन हो सकता है.

डॉक्टर पवन कुमार, मुंबई के ब्रीच कैंडी और कंबाला हिल अस्पताल से जुड़े हैं और नामचीन गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल सर्जन हैं

लड़की के शरीर के ज्यादातर अंग काम नहीं कर रहे थे. सिंगापुर में इस समस्या से निपटने के लिए डॉक्टरों की बेहतर टीम थी. लड़की के साथ गए डॉक्टर यदि काबिल हैं तो लड़की को इस अवस्था में भी हवाई एम्बुलेंस से सिंगापुर तक ले जाना ठीक लगता है.

छोटी आँत के प्रतिरोपण के बारे में मेडिकल जगत में बहुत कम जानकारी है. यदि किसी हॉस्पिटल में इस तरह के कम से कम 10 प्रतिरोपण सफलतापूर्वक किए गए हों, तभी कोई हॉस्पिटल ऐसे मामलों में मरीज को भर्ती कर सकता है. इस तरह के मामलों में यह न्यूनतम शर्त है.

आम तौर पर प्रतिरोपण के मामले में सिंगापुर के इस अस्पताल का अच्छा रिकॉर्ड रहा है. वहां अच्छे डॉक्टर हैं और जिस भी तरह के प्रतिरोपण हुए हैं, उनमें से ज्यादातर मामलों में मरीज की जान बचाई जा सकी है.

शायद यही वजह रही होगी कि लड़की को इतनी गंभीर हालत में भी इस तरह भारत से सिंगापुर ले जाया गया.

इस मामले में ये देखना आवश्यक है कि इस तरह के प्रतिरोपण, जहां कभी भी किए गए, वहां कितने मरीज जीवित बच पाए. इसी आधार पर हॉस्पिटल का चयन किया जाना चाहिए था और संभव था कि इसी बुनियाद पर सिंगापुर को चुना गया.

आंत के प्रतिरोपण में किसी मरीज के बचने की संभावना इस बात पर निर्भर करती थी कि उसे संक्रमण से बचाने में कामयाबी मिली या नहीं, उसका आहार कैसा था और उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कैसी थी.

बीबीसी हिंदी ने जब माउंट एलिज़ाबेथ अस्पताल से आंतों के प्रतिरोपण संबंधी जानकारी हासिल करने के लिए सम्पर्क किया था, तब उनके जनसम्पर्क विभाग से जबाव मिला कि प्रतिरोपण मामलों पर जानकारी के लिए उनकी वेबसाइट पर जाएं.

हालांकि अस्पताल की वेबसाइट पर जिस भी तरह के प्रतिरोपण प्रक्रियाओं की जानकारी है, उनमें आंतों के प्रतिरोपण का जिक्र नहीं था.

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