अख़बारों में छाई युवती की मौत

अखबार

दिल्ली की सामूहिक बलात्कार की शिकार 23वर्षीय युवती के सिंगापुर में निधन की ख़बर भारतीय और अंतरराष्ट्रीय अख़बारों में छाई हुई है.

भारत से छपने वाले अख़बारों की बात करें तो दैनिक जागरण की हेडलाईन है, “देश को जगाकर सो गई वह”, हिंदुस्तान टाइम्स के पहले पन्ने पर युवती को श्रद्धांजलि छपी है जिसका शीर्षक है, “शी लिट ए फ्लेम” यानी ‘वो एक लौ जला गई.’

इसी विषय पर संडे नवभारत टाइम्स का संपादकीय लिखता है, “इस तरह जब किसी लड़की की मौत होती है, तो सिर्फ़ एक लड़की ही नहीं मरती.हमारे-आपके घरों में रहने वाली हर लड़की के भीतर एक हिस्सा मरता है.” अंत में लिखा है, “स्त्री के सम्मान के लिए तो समाज को ही बदलना होगा.”

अंग्रेज़ी भाषा का द हिंदू की हेडलाइन है, “एक युवती की मौत, एक देश में मातम”. अपने संपादकीय में अख़बार लिखता है, "बलात्कार और यौन उत्पीड़न से निपटने के लिए क़ानून तो हैं लेकिन उन्हें अमल में लाने के लिए पुलिस, न्यायपालिका और नेता नहीं हैं. और महिलाओं के अधिकारों दिलाने के लिए आम आदमी को इसी नेतृत्वविहीन शून्य में कदम रखना होगा."

अंतरराष्ट्रीय मीडिया

न्यूयॉर्क टाइम्स के जिम यार्डले के विश्लेषण के मुताबिक, अक्सर लगता है कि भारत में एक के बाद एक संकट या घोटाले होते हैं जिनके विरोध में लोग सड़कों पर उतर आते हैं. लेकिन जब हर बार की तरह मामला ठंडा पड़ जाता है, तब सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ जाता है, लगता है कुछ नहीं बदला. लोगों का ग़ुस्सा ज़्यादातर ठंडा पड़ जाता है.

लेकिन शनिवार तड़के बलात्कार और हिंसा की शिकार युवती की मौत से संकट का एक नया और विस्फोटक पल पैदा हुआ है जो लोगों को अंदर तक छुआ है. भारतीय समाज में यौन हिंसा के खिलाफ़ एक सप्ताह पहले शुरु हुए विरोध प्रर्दशनों ने अब एक बहरी और नाकाबिल सरकार की निंदा की शक्ल ले ली है.

विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस की नेतृत्व वाली भारत की गठबंधन सरकार के पास शुरु ही में प्रर्दशनों का साथ देकर और आश्वासन से लोगों के ग़ुस्से को शांत करने का मौका था. लेकिन वरिष्ठ नेतृत्व ठीक से परख नहीं पाया कि लोगों का, और ख़ासकर युवाओं का ग़ुस्सा इतनी जल्दी भड़क जाएगा और सरकार ने ये मौका गंवा दिया. ये, लोगों का भरोसा जीत पाने में नाकाम सरकार और सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले शहरी युवावर्ग के बीच पीढ़ियों का अंतर दिखाता है.

ब्रिटेन के अख़बार द गार्डियन में जेसन बुर्क इस घटना के लिए तीन कारण बताए हैं.

वे लिखते हैं, दिल्ली का जघन्य गैंगरेप, भारत का मशहूर इंफोटेक उद्योग और इसकी बढ़ती समृद्धि, ये सब इस विशाल और पेचीदा देश में आ रहे बदलाव की कहानी के हिस्से हैं

एक तरफ़ संकीर्ण पितृसत्तात्मक ग्रामीण समाज है और दूसरी तरफ़ शहर जहां सदियों पुराने नियम-कायदे तेज़ी से बदल रहे हैं. शहरीकरण इन दोंनो समाजों को एक साथ ले आया है.

वहीं आज भी भारतीय समाज महिलाओं को सिर्फ़ मां, बेटी या पत्नी की भूमिका में ही देखा जाता है. भारतीय मीडिया ने भी गैंगरेप की शिकार युवती को लगातार देश की “बेटी” के नाम से संबोधित किया.

तीसरा कारण है भारत के ज़्यादातर हिस्सों में व्याप्त हिंसा. और ज़्यादातर हिंसा की वजह बदलाव से पैदा होने वाला तनाव है.

इस घटना का पूरा विवरण देते हुए ब्रिटेन का ही एक और अख़बार टेलीग्राफ़ लिखता है, “आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली भारत की ‘रेप कैपिटल’ या बलात्कार राजधानी है जहां वर्ष 2010 में 414 और इस वर्ष 600 से ज़्यादा बलात्कार की घटनाएं हुईं. दर्ज किए गए हर तीन मामलों में से सिर्फ़ एक मामले में सज़ा होती है लेकिन कार्यकर्ता मानते हैं कि लोगों में पुलिस का इतना डर है कि हर पचास में से सिर्फ़ एक ही बलात्कार मामला दर्ज होता है.”

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