क्या दोष परवरिश का है?

 बुधवार, 2 जनवरी, 2013 को 20:13 IST तक के समाचार
बलात्कार पर विरोध

देश भर में इस घटना पर तीखा विरोध हो रहा है

दिल्ली में कुछ हफ़्तों पहले बर्बर बलात्कार का शिकार हुई लड़की की बहादुरी को लेकर सोशल मीडिया में काफ़ी ज़बरदस्त प्रतिक्रिया हुई.

लोगों ने कई भावुक पोस्ट लिखे हैं. उस घटना ने पूरे देश ही नहीं बल्कि दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है. जो लोग नियमित तौर पर ब्लॉग नहीं लिखते हैं उन्होंने भी फ़ेसबुक पर आक्रोश ज़ाहिर किया. एक ऐसी ही ब्लॉगर हैं विदिशा कौशल, जो कि एक युवा माँ हैं. विदिशा मानती हैं कि समस्या बच्चों के पालन-पोषण के भारतीय तरीक़े में है. ये है उनकी राय-

शुक्रिया ओ जाँबाज़ लड़की, इस दुनिया में आने और इस देश के साथ ही दुनिया के कई हिस्सों को झकझोरने के लिए. हम ऐसी दुनिया में रहते हैं जहां हर चीज को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जाता है और हमारी संवेदनाएं लगातार सुन्न हो रही हैं.

हमारे हर ओर चीज़ें इतने अतिरेक में इस क़दर ज़्यादती में हो रही हैं कि हम पर अपने आस-पास की सुंदरता और दर्द का असर होना बंद होता जा रहा है. और ये असंवेदनशीलता रोजबरोज़ बढ़ती जा रही है.

इस वक्त बाहरी स्तर पर बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है- न्यायापालिका, पुलिस, सरकारी नीतियां.. सब जगह बड़े बदलावों की जरूरत है. हालांकि मेरे लिए बड़ा बदलाव, असल बदलाव आंतरिक स्तर पर होना चाहिए.

वो बदलाव होना चाहिए मेरे दिमाग मे, हर भारतीय के दिमाग में. ये दुख की बात है कि एक भारतीय लड़के के दिमाग को कभी किसी लड़के के दिमाग के बराबर ही नहीं समझा जाता.

असमानता के बीज

दरअसल हमारे समाज में लड़के को लेकर कभी किसी के दिमाग में सुरक्षा के जुड़े उपाय नहीं आते और न ही किसी को उसकी शादी की चिंता होती है. उसके लिए दहेज की भी कोई परवाह नहीं होती और न ही इस बात फ्रिक की जाती है कि वो एक लड़के को जन्म दे पाएगा या नहीं. उसे तो हमेशा ऐसा सस्ता निवेश माना जाता है जो हमेशा ऊंचा मुनाफा देता है.

दुर्भाग्य से यही वो सच है जिसकी वजह से हर भारतीय माता-पिता बेटे की इच्छा करता है.

लड़के और लड़की में भेदभाव को आप छोटी-छोटी बातों में भी महसूस कर सकते हैं. इसकी शुरुआत तभी हो जाती है जब छोटे-छोटे लड़कों की माँएं उन्हें खेल के मैदान में पेड़ों की जड़ों में पेशाब करने देती हैं जबकि लड़कियों को बाकायदा शौचालयों में ले जाया जाता है.

इसकी शुरुआत तभी हो जाती है जब हम लड़कों को बचपन में जानवर कह बुलाते हैं और लड़कियों को कोमल गुड़िया. हमारे दिमाग में ये भेदभाव तभी से आकार लेने लगता है.

लड़के को हम छोटा ही सही लेकिन जानवर मान लेते हैं और कई बार ये समझने लगते हैं कि उसे सुधारना मुश्किल है. वहीं लड़कियों को बचपन से ये सिखाया जाता है कि उन्हें कैसे बैठना है, कैसे खड़ा होना है और कैसे चलना है. उन्हें ऊंची आवाज में बात न करने को कहा जाता है, साफ सुथरा रहने की सीख दी जाती है और बाकी बहन भाइयों का ख्याल रखने की हिदायत दी जाती है. लड़कों को इनमें से कुछ नहीं सिखाया जाता है.

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पढ़े लिखे पश्चिमी अंदाज में जीने वाले लोग कहते हैं, "बॉयज विल बी बॉयज (लड़के तो लड़के ही रहते हैं)", तो पारंपरिक परिवेश में लोगों को अकसर ये कहते सुना जाता है, “क्या करें, लड़के होते ही ऐसे हैं.”

परवरिश

लड़कियों की परवरिश हम इस तरह करते हैं कि वो लड़कों की बराबर नहीं कर सकती है. बात चाहे निम्नवर्गीय परिवारों की हो या फिर उच्चवर्गीय परिवारों की, सोच कमोबेश एक जैसी ही है. सभी जगह लड़कियों को खास तरह के कपड़े पहनने को कहा जाता है, चलने, उठने, बैठने और यहां तक कहीं-कहीं तो जोर से न हंसने तक की हिदायतें भी दी जाती हैं.

मेरा संबंध बेहद प्रगतिशील परिवार से रहा है, लेकिन मेरी कोई ऐसी सहेली नहीं है जिसका छेड़छाड़ या फब्तियों से सामना न हुआ हो. फिर भी मुझे ये सोच कर धक्का लगता है कि न तो हममें से किसी ने आत्मरक्षा सीखने की कोशिश की और न ही अपने बच्चों का उनमें नाम लिखाया.

वो समय कब आएगा जब हम अपनी बेटियों की प्रतिभा को प्रोत्साहन देंगे और अपने लड़कों को आम इंसानों की तरह रोने देंगे. अपने बेटों से हम कब ये कहना छोड़ेंगे, “क्या लड़कियों की तरह रो रहे हो?”

समय आ गया है कि हम अपने लड़कों को एक सामान्य इंसान की तरह व्यवहार करने दें. समय आ गया है जब सिर्फ लड़कियों के लिए ही नहीं, लड़कों के लिए भी नियम बनाए जाएं. हमें अपने बेटों और बेटियों को सिखाना होगा कि उन्हें आत्मनिर्भर बनना है.

मतलब हमारे बेटों को पता होना चाहिए कि खाना कैसे बनाते हैं या साफ सफाई कैसे करते हैं. दूसरी तरफ बेटियों की सिखाना होगा कि पैसे को कैसे कमाना है और कैसे संभालना है. उन्हें बाहरी दुनिया को समझने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाना होगा.

हमें बच्चों के साथ माता पिता और समाज के तौर पर संपर्क कायम करना होगा. जब कोई बच्चा या युवा गलत रास्ते पर कदम बढ़ाता है तो उसे अपने माता पिता और समाज पर भरोसा करना होगा कि वे उन्हें सुरक्षा देगें और अपराधियों को सजा देंगे.

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मुझे अच्छी तरह याद है कि जब हम स्कूल से लौटते थे तो एक व्यक्ति हमें अपना गुप्तांग दिखाता था. मुझे पता है कि सभी बच्चे इस बात को लेकर कितना डरते थे और इससे कितनी नफरत करते थे. मुझे ज्यादा दिन तक इस स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा क्योंकि मैं जल्द ही कॉलेज जाने लगी.

लेकिन मैं अब सोचती हूं कि इस व्यक्ति ने कितने सालों और महीनों तक बेशुमार बच्चों को इस तरह प्रताड़ित किया होगा. लेकिन हममें से किसी ने कभी अपने घर पर ये बात नहीं बताई. उस इंसान को इसके लिए उम्रकैद होनी चाहिए थी. लेकिन कभी किसी ने इस बारे में आगे बात ही नहीं की. शायद हम भारतीय बच्चे कभी अपने घरों में ऐसी बातें कर ही नहीं पाते हैं.

लेकिन मैं अब चाहूंगी कि मेरे बच्चे इस तरह की बातें मुझे बताएं. मैं तो पूरी कोशिश करूंगी कि ऐसे लोगों को उनकी सही जगह यानी सलाखों के पीछे पहुंचाया जाए. मैं चाहूंगी कि मेरी छोटी सी बेटी समानता, भरोसा, सुरक्षा और प्यार का सिर्फ नाम न सुने बल्कि इन मूल्यों के साथ जिए.

हमारी अंदरूनी दुनिया में ऐसा बहुत कुछ है जिसे हमें दुरुस्त करना है. दामिनी/निर्भया/अमानत तुमने हमें एक आइना दिखाया है.

धन्यवाद उन बहादुर लोगों का जिन्हें सड़कों पर उतर कर हमें अपनी वास्तविकताओं का सामना करने का रास्ता दिखाया है. मैं वादा करती हूं कि अपनी अंदरूनी दुनिया को दुरुस्त करूंगी. यही मेरी तरफ से उसे श्रृद्धांजलि है.

आप जब बड़े हो रहे थे तो क्या आपने भी ये महसूस किया? क्या वास्तव में भारतीय जिस तरह बच्चों का पालन-पोषण करते हैं समस्या उसमें है? या इसकी वजह कुछ और है? आप अपनी राय बीबीसी हिंदी के क्लिक करें फ़ेसबुक पन्ने पर रख सकते हैं-

(विदिशा कौशल चेन्नई में रहती हैं और एक आईटी कंपनी में ट्रेनिंग मैनेजर के तौर पर कार्यरत हैं. वो लोगों को अपने लक्ष्य तलाशने और उन्हें पाने में मदद करती हैं.)

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