क्या रंग लाएगी पदोन्नित में आरक्षण की राजनीति?

  • 3 जनवरी 2013

भारत का उत्तर प्रदेश राज्य देश की राजनीति की प्रयोगशाला कहा जाता है. उत्तर प्रदेश में केंद्रित मंदिर , मंडल और दलित राजनीति ने राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित किया है. अब पदोन्नति में आरक्षण के सवाल पर एक नया सामाजिक ध्रुवीकरण हो रहा है.

विधान सभा मार्ग पर धरना प्रदर्शन कोई नई बात नही है. लेकिन हाल ही में यहाँ बिलकुल अलग किस्म का धरना प्रदर्शन होता रहा.

आम तौर पर विरोध प्रदर्शन का निशाना सरकार होती है. लेकिन इस बार विरोध का निशाना सरकार के बजाय विपक्ष था.

हजारों की संख्या में गैर- दलित राज्य कर्मचारी पदोन्नति में आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक से नाराज होकर लखनऊ में भारतीय जनता पार्टी के दफ्तर के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे.

इन लोगों ने भाजपा के झंडे बैनर तो फाड़े ही, कार्यालय के अंदर ,अंडे ,टमाटर और बैगन भी फेंके.

सरकार का नहीं विपक्ष का विरोध

आंदोलनकारी कर्मचारियों ने विरोधस्वरूप भाजपा की शवयात्राएं भी निकालीं. पहली बार ऐसा हुआ कि कर्मचारियों के विरोध के चलते एक हफ्ते तक भाजपा का दफ्तर नहीं खुल सका.

कर्मचारियों का यह हुजूम मुख्य विपक्षी बहुजन समाज पार्टी के कार्यालय भी गया , लेकिन वहाँ केवल विरोध में नारे लगाए.कांग्रेस दफ्तर गया तो वहाँ सोनिया गांधी की तस्वीरों वाले बैनर फाडकर जलाए.

राज्य कर्मचारियों का यह आंदोलन सर्वजन हिताय संरक्षण समिति के बैनर तले चल रहा है , जिसका दावा है कि वह उत्तर प्रदेश के अठारह लाख सरकारी कर्मचारियों का प्रतिनिधित्व करती है.

समिति की नाराजगी केंद्र सरकार के उस संविधान संशोधन विधेयक से है, जिसके जरिए अनुसूचित जाति एवं जनजाति कर्मचारियों को पदोन्नति में भी आरक्षण देने का प्रस्ताव है.

यह संविधान संशोधन अप्रैल 2012 में राजेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलटने के लिए हो रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मायावती सरकार के सितंबर 2007 के एक नियम को रद्द कर दिया था. इस नियम में दलित वर्ग के अधिकारियों को तेजी से पदोन्नति दिलाने के लिए अतिरिक्त वरिष्ठता की व्यवस्था की गई थी.

इसके जरिए इन वर्गों के सैकडों अधिकारी- कर्मचारी अपने से सीनियर को लांघकर उनके अफसर बन गए.

सुप्रीम कोर्ट ने किया रद्द

Image caption कई लोग आरक्षण का विरोध कर रहे हैं

पिछले विधान सभा चुनाव में यह एक अहम मुद्दा था. समाजवादी पार्टी सरकार ने माया सरकार के कानून को समाप्त करने का वादा किया था, इसलिए उसने सुप्रीम कोर्ट का फैसला तत्काल लागू कर दिया.

मगर केंद्र की कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को उलटने के लिए संविधान संशोधन का फैसला किया. बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही संविधान संशोधन का समर्थन कर रही हैं.

मगर आंदोलनकारी कर्मचारी नेता कांग्रेस और बसपा के बजाय भाजपा से ज्यादा नाराज हैं. जिससे जितनी उम्मीद , उसके खिलाफ उतना ज्यादा गुस्सा.

समाजवादी पार्टी संविधान संशोधन का विरोध कर रही है . इसीलिए उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव सरकार हड़ताली कर्मचारियों पर कोई कार्यवाही करने के बजाय उन्हें प्रोत्साहन दे रही थी.

जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दो दशक में अब तक चार बार पदोन्नति में आरक्षण के खिलाफ फैसला दिया है.

कांग्रेस ने एक बार और भारतीय जनता पार्टी ने तीन बार सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के लिए संविधान में संशोधन किया.

नौकरी में भर्ती में आरक्षण पर देश में आम सहमति है. लेकिन दलित समुदाय का दबाव है कि उन्हें पदोन्नति में भी आरक्षण मिलना चाहिए.

जवाब में कई लोग कहने लगे हैं कि अब किसी स्तर पर कोई आरक्षण नही होना चाहिए.

वहीं दूसरी ओर दलित समुदाय के कर्मचारी भी पदोन्नति में आरक्षण के लिए एकजुट होकर संघर्ष का ऐलान कर चुके हैं.

संविधान संशोधन विधेयक अभी केवल राज्य सभा में पास हुआ है. लोक सभा और राज्य विधान सभाओं से पास होना बाकी है.

इसीलिए पक्ष–विपक्ष दोनों अपने आंदोलन को धार देने की रणनीति बना रहे हैं.

उत्तर प्रदेश हमेशा से भारत की राजनीति की प्रयोगशाला रहा है. मंदिर, मंडल , और फिर दलित राजनीति .तीनों का केन्द्र उत्तर प्रदेश था.

अब लगता है कि पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश में हो रहे सामाजिक ध्रुवीकरण से नई राजनीति जन्म ले रही है, जिसका असर अगले लोक सभा चुनाव पर ज़रुर पडे़गा.

संबंधित समाचार