'कड़े रेप कानून, फ़ायदा कम नुकसान ज़्यादा'

  • 4 जनवरी 2013
फांसी
Image caption गुस्से में भरे लोग और उनसे डरे हुए जन प्रतिनिधि कोई ऐसा कदम ना उठा दें जिसकी वजह से उलटा नुकसान हो जाए.

दिल्ली में घटी सामूहिक बलात्कार की घटना ने लोगों में महिलाओं के खिलाफ घटने वाले यौन अपराधों के प्रति वह जागरूकता पैदा कर दी है जिसको आज तक कोई बड़े से बड़ा अभियान और कानून पैदा नहीं कर पाया.

आज कल कई दिनों से चाहे अखबार खोल लीजिये चाहे चौराहे पर खड़े हो दो मिनट किसी आम आदमी को सुन लीजिये महसूस होता है कि देश में बलात्कार के सिवा कुछ नहीं हो रहा और अब लोग बलात्कार पर फांसी से कम किसी बात पर राजी नहीं होंगे.

अच्छी बात है, लेकिन गुस्से में भरे लोग और उनसे डरे हुए जन प्रतिनिधि कोई ऐसा कदम ना उठा दें जिसकी वजह से आम लोगों का उलटा नुकसान हो जाए.

किशोर को बालिग अपराधी मानने की मांग

दिल्ली सामूहिक बलात्कार कांड में शामिल अभियुक्तों में से एक किशोर को लेकर हर तरफ ये मांग उठ रही है कि उसे एक वयस्क आम अपराधी की तरह सज़ा दी जाए.

पहली बात तो यह है की किशोर अपराधी को वयस्कों से अलग मानने के पीछे एक बड़ी सोच है जिसके अपने सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण हैं.

दूसरी बात फ़र्ज़ करें कानून को बदल दिया जाये ताकी इस किशोर को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जा सके तो यह तो सब मानेंगे कि यह कानून केवल दिल्ली के मामले भर में लागू नहीं होगा. यह पूरे देश में जब यह लागू होगा.

तब इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि बेगूसराय, बस्तर, बलिया, बांदा जैसी उन जगहों पर जहाँ मीडिया की निगाह नहीं जाती और न्याय व्यवस्था बहुत मज़बूत नहीं है वहां इसका खमियाज़ा न जाने कितने बच्चों को भुगतना पड़ेगा.

ऐसे किस्से अनसुने नहीं हैं जब चार-चार साल के मासूम बच्चों को दंगों में अभियुक्त बनाया हो, दस-दस साल के बच्चों को आतंकवादी कह कर कानून का शर्मनाक दुरुपयोग किया गया हो.

मृत्युदंड की मांग

एक महिला होने के नाते मैं भी चाहती हूँ कि यौन अपराध के मामलों पर न्यायपालिका, पुलिस और सरकार ऐसे कदम उठाए कि मेरे जैसी महिला भारत के हर हिस्से में हर वक़्त अपने आप को सुरक्षित मान सके. लेकिन एक वकील होने के नाते मैं समझती हूँ की अगर बलात्कार के मामलों में फांसी की सज़ा तय कर दी गई तो पीड़ितों का कितना बड़ा नुकसान होगा.

आज की तारिख में बलात्कार के मामलों में पीड़ित महिला का बयान और परिस्थिति जन्य सबूत किसी भी आदमी को सज़ा दिलाने के लिए पर्याप्त हैं. अगर पुलिस ने ठीक से पीड़ित महिला का बयान दर्ज किया हो तो अपराधी को सज़ा दिलाना काफी हद तक आसान हो जाता है.

जिस दिन इसमें मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया गया उस दिन से किसी केवल एक महिला के बयान और कुछ परिस्थिति जन्य सबूतों भर के आधार पर कोई न्यायाधीश किसी को फांसी की सज़ा नहीं दे पायेगा.

'रेयरेस्ट ऑफ़ द रेयर' अपराध घोषित कर किसी को फांसी देने के लिए तो चश्मदीद गवाहों की और दस्तावेजी सबूतों की ज़रुरत होगी.

क्या किसी बलात्कार की शिकार महिला से यह उम्मीद की जा सकती है कि वो इस तरह से सबूत जुटा पायेगी या फिर इस तरह के सबूत जुटाने में पुलिस की मदद कर पायेगी ?

पुलिस की भूमिका

दिल्ली के मामले के बाद से आम लोगों में जितना गुस्सा अपराधियों के प्रति है उतना ही गुस्सा पुलिस वालों के लिए भी है. यह बात भी सही है की यह गुस्सा नाजायज़ नहीं है. मेरा खुद का अनुभव है कि पुरुष पुलिसवालों को तो छोड़ दें महिला पुलिसकर्मी भी इस तरह के मामलों में उतना संवेदनशील नहीं होतीं जितना ज़रूरी है.

लेकिन आकंड़े बताते हैं कि पुलिस से अपराधियों के समान ही घृणा करना गलत है. भारत में जितने बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं उनमे से पिछले कुछ सालों में 25 से 27 फ़ीसदी मामलों में सज़ा सुनाई गयी है. जबकि अगर हम क़त्ल के मामलों में सज़ा का प्रतिशत देखें तो यह महज़ पांच से सात फ़ीसदी है.

जिस दिन आप बलात्कार में मृत्युदंड का प्रावधान कर देंगे उसी दिन आप 27 फ़ीसदी मामलों को सात फ़ीसदी मामलों की श्रेणी पर डाल देंगे क्योंकि पुलिस वाले बलात्कार के हर मामले में हत्या के मामले जितने ही ठोस सबूत जुटा पायें यह नामुमकिन है.

क्या है रास्ता ?

मेरी समझ में कड़े कानून बनाना नहीं आसान कानून बनाना ज़रूरी है.

कानून जितना कड़ा होगा उतना ही कठिन हो जाएगा क्योंकि इसमे यह सुनिश्चित करना होगा की न्याय देने की प्रक्रिया में कहीं कोई भूल तो नहीं हुई.

कानून अगर आसान होगा तो पुलिस के लिए मुक़दमा दर्ज करना आसान होगा, सबूत जुटाना आसान होगा. आसान कानून और उसका कड़ा पालन होगा तो इसके मुक़दमे में इतना समय नहीं लगेगा जितने समय में पीड़ित महिला हिम्मत हार बैठे, जो इस तरह के बहुत से मामलों में अक्सर होता है. पुलिस और निचली न्यायपालिका में काम करने वालों को संवेदनशील बनना होगा तभी हल निकलेगा.

समाज के ह्रदय में अटकी यह फांस फांसी से निकलने वाली नहीं है.

(प्राची मिश्रा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट स्तर पर काम करने वाली एक महिला वकील हैं जो महिलाओं से जुड़े मामलों पर लंबे समय से कई स्तरों पर काम कर रही हैं)

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