नाबालिग अभियुक्त को 'नहीं हो सकती फांसी'

बलात्कार का विरोध
Image caption दिल्ली सामूहिक बलात्कार पर उबला देश का गुस्सा

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह इस संभावना से इनकार करती हैं कि दिल्ली सामूहिक बलात्कार के अभियुक्तों में एक नाबालिग को अन्य वयस्क अभियुक्तों के बराबर मानकर कानून के कठघरे में पेश किया जा सकता है.

दिल्ली में एक चलती बस में बर्बर सामूहिक बलात्कार की इस घटना पर देश भर में रोष है. आम लोगों के अलावा पीड़ित के पिता ने भी सभी अभियुक्तों को बराबर दोषी मानते हुए फांसी की सजा देने की मांग की है.

लेकिन इंदिरा जयसिंह का कहना है, “आने वाले दिनों में कानून बदलेगा या नहीं, ये मैं नहीं कह सकती. लेकिन ये बात पक्की है कि आपराधिक कानून में भविष्य में बदलाव करके उसे अतीत की घटनाओं पर लागू नहीं किया जा सकता है.”

वो बताती हैं कि जिस दिन अपराध हुआ है, उस समय मौजूद कानून ही उस मामले पर लागू होता है.

बदलाव कितना जरूरी

नाबालिग अपराधी के लिए कानून में फांसी का सजा का प्रावधान नहीं है, चाहे उस पर हत्या का आरोप हो या बलात्कार का. जयसिंह बताती हैं, “कानून सोचता है कि जिस व्यक्ति की उम्र 18 साल से कम है, उसकी सोच आने वाले समय में बदल भी सकती है. इसलिए ऐसे लोगों को फांसी देना सही नहीं होगा.”

इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि सिर्फ एक मामले के लिए ये कानून नहीं बदलना चाहिए.

दिल्ली में एक चलती बस में 23 वर्षीय छात्रा के साथ 16 दिसंबर को बर्बर बलात्कार किया गया और उसकी बाद में मौत हो गई.

इस मामले पर बेहद दबाव झेल रही सरकार ने इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए जल्द से जल्द इंसाफ का वादा किया है.

लेकिन इंदिरा जयसिंह कहती हैं कि इस मामले में तुरत-फुरत फैसले की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

फास्ट ट्रैक कोर्ट का मतलब

उनके अनुसार कानूनी व्यवस्था में अभियुक्तों के भी कुछ अधिकार होते हैं. उन्हें अपना वकील रखने का अधिकार है. उन्हें पूछताछ करने का अधिकार है. अगर ट्रायल कोर्ट में उन्हें दोषी करार दे दिया गया तो उसके बाद हाई कोर्ट है और फिर सुप्रीम कोर्ट भी है.

वो कहती हैं, “फास्ट ट्रैक कोर्ट का यही मतलब है कि मामले को स्थगित नहीं किया जा सकता है. ये मामला लगातार चलता रहेगा. हो सकता है कि इसमें छह महीने लगें या फिर एक साल लगे. कुछ नहीं कहा जा सकता है.”

अभियुक्तों को फांसी दिए जाने की मांग पर इंदिरा जयसिंह कहती हैं, “बलात्कार के जुर्म में कानून में फांसी की सजा नहीं है. अधिकतम उम्रकैद हो सकती है. लेकिन इस मामले में पीड़ित लड़की की मौत हो गई है. और हत्या के लिए फांसी की सजा का प्रावधान है. अब जो मुकदमा चल रहा है इसमें बलात्कार के साथ-साथ हत्या के भी आरोप हैं.”

वो कहती हैं कि अभियुक्तों को फांसी देने या न देने का फैसला कोई जज कानूनी आधार पर करेगा, प्रदर्शनकारियों की मांग से इसका कोई लेना देना नहीं है.

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