फास्ट ट्रैक अदालतों की हक़ीक़त

 गुरुवार, 10 जनवरी, 2013 को 11:02 IST तक के समाचार
फास्ट ट्रैक कोर्ट

दिल्ली में यौन हिंसा से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए पांच फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित.

दिल्ली में एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद हुए विरोध का एक महत्वपूर्ण नतीजा ये निकला कि राजधानी में पांच फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया गया.

ये अदालतें महिलाओं के खिलाफ होने वाली यौन हिंसा से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई करेंगी.

फास्ट ट्रैक अदालतें भारत में पहले भी शुरू की गईं थी, लेकिन क्या ये कारगर साबित हुईं हैं?

आंकड़ों पर यकीन करें तो जवाब 'हां' में होगा. साल 2001 में केंद्रीय सरकार ने पुराने मामलों के निपटारे के लिए फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया था. तबसे 1,000 से ज्यादा फास्ट ट्रैक अदालतों ने 30 लाख से भी अधिक मामलों का निपटारा किया है.

देश के उच्च न्यायालयों और ज़िला अदालतों में 3 करोड़ से भी ज्यादा मुकदमे लंबित होने के मद्देनज़र कई वकील इसे एक अहम उपलब्धि मानते हैं.

न्यायाधीशों की कमी

न्यायाधीशों की कमी भी परेशानी में इज़ाफ़ा करती है. जजों के खाली पद नहीं भरे जा रहे हैं. देश के उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के 32 फीसदी और निचली अदालतों में 21 फीसदी पद खाली है.

"अगर आप आंकड़ों पर यकीन करते हैं तो इन अदालतों का रिकॉर्ड अच्छा रहा है. लेकिन इन अदालतों ने जो फैसले दिए हैं, उनकी गुणवत्ता के बारे में हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है"

डॉक्टर वी नागराज, नैशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी, बेंगलूर में कानून के प्राध्यापक

कुछ साल पहले दिल्ली हाई कोर्ट के एक जज ने कहा था कि अगर उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की मौजूदा क्षमता यही रही तो लंबित पड़े मामलों के निपटारे में 450 साल से भी ज़्यादा का समय लग जाएगा.

इन्हीं हालात में केंद्रीय सरकार ने लगभग 400 करोड़ की लागत से देश भर में 1700 से भी अधिक फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन की योजना की शुरुआत की.

इस योजना के तहत देश के हर ज़िले में औसतन पांच ऐसी अदालतों का गठन किया जाना था.

इन अदालतों में न्यायाधीश के तौर पर हाई कोर्ट के सेवानिवृत जज और पदोन्नत किए गए न्यायिक अधिकारियों की सेवाएं ली जानी थी.

लेकिन मार्च 2011 में केंद्रीय सरकार ने इस योजना के मद में पैसे का आवंटन बंद कर दिया. अब इन अदालतों को चलाने का खर्च राज्य सरकारों को करना था. नतीजा ये कि कुछ राज्यों ने इन अदालतों को ही बंद कर दिया.

अदालतें कामयाब?

फास्ट ट्रैक कोर्ट

फास्ट ट्रैक अदालतों के नतीजे बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन ने कहा है कि लंबित मामलों में कमी करने के लिहाज़ से ये अदालतें कामयाब रही हैं.

बैंगलोर के नैशनल लॉ स्कूल ऑफ इंडिया यूनिवर्सिटी में कानून के प्राध्यापक डॉक्टर वी नागराज कहते हैं, “अगर आप आंकड़ों पर यकीन करते हैं तो इन अदालतों का रिकॉर्ड अच्छा रहा है. लेकिन इन अदालतों ने जो फैसले दिए हैं, उनकी गुणवत्ता के बारे में हमारे पास कोई प्रमाण नहीं है.”

जल्दबाज़ी में की गई सुनवाई से फ़ैसलों पर असर पड़ सकता है. भारत के विधि आयोग ने इस पर सटीक टिप्पणी दी है, “एक ओर जहां देरी से मिला न्याय अन्याय है तो दूसरी तरफ जल्दबाजी में किया गया इंसाफ उसे दफ्न करने जैसा है”.

ग़लत फ़ैसलों का डर

जाने माने वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता कोलिन गोंज़ाल्विस का मानना है कि फास्ट ट्रैक अदालतों ने इंसाफ करने के मामलों में बहुत संतोषजनक नतीजे नहीं दिए हैं.

गोंजाल्विस कहते हैं, "इन अदालतों को मुकदमे के निपटारे का जो लक्ष्य दिया गया है, वह वास्तविकता से परे है. उन्हें कहा गया है कि वे मुकदमों के तकनीकी पहलुओं को बहुत ज़्यादा तवज्जो न दें. और ज्यादातर मामलों में यह होता है कि अगर जज किसी को दोषी समझते हैं तो उसे मुजरिम करार देते हैं और अगर उन्हें लगता हैं कि अभियुक्त निर्दोष है तो उसे बेगुनाह करार देते हैं ".

"इन अदालतों को मुकदमे के निपटारे का जो लक्ष्य दिया गया है, वह वास्तविकता से परे है. "

कोलिन गोंजाल्विस, जाने माने वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता

वह कहते हैं, "लेकिन इस तरह से आपराधिक न्याय प्रणाली काम नहीं करती. इसमें सावधानी बरतनी होती है. फैसले अनुमान और अंदाजे पर नहीं किए जाते जैसा कि फास्ट ट्रैक अदालतें कर रही हैं. जज सबूतों को नजरअंदाज कर रहे हैं, पूरी जिरह की इजाजत नहीं दी जा रही है और कई मामलों में तो वकीलों की गैरहाजिरी में सुनवाई की जा रही है".

डॉक्टर नागराज की राय भी यही है. वह कहते हैं कि इन अदालतों के कामकाज को लेकर संशय की स्थिति है.

उनकी चिंता इस बात को लेकर ज़्याद है कि फास्ट ट्रैक अदालतों में कई जज सेवानिवृति के बाद काम कर रहे हैं और इनकी नियुक्ति अनुबंध के आधार पर की गई है. ग़लत फ़ैसले के किसी भी मामले के लिए ये उच्च न्यायालयों के प्रति पूरी तरह से जवाबदेह नहीं हैं.

फिर भी जानकारों का मानना है कि न्यायिक प्रक्रिया तेज़ करने के लिए भारत को मुश्किल कदम तो उठाने ही होंगे. साथ ही सभी न्यायालयों में जजों की नियुक्ति भी करनी होगी ताकि प्रति 10 लाख नागरिकों के लिए 50 जजों का लक्ष्य पूरा हो सके.

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