मिलते हैं दिल यहाँ, अपनों से बिछड़ के भी

Image caption महाकुंभ में आई महिला अपने परिवार से बिछड़ गई थी

ऐसी फ़िल्मी कहानियों की कमी नहीं है, जिसमें दिखाया गया है कि दो भाई कुंभ में बिछड़ जाते हैं और जवान होने पर फ़िल्म के आखिर में मिल जाते है.

कुंभ के मेले में मैं एक ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहा था जो पिछले कुंभ में भटक गया हो, लेकिन ऐसा व्यक्ति मुझे मिला नहीं.

कुछ वृद्धाश्रम का रुख किया, इसके अलावा पुलिस से भी पड़ताल की.

कोई जानकारी न मिलने पर मैंने कुंभ के उस शिविर का रुख किया जहाँ लोगों को खोए हुए व्यक्तियों के बारे में जानकारी मुहैया कराई जाती है.

वर्ष 2013 की कुंभ नगरी में दो ऐसे दो शिविर हैं, जिनका काम ही है बिछुड़ों को अपनों से मिलवाना. एक है राजा राम तिवारी का और दूसरा है भूली भटकी महिला बच्चों के लिए रीता बहुगुणा जोशी का.

शिविर

राजा राम तिवारी पिछले पाँच दशकों से कुंभ के दौरान इस शिविर का संचालन कर रहे है. अब वो काफी बुजुर्ग हो चले हैं, इसलिए अब उनके बेटे उमेश चंद्र तिवारी इस शिविर का संचालन करते हैं.

रात में जब मैं इस शिविर में पहुंचा तो देखा कि बिहार से आई एक महिला दहाड़े मार-मार कर गुहार लगा रही थी कि कोई उन्हें उनके बेटे से मिला दे.

Image caption इलाहाबाद में संगम तट पर कुंभ के दौरान खोया-पाया शिविर लगा रहता है

इस महिला का कहना था कि उनका बेटा उन्हें छोड़ कर कहीं गुम हो गया है. वो सिर्फ ये ही रट लगा रही थीं कि पैसे ले लो, लेकिन उन्हें उनके बेटे से मिला दो.

शिविर के संचालक उनसे स्थानीय भाषा में उसका पता और बेटे का नाम पूछने की कोशिश करते रहे कि वो कहाँ से आई हैं और मेले में उनका परिवार कहाँ रुका है.

तीन घंटे हो गए, इस दौरान लाउडस्पीकर पर उनके बारे में घोषणा होती रही. लेकिन कोई नही आया. ठंड काफी थी, इसलिए शिविर के लोगों ने अलाव जला दिया ताकि उन्हें सर्दी न लग जाए.

इस बीच, पुलिस वाला एक और वृद्ध महिला को लेकर शिविर में आ गया. ये महिला भी बिछड़ गई थी. लोग उनसे उनका नाम पता ठिकाना पूछने में लग गए. बार-बार पूछने पर भी वो कुछ नहीं बता पा रही थी.

दरअसल वो मैथली में बोल रही थी और सुन नहीं सकती थी. मेरे सहयोगी सुशील झा ने मैथली को समझ कर उनका नाम-पता नोट करा दिया.

काफ़ी देर तक जब पहली महिला को लेने के लिए कोई नहीं आया तो हमने उनसे वादा किया कि कल आकर इस महिला के बारे में पता करेंगे.

सूचनाएँ

Image caption उमेश चंद्र तिवारी ये शिविर चलाते हैं

अगले दिन जब हम दोबारा शिविर पहुंचे तो शिविर संचालक ने बताया कि देर रात उन दोनों महिलाओं को उनके परिजनों के पास पहुंचा दिया गया है. सुनकर काफी सुकून मिला.

मकर संक्राति के दिन मेले में सुबह से शाम तक लाउडस्पीकर पर किसी के खोने की ही सूचनाएं बजती रहीं.

शिविर के संचालक उमेश चंद्र तिवारी ने बताया कि 13 और 14 जनवरी की रात तक आठ हज़ार 273 लोगों के खोने की सूचनाएं दर्ज की गईं.

अधिकांश लोगों को 15 जनवरी की सुबह तक उनके रिश्तेदारों तक पहुंचा दिया गया लेकिन अब भी 100 से ज्यादा लोग शिविर में अपने परिजनों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं.

अब अगर इन्हें लेने कोई नहीं आता तो इन्हें पैसे देकर घर तक पहुंचाने की व्यवस्था की जाएगी.

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