आस्था ही नहीं धंधा भी है कुंभ

कुंभ
Image caption वैसे कुंभ मेले में भंडारों की कोई कमी नहीं है

पूर्ण कुंभ पूरे एक दशक में एक बार आता है यानि बारह साल में एक बार. अर्ध कुंभ हर छह साल बाद. जब मौका हो, दस्तूर भी हो तो सब इसका फायदा उठाना चाहते हैं.

भक्त चाहते हैं कि उन्हें मोक्ष मिल जाए, इसलिए वो कड़कड़ाती ठंड में भी बिना किसी चीज़ की परवाह किए डुबकी लगाने खिंचे चले आते हैं.

लेकिन कुंभ सिर्फ आस्था का नाम ही नही है, बल्कि एक व्यवसाय का नाम भी है. कुंभ के मौके को भुनाने वालों की कोई कमी नही है. बस मौका खोजने की देर भर है.

छात्रों के कमरे

Image caption संतोष कुमार कहते हैं कि कुंभ की वजह से उन जैसे छात्रों को बड़ी दिक्कत हो रही है

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पूरे भारत से छात्र-छात्राएं पढ़ने के लिए आते है.

जो लड़के किराए का कमरा लेकर पढ़ाई करते हैं, उन्हें इस महाकुंभ का कोप सहना पड़ रहा है.

संगम से सटा एक इलाका है दारा गंज. यहाँ भी ऐसे लड़कों की कोई कमी नही जो किराए पर रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं.

पर कुंभ कुछ छात्रों के लिए आफत भी लेकर आया है.

अब तक आठ-नौ सौ रुपए महीना किराया दे रहे छात्रों को मजबूर किया जा रहा है कि वो या तो 1800 रुपए महीना किराया दें या फिर कमरा खाली कर दें.

जौनपुर जिले के रहने वाले संतोष तिवारी दारा गंज में रहते हैं और संघ लोक सेवा की तैयारी कर रहे है.

संतोष कहते हैं, ''कुंभ के चलते मकान मालिकों का लालच जाग गया है. वो ज्यादा पैसे के लिए कमरा छीनकर संगम आने वाले लोगों को किराए पर देकर कमाई करना चाहते है. उन्होंने यहाँ के कमरों को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बना लिया है.''

दिलीप सिंह कौशांबी के रहने वाले हैं. वह बताते हैं कि इस कुंभ की वजह से उन्हें लगातार हर पंद्गह दिन में कमरा बदलना पड़ रहा है.

इन छात्रों का कहना है कि मकान मालिक किराया बढ़ाने के लिए छात्रों को न सिर्फ धमकी दे रहे है, बल्कि प्रताड़ित भी कर रहे है.

पर पूरे इलाहाबाद में ऐसी स्थिति नही है, ऐसे हालात सिर्फ उन जगहों पर हैं, जो संगम के आसपास हैं.

होटल और टेंट

कुंभ के चलते पूरे इलाहाबाद के सारे होटल बुक हो चुके है. विशेषरुप से मकर संक्राति और मौनी अमावस्या जैसे महत्वपूर्ण स्नान के दिनों में.

आम दिनों में खाली रहने वाले होटल पूरी तरह से भरे हुए है.

वो होटल जिनका किराया आम दिनों में दो-ढाई हज़ार रूपये हुआ करता था, अब वही पांच हजार तक वसूल रहे हैं.

अच्छे होटलों का किराया पहले के मुकाबले दोगुना हो गया है.

इसी तरह कुंभ नगरी में लोगों के रहने के लिए बनाए गए अस्थाई टेंट यानी तंबुओं का न्यूनतम किराया छह हजार रुपए प्रति रात है.

उत्तर प्रदेश पर्यटन इसके लिए छह हजार रुपए प्रति व्यक्ति वसूल रहा है, जबकि निजी कंपनियों के शिविर में रहने के लिए नौ हज़ार रुपए देने होगें.

यहाँ तक कि कुछ लोग सिर्फ कुंभ के लिए ही दुकानें किराए पर दे रहे हैं. जाहिर सी बात है कि इसका किराया भी सामान्य दुकानों से कहीं ज्यादा है.

फल व सब्जियाँ

मेला परिसर के पास के इलाकों में दैनिक रोजमर्रा की चीज़ें भी महंगी हो गई है. दो रुपए में बिकने वाला सामान चार रुपए में बिक रहा है.

सब्जियों के दाम शहर के दूसरे कोने पर अगर दस रुपए है तो प्रयाग नगरी के आसपास बारह रुपए हो जाता है.

मेला देखने और स्नान करने आने वालों की मजबूरी है कि उन्हें ज्यादा पैसे तो चुकाने ही होंगे.

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रोफेसर अनीता गोपेश कहती हैं कि इलाहाबाद इस तरह के बड़े आयोजनों के लिए तैयार नहीं रहता है क्योंकि आमतौर पर यहां छोटे ही आयोजन होते हैं, इतना बड़ा आयोजन नहीं होता, इसलिए होटल वाले मनमानी करके किराया वसूलते हैं जबकि एक नीति के तहत इसमें एकरूपता होने की जरूरत है.

पते की बात ये है कि अगर कुंभ आएं तो खर्चने के लिए रुपयों की झोली जरूर भरकर लाएं.

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