'कमीशन की गद्दी’ से बिकती हैं बनारसी साड़ियाँ

 सोमवार, 21 जनवरी, 2013 को 08:01 IST तक के समाचार

बनारस की साड़ियाँ देश-विदेश में काफी मशहूर हैं

‘बनारस की गद्दी’ कोई शाही गद्दी नहीं है बल्कि ये उस जगह का नाम है जहाँ बनारसी साड़ी सबसे पहले बिकने के लिए आती है.

बनारस में साड़ियों का बड़ा बाज़ार है चौक. इसी चौक में हजारों का तादाद में ‘गद्दियाँ’ हैं और इन पर बैठने वाले ‘गद्दीदार’. बनारसी साड़ी को बनाने वाले हैं आस-पास के गाँवों में रहने वाले जुलाहे.

ये बुनकर अधिकतर मुसलमान हैं और इनके परिवार का दाना-पानी हाथ की कारीगरी से ही चलता है.

लेकिन साड़ी को कलाकारों के हाथों से निकल कर बाज़ार और ग्राहक तक पहुंचने के लिए कई हाथों से गुजरना पड़ता है.

बुनकर अपना माल लेकर इन इन गद्दीदारों के पास आते हैं. अगर गद्दीदार के पास उस समय कोई ग्राहक है और उसे साड़ी पसंद आ जाती है तो गद्दीदार अपना कमीशन ले कर उसे तुरंत बिकवा देता है.

गद्दीदार कमीशन पर ही काम करते हैं. बुनकर या फिर छोटे गद्दीदारों से मोल तोल करके ही माल की कीमत तय करते हैं. ये कमीशन पाँच से लेकर छह प्रतिशत तक हो सकता है.

गद्दीदार ये कमीशन बुनकर की लागत से नहीं काटते बल्कि ग्राहक की खरीद से काटते हैं.किस साड़ी को बनने में कितना समय लगा, उसमें जरी का काम कितना है और उसमें किस तरहे के धागे का इस्तेमाल हुआ ये ही उस साड़ी की गुणवत्ता और कीमत को तय करता है.

कमीशन खाते हैं

"अगर गद्दी वाले हट जाएंगे तो कलाकार अपना माल बेचेगा कहाँ, सीधा ग्राहक अगर एक बार माल ले कर चला भी गया तो कलाकार सिर्फ उसके इंतज़ार में बैठेगा तो है नहीं. अगर बैठ गया तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी"

गफ्फार, बुनकर

गद्दीदार अधिकतर कच्चा माल ही खरीदते हैं और माल बिक जाने के बाद ही उसे अंतिम रुप देते हैं.अंतिम रुप का मतलब साड़ी में धागों की कटाई और फिर पॉलिश.

गद्दी और रिटेल शोरुम में अंतर यही है कि शोरुम में वो साड़ी मिलती है जिसकी फिनिशिंग हो चुकी होती है और अगर गद्दी से साड़ी लेनी है तो उसे दो दिन का समय चाहिए.

गद्दीदार और बुनकर के बीच की एक कड़ी छोटे गद्दीदारों की है. ये बुनकरों से उनका माल खरीद कर स्टॉक कर लेते हैं.और जब बड़े गद्दीदारों को माल की जरुरत होती है तो उन्हें बेच देते हैं.

संजय बूबना छोटे गद्दीदार हैं. वो बताते हैं कि दरअसल कारीगर उनके पास दो-चार साड़ी लेकर आते हैं तो उन्हें तुरंत पैसे की जरुरत होती है और उन्हें तुरंत पैसा उनके जैसे स्टॉकिस्ट ही दे सकते हैं. लेकिन ऐसा करने के बाद उनका पैसा जरुर फँस जाता है.

गद्दीदारों के ग्राहक होते हैं बड़े –बड़े शोरुम वाले व्यवसायी या फिर थोक में साड़ी खरीदने वाले व्यापारी.

बड़े गद्दीदार माल खरीदने में अपना पैसा नहीं फसाते हैं और जिन लोगों से वो माल खरीदते हैं उसका भुगतान तीन महीने के बाद ही करते हैं.

गद्दीदार राम जी यादव कहते हैं, “कुछ लोग ऐसा कर तो रहे हैं, कमीशन बचाने के लिए, लेकिन उन्हें नहीं मालूम कि बाद में ये सौदा महँगा पड़ जाता है. क्योंकि माल की जितनी समझ उन्हें होती है, उतनी खरीददार को नहीं होती.पहली बार तो उन्हें फायदा होता है , पर उसके बाद नहीं.”

'गद्दीदार न हों तो भूखे मरेंगे'

गद्दीदार राम जी यादव

बुनकर अपना माल लेकर राम जी यादव जैसे गद्दीदारों के पास आते हैं

बनारस के पास के एक गाँव कोटवा के बुनकर अब्दुल गफ्फार कहते हैं कि चौक में बहुत से गद्दी वाले हैं, जहाँ भी उन्हें सही दाम मिलता है, उसी को वो साड़ी बेच देते हैं.

ये पूछे जाने पर कि अगर बिचौलिए न हो , कमीशन न हो तो आपको ज्यादा फायदा नहीं होगा. इस सवाल के जवाब में गफ्फार कहते हैं, “अगर गद्दी वाले हट जाएंगे तो कलाकार अपना माल बेचेगा कहाँ, सीधा ग्राहक अगर एक बार माल ले कर चला भी गया तो कलाकार सिर्फ उसके इंतज़ार में बैठेगा तो है नहीं. अगर बैठ गया तो भूखे मरने की नौबत आ जाएगी.”

गफ्फार ये भी कहते हैं कि उस समय गद्दीदार उन्हें संभालते भी हैं जब साड़ी नहीं बिकती, चूंकि वो उन्हें कीमत दे चुके होते हैं, इसलिए बुनकरों का काम चलता रहता है.

बनारसी साड़ी पर अब तक गद्दी का ही बोलबाला रहा है, लेकिन अब चीज़े बदल रही है.कुछ व्यावसायी सीधे कारीगरों से माल उठाने लगे हैं, इससे बिचौलियों की भूमिका कम हो गई है.

इस मामले में पहले कलाकार अपनी डिज़ाइनों को लेकर गद्दी के चक्कर लगाया करते थे. लेकिन व्यावसायियों की ये चाहत कि कहीं उनकी डिजाइन की नकल न हो जाए वो उनके घरों से सीधे माल उठा लेते हैं. पर ऐसी स्थितियाँ आम नहीं है.

आम बुनकर के पास अपना माल बेचने के लिए गद्दीदारों के अलावा कोई विकल्प नहीं है. क्योंकि उसे सीधे ग्राहक तो मिलेंगे नहीं और वो बिना कमीशन के गद्दीदारों को माल बेच नही सकता.

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