शवों की राख से सोना पाने की चाह

Image caption बनारस के मणिकर्णिका घाट की एक तस्वीर जिसमें एक व्यक्ति राख में सोना तलाश रहे हैं.

बनारस की तीन चीज़ें पूरे संसार में प्रसिद्ध है. काशी विश्वनाथ मंदिर, बनारसी साड़ी और मणिकर्णिका घाट

गंगा के तट पर मणिकर्णिका घाट भारत का एक मात्र ऐसा घाट है जहाँ दिन रात यानि 24 घंटे शवों का दाह संस्कार किया जाता है.

हिंदू रीति रिवाजों के मुताबिक सिर्फ दिन में ही दाह संस्कार किया जाता है.

इस मामले में मणिकर्णिका घाट अलग है क्योंकि यहाँ न सिर्फ दिन में बल्कि रात में भी शव जलाए जाते हैं.

सिर्फ बनारस और आस पास के ही नही बल्कि के दूर दराज के इलाकों के भी लोग इसी घाट से अपने प्रियजनों को अंतिम विदाई देते हैं.

यही नही विदेशी भारतीय भी अंतिम क्रिया के लिए इसी घाट का रुख करते है.

महाश्मशान घाट है मणिकर्णिका

हिंदू मिथकों का हवाला देते हुए पंडित त्रिभुवन नाथ पांडेय कहते हैं, "मणिकर्णिका घाट को महाश्मशान कहा जाता है क्योंकि भगवान शंकर की पत्नी पार्वती की मणि यहाँ गिरी थी, यहाँ दाह संस्कार करने से सीधे व्यक्ति को मोक्ष की प्रप्ति होती है, इसीलिए यहाँ 24 घंटे शव दाह होता है."

लेकिन जितनी प्रसिद्धि इस घाट की है उतनी ही बदहाली भी इस घाट की है.

मुख्य सड़क से घाट तक की दूरी लगभग चार सौ मीटर होगी, पर पहुंचने का रास्ता बेहद सँकरा, मुश्किल से पाँच फीट के आस पास.

व्यावसायी पप्पू जी कहते हैं, "मणिकर्णिका घाट तक पहुंचने का रास्ता इतना सँकरा है कि शव को ले जाते समय उसके बि़जली के तारों से उलझने का खतरा लगातार बना रहता है."

घाट के नाम पर यहाँ पर बेहद कम जगह है. शव खुले में जलते रहते हैं.

जिस तरह दिल्ली के निगम बोध घाट पर बाकायदा दाह संस्कार के लिए प्लेटफार्म बने हैं और व्यवस्थाएं दुरुस्त हैं, लेकिन मणिकर्णिका घाट पर सब कुछ आपाधापी में होता है खुले आसमान के नीचे शव जलते रहते हैं.

यहाँ शवों को भी अपनी बारी का इंतज़ार करना पड़ता है. दिन में करीब ढाई-तीन सौ शव आते हैं और जितने शव जल रहे होते हैं, उससे ज्यादा शव दाह संस्कार की कतार में रहते है.

मणिकर्णिका घाट के आस-पास जो लकड़ी की दुकाने हैं, उनका यहाँ पर राज चलता है. आने वालों की मजबूरी है कि उनके पास यहीं से लकड़ी खरीदने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नही होता.

जिस जगह दाह संस्कार होता है, वहीं पर शवों से उतारे गए कपड़ों, कफ़न का ढेर लगा रहता है.

लेकिन घाट है बदहाल

पत्रकार केके शर्मा कहते हैं कि मणिकर्णिका घाट की दुर्दशा के पीछे कई कारण हैं. पहले ये घाट सिंधिया घाट तक हुआ करता था, लेकिन अब सिमट कर काफी छोटा हो गया है, लकड़ी बेचने वालों के अवैध अतिक्रमण है. प्रशासन की उदासीनता के चलते यहाँ अव्यवस्थाओं का बोलबाला है.

शवों को आग देने का काम करते हैं डोम राजा. उनका काम है दाह संस्कार का टैक्स वसूलना, बिना डोम के किसी भी चिता को अग्नि नहीं दी जा सकती.

शवों को अग्नि देने से पहले परंपरा है उन्हें गंगा में स्नान कराने की.

मणिकर्णिका घाट पर शवों को उनकी अर्थी समेत गंगा में डुबकी लगवा दी जाती है, इसके बाद इन्हें प्रतीक्षा सूची में रख दिया जाता है.

जिस जगह पर शवों का दाह होता है, उसके करीब दस फीट की दूरी पर ही आपको कई लोग ऐसे नजर आएंगे जो लोहे के तसले में पानी को छानते है.

सोने की तलाश में

मणिकर्णिका घाट का पर गंगा का पानी एक दम काला है. शवों के जलने के बाद राख को नदी में बहा दिया जाता है. इसी राख को लोग छलनी से छानते रहते है.

मेरे इस सवाल पर कि यहाँ इन्हें क्या मिलेगा पास में खड़े एक व्यक्ति ने बताया कि ऐसी महिलाएं जिनके आभूषण दाह संस्कार से पहले नही उतारे जाते हैं, वो चिता में भस्म हो जाते हैं. और जब चिता की राख को नदी में प्रवाहित किया जाता है तो ये लोग राख और कोयला छान कर सोना चांदी निकाल लेते है.

केके शर्मा ये भी कहते हैं जिस तरह से दिन में टनों कोयला नदी में बहा दिया जाता है, इससे नदी बुरी तरह प्रदूषित तो होती ही है साथ ही यहाँ कोयले का भी ठेका होता है, इसी से लोग अपने फायदे के लिए सोना चाँदी निकालते रहते है.

इस सवाल पर कि तमाम अधजले शव भी गंगा में प्रवाहित कर दिए जाते हैं, इस सवाल पर केके शर्मा कहते हैं कि कई बार देखा गया है कि जब किसी गरीब व्यक्ति का शव आता है तो उसे किसी जल रही चिता में ही रख दिया जाता है और फिर इस अधजले शव को मौका देख कर गंगा में बहा दिया जाता है.

पर इतनी अव्यवस्थाओं के बावजूद इस मणिकर्णिका के साथ इतनी किंवदंतियां जुड़ी हैं कि बनारस के ही नही बल्कि बाहर के लोग भी इसी घाट पर अंतिम संस्कार कराना चाहते हैं ताकि उन्हें मोक्ष मिल सके.

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