राजनाथ सिंह: नज़र प्रधानमंत्री की कुर्सी पर!

 बुधवार, 23 जनवरी, 2013 को 15:55 IST तक के समाचार
rajnath singh

राजनाथ सिंह दूसरी बार भाजपा के अध्यक्ष चुने गए हैं

भौतिक विज्ञान (फिजिक्स) से पीएचडी और पेशे से अध्यापक राजनाथ सिंह भारतीय जनता पार्टी के उन नेताओं में से हैं, जो कम उम्र से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा में जाने लगे थे.

माना जाता है कि राजनाथ के ऊपर संघ के वरदहस्त के कारण ही लाल कृष्ण आडवाणी नितिन गडकरी को हटाने में सफल होने के बावजूद यशवंत सिन्हा, सुषमा स्वराज अथवा वेंकैया नायडू को अध्यक्ष नहीं बनवा पाए.

पर ऐसा नहीं है कि यह सब अचानक हो गया. सोमवार को जब नितिन गडकरी की मौजूदगी में कल्याण सिंह भारतीय जनता पार्टी में दोबारा शामिल हुए तो उस समय मंच से कहा जा रहा था कि दो..तीन दिन में श्री गडकरी दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनेंगे.

लेकिन वहीं पर प्रेस गैलरी में कई लोग कह रहे थे कि राजनाथ गडकरी को पटखनी दे सकते हैं.

नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर

दरअसल राजनाथ की नजर भाजपा अध्यक्ष से ज्यादा प्रधानमंत्री की कुर्सी पर रही है. इसीलिए पिछले कुछ दिनों से वह इस कोशिश में लगे थे कि अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी को दुरुस्त करें और जिन लोगों से उनकी पुरानी दुश्मनी है उनका भरोसा हासिल करें.

इसी कोशिश में उन्होंने कल्याण सिंह को दोबारा भाजपा में लाने के लिए लगातार प्रयास किया.

सब जानते हैं कि राजनाथ जब उत्तर प्रदेश भाजपा अध्यक्ष थे उस समय उन्होंने कल्याण सिंह के खिलाफ बगावत को हवा दी. उन्होंने ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी थी कि कल्याण सिंह सीधे अटल बिहारी वाजपेयी से टकराकर पार्टी से बाहर हो गए.

राजनाथ ने न केवल कल्याण सिंह बल्कि उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा के तीन अन्य बड़े नेताओं कलराज मिश्र, लालजी टंडन और ओम प्रकाश सिंह को भी किनारे कर दिया था.

इस दौरान उन्होंने अपने को ठाकुर नेता के रूप में स्थापित किया.

संघ के करीबी

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राजनाथ की नजर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर है

माना जाता है कि तत्कालीन संघ प्रमुख राजेंद्र सिंह उर्फ़ रज्जू भैया ने राजनाथ सिंह को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की.

केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद छोड़कर साल 2000 में राजनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. लेकिन 2002 के चुनाव में वह पार्टी की नैया पार नहीं लगा सके. पर वह इस झटके को झेल गए.

जब लाल कृष्ण आडवाणी जिन्ना को सेकुलर कहने के बाद संघ की नज़रों से उतर गए और भाजपा के लिए अगले अध्यक्ष की तलाश हुई तब 2006 में राजनाथ एक युवा नेता के रूप में पार्टी अध्यक्ष बन पाने में कामयाब हुए.

राजनीतिक जमीन नहीं

राजनाथ के विरोधी आरोप लगाते रहे हैं कि उनकी अपनी कोई राजनीतिक जमीन नहीं है और वह 'गगन बिहारी' हैं. यानी 1977 की जनता लहर के बाद उन्होंने सीधे जनता से कोई चुनाव नहीं जीता, सिवा हैदरगढ़ से जब वह मुख्यमंत्री थे.

इसका जवाब देने के लिए उन्होंने गाजियाबाद से पिछला लोक सभा चुनाव लड़ा और जीते. इस तरह राजनाथ सिंह ने साबित किया कि उनका अपना जनाधार पूरे प्रदेश में है.

साठ साल पूरे कर चुके राजनाथ पूरब के चंदौली जिले में चकिया के पास भंभौरा गाँव में एक किसान परिवार में पैदा हुए. पढ़ाई गोरखपुर विश्वविद्यालय से की और मिर्जापुर के एक कालेज में अध्यापक हुए.

फिर एक तरह से मिर्जापुर ही उनका कार्यक्षेत्र बना. वह 1974 में मिर्जापुर जिला जनसंघ के सचिव और बाद में अध्यक्ष हुए. 1975 की इमरजेंसी में वह डॉक्टर मुरली मनोहर जोशी के साथ नैनी जेल में रहे. फिर 1977 की जनता लहर में विधायक हुए.

1984 में भारतीय जनता युवा मोर्चा उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने अपनी अलग पहचान बनायी. इस पहचान की बदौलत वह युवा मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी बने.

प्रशासनिक क्षमता

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अपने गृह राज्य उत्तर प्रदेश में पार्टी को पटरी पर लाना राजनाथ की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है

1991 में जब उत्तर प्रदेश में पहली बार भाजपा की सरकार बनी तो वह शिक्षा मंत्री बने और नक़ल के खिलाफ सख्त कानून बनाया. इस कानून को अमल में लाने में जो दृढता दिखायी उससे उन्होंने अपनी प्रशासनिक क्षमता साबित की.

इसके बाद तो फिर वह भाजपा की राजनीति में एक के बाद एक कदम चढ़ते गए. 1997 में वह उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष बने.

कई लोग मानते हैं कि इसी के बाद उनके अंदर मुख्यमंत्री बनने की इच्छा जगी. इसकी पूर्ति के लिए उन्होंने कल्याण सिंह के खिलाफ अभियान चलाया और अटल जी के कान भरे.

फिर तो उत्तर प्रदेश में भाजपा में ऐसी गुटबाजी उभरी कि आज विधान सभा में उसके केवल 47 सदस्य हैं. जहां उत्तर प्रदेश से भाजपा के कभी साठ सांसद होते थे, आज केवल दस हैं.

उत्तर प्रदेश है सबसे बड़ी चुनौती

इसलिए प्रेक्षकों का मानना है कि अगर भारतीय जनता पार्टी को दिल्ली में वापस आना है, तो राजनाथ को पहले उत्तर प्रदेश पर ध्यान देना होगा, जहाँ लोकसभा की अस्सी सीटें हैं.

राजनाथ ऐसे समय पर दोबारा भाजपा अध्यक्ष पद की कमान संभालने जा रहे हैं, जब प्रधानमंत्री पद के भावी उम्मीदवार को लेकर पार्टी में अंदरूनी उठापटक चरम पर है. अभी तक राजनाथ ने नरेंद्र मोदी से अच्छे सम्बन्ध बना रखे हैं. शायद इसीलिए नरेंद्र मोदी ने सबसे पहले उन्हें अध्यक्ष बनने पर बधाई दी.

मगर जानने वाले जानते हैं कि राजनाथ अटल बिहारी वाजपेयी के उत्तराधिकारी बनना चाहते थे और आडवाणी को लंगड़ी मारने में उनका भी हाथ था. इसलिए आगे चलकर अगर वह मोदी का भी रास्ता रोकें, तो कोई आश्चर्य नही होगा.

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